आज के डिजिटल दौर में जैसे ही मोबाइल स्क्रीन पर लिखा आता है “आपका ऑर्डर 10 मिनट में पहुँचेगा”, ग्राहक के चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ जाती है। ऐप का टाइमर चलता है, मिनट घटते हैं और हम निश्चिंत होकर सोफे पर बैठे रहते हैं। लेकिन उसी टाइमर के साथ किसी और की धड़कन भी तेज़ हो जाती है। वह इंसान है, जो इस वादे को निभाने के लिए सड़कों पर दौड़ रहा होता है। वही डिलीवरी बॉय, जिसकी कहानी स्क्रीन पर कभी नहीं दिखती।
तेज़ी से बढ़ती क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी इंडस्ट्री ने स्पीड को ही सफलता का पैमाना बना लिया है। अब सवाल बेहतर सेवा या सुरक्षित डिलीवरी का नहीं रहा, बल्कि सबसे तेज़ कौन पहुँचेगा, यही प्रतिस्पर्धा है। इसी मानसिकता से जन्म हुआ 10 मिनट डिलीवरी मॉडल का। बाहर से यह सुविधा और टेक्नोलॉजी का कमाल लगता है, लेकिन ज़मीन पर यह मॉडल एक इंसान को मशीन की तरह इस्तेमाल करने की कहानी बन चुका है।
डिलीवरी बॉय का दिन सिर्फ एक ऑर्डर उठाने और देने तक सीमित नहीं होता। सुबह ऐप ऑन करते ही वह शहर की सड़कों का हिस्सा बन जाता है। ट्रैफिक जाम, टूटी सड़कें, अचानक बंद रास्ते, रेड लाइट, गलत पिन लोकेशन, बंद गेट, खराब लिफ्ट और फोन न उठाने वाले ग्राहक, सब कुछ उसी तय समय के भीतर निपटाना होता है। ऐप का टाइमर न मौसम समझता है, न ट्रैफिक, न इंसानी थकान। वह सिर्फ गिनती करता है।
बारिश में भीगना, चिलचिलाती धूप में जलना या ठंड में कांपना, किसी भी हालत में रुकने का विकल्प नहीं होता। अगर डिलीवरी कुछ मिनट लेट हो गई तो सबसे पहले रेटिंग गिरती है। रेटिंग गिरने का मतलब इंसेंटिव कटना। इंसेंटिव कटा तो दिन की कमाई सीधी आधी। कई मामलों में एक या दो मिनट की देरी पर सिस्टम अपने आप पेनल्टी लगा देता है। ग्राहक आराम से घर में बैठकर पूछता है देर क्यों हुई, लेकिन सड़क पर क्या हालात थे, यह सवाल कोई नहीं करता।
इस 10 मिनट के दबाव का सबसे खतरनाक असर सड़क सुरक्षा पर पड़ता है। समय पर पहुँचने की मजबूरी में कई डिलीवरी बॉय रेड लाइट पार करते हैं, गलत साइड से बाइक चलाते हैं और तेज़ रफ्तार में फोन पर नेविगेशन देखते रहते हैं। यह केवल नियम तोड़ना नहीं, बल्कि रोज़ जान को जोखिम में डालना है। हादसा हो जाए तो ज़्यादातर मामलों में कंपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाती है। ग्राहक को फर्क नहीं पड़ता और इलाज का खर्च, बाइक की मरम्मत और काम से छुट्टी का नुकसान सब राइडर को ही उठाना पड़ता है।
कमाई को लेकर भी एक बड़ा भ्रम फैला हुआ है। बाहर से यह नौकरी आसान और जल्दी पैसे देने वाली लगती है। हकीकत यह है कि बेस पे बेहद कम होती है। असली कमाई इंसेंटिव से जुड़ी होती है, जो पूरी तरह डिलीवरी टाइम, ऑर्डर काउंट और ग्राहक रेटिंग पर निर्भर करती है। यानी अगर आप तेज़ नहीं भागे, तो आपकी जेब भी खाली रहेगी। कई डिलीवरी बॉय दिन में 10 से 12 घंटे काम करने के बाद भी इतना ही कमा पाते हैं कि किराया, पेट्रोल और खाना निकल जाए।
मानसिक दबाव इस काम का सबसे अनदेखा लेकिन सबसे गहरा असर है। हर समय ऐप के नोटिफिकेशन, टाइमर की गिनती, ग्राहक की कॉल और रेटिंग गिरने का डर दिमाग को थका देता है। कई राइडर बताते हैं कि उन्हें लगातार घबराहट, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन महसूस होता है। लेकिन गिग वर्कर होने की वजह से न तो उन्हें मानसिक स्वास्थ्य का सहारा मिलता है और न ही छुट्टी लेने का अधिकार।
सम्मान की कमी भी इस पेशे की एक कड़वी सच्चाई है। देर होने पर गाली गलौच, फोन पर चिल्लाना और जानबूझकर रेटिंग गिरा देना आम हो गया है। कुछ ग्राहक डिलीवरी बॉय को इंसान नहीं, एक चलती मशीन की तरह देखते हैं। जबकि वही इंसान आपके आराम और सुविधा के लिए अपनी सेहत और सुरक्षा दांव पर लगाता है।
10 मिनट डिलीवरी मॉडल का सबसे बड़ा झूठ यह है कि हर गलती की जिम्मेदारी आखिरी कड़ी पर डाल दी जाती है। स्टोर में पैकिंग देर से हो, सिस्टम में गड़बड़ी हो या लोकेशन गलत हो, नुकसान फिर भी उसी का होता है जो सड़क पर है। एल्गोरिदम सिर्फ टाइम देखता है, हालात नहीं।
यह सवाल अब ज़रूरी हो गया है कि क्या हमें वाकई 10 मिनट में सामान चाहिए। क्या कुछ मिनट जल्दी पाने के लिए किसी की जान जोखिम में डालना सही है। सुविधा की इस भूख में हमने इंसानी संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है। पहले सुरक्षित डिलीवरी मायने रखती थी, अब सिर्फ तेज़ डिलीवरी बची है।
कागज़ों पर कई कंपनियाँ सुरक्षा की बात करती हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है। जब तक इंसेंटिव स्पीड से जुड़ा रहेगा, जोखिम बना रहेगा। जब तक ग्राहक रेटिंग को हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा, दबाव खत्म नहीं होगा।
भारत के बड़े शहरों में लाखों युवा इस काम से जुड़े हुए हैं। औसतन एक डिलीवरी बॉय दिन में 12 से 14 घंटे सड़क पर बिताता है। कई बार लगातार 4 से 5 घंटे बिना ब्रेक के। डेटा साफ दिखाता है कि क्विक डिलीवरी मॉडल में काम करने वाले राइडर्स को सामान्य डिलीवरी की तुलना में लगभग 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा ऑर्डर निपटाने पड़ते हैं। ज्यादा ऑर्डर मतलब ज्यादा रफ्तार और ज्यादा खतरा।
ग्राउंड पर बात करने पर ज्यादातर डिलीवरी बॉय की उम्र 20 से 35 साल के बीच निकलती है। लगभग सभी मानते हैं कि 10 मिनट डिलीवरी शुरू होने के बाद ट्रैफिक नियम उनके लिए हालात पर निर्भर हो गए हैं। रेड लाइट पर रुकना अक्सर नुकसान जैसा लगता है। यह उनकी सोच नहीं, सिस्टम का दबाव है।
शहरी इलाकों में डिलीवरी से जुड़े सड़क हादसों में पिछले कुछ वर्षों में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है। इनमें से बड़ी संख्या उन मामलों की है जहाँ राइडर जल्दी में था। लेकिन इलाज और नुकसान की भरपाई ज़्यादातर खुद राइडर को करनी पड़ती है क्योंकि वह कर्मचारी नहीं, डिलीवरी पार्टनर कहलाता है।
कमाई जोड़ घटाकर देखें तो ईंधन, बाइक मेंटेनेंस, मोबाइल डेटा और सेहत का खर्च निकालने के बाद तस्वीर साफ हो जाती है। एक दो खराब रिव्यू पूरे हफ्ते की कमाई बिगाड़ सकते हैं।
खाने पीने की आदतें बिगड़ जाती हैं। समय पर खाना लग्ज़री बन जाता है। पानी भी सोच समझकर पीना पड़ता है क्योंकि हर ब्रेक टाइम लॉस है। लंबे समय में इसका असर शरीर पर साफ दिखता है।
रात की शिफ्ट और भी मुश्किल होती है। सड़कें सुनसान, रोशनी कम और थकान ज्यादा। डर के साथ काम करना पड़ता है, लेकिन ऑर्डर रुकते नहीं।
10 मिनट की डिलीवरी अब सुविधा नहीं, एक मार्केटिंग हथियार बन चुकी है। ऑर्डर बढ़ते हैं, लेकिन कीमत वही इंसान चुकाता है जो सड़क पर है।
डिलीवरी बॉय यह नहीं कहते कि काम बंद हो। वे बस इतना चाहते हैं कि सिस्टम इंसानी सीमाओं को समझे। थोड़ा लचीलापन, बेहतर सुरक्षा और मुश्किल वक्त में सहारा।
मोबाइल स्क्रीन पर जैसे ही डिलीवरड लिखा आता है, ग्राहक चैन की सांस लेता है। लेकिन उस शब्द के पीछे पसीने से भीगा हेलमेट, थकी हुई सांस और एक इंसान की कहानी छुपी होती है। यही 10 मिनट डिलीवरी की असली हकीकत है। तेज़, सुविधाजनक और बेहद महंगी कीमत वाली।
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