दादा किशन की जय
‘120 बहादुर’ (137 मिनट) शहीद मेजर शैतान सिंह भाटी और उनके 120 कुमाऊं रेजिमेंट जवानों की वीरता पर बनी फिल्म है, लेकिन दुख की बात है कि फिल्म इस ऐसे साहसी मेजर की कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाई। आज जब ‘इनसाइड एज’, ‘मिर्जापुर’, ‘बंबई मेरी जान’ और ‘द फैमिली मैन’ जैसी बेहतरीन वेब सीरीज़ बन चुकी हैं, तो ऐसे में ‘120 बहादुर’ को इस तरह सिर्फ फिल्म तक सीमित रखने का क्या कारण था? फिल्म को इतना कम समय दिया गया है की वो खुद ब खुद कमजोर बन गई।
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि न तो शहीद मेजर शैतान सिंह भाटी के किरदार को गहराई से दिखाने का समय दिया गया और न ही कुमाऊं रेजिमेंट के अहीर सैनिकों को जगह मिली। कहानी को इतनी तेज़ी से आगे बढ़ाया गया है कि कई महत्वपूर्ण बातों को समझाना काफी मुश्किल था। फिल्म देखने का सिर्फ एकमात्र कारण यही बचता है कि यह हमारे शहीदों और उनके अदम्य साहस पर आधारित है।
शहीद मेजर शैतान सिंह के बैकग्राउंड को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह का ज़िक्र तक नहीं किया गया, जबकि यह जानकारी उनके व्यक्तित्व की मजबूती समझाने में मदद कर सकती थी। उनकी पिछली लड़ाइयों का भी कोई उल्लेख नहीं है।
फिल्म पूरी तरह फरहान अख्तर पर टिकी है, लेकिन समस्या यह है कि किरदार उन पर जंचता ही नहीं। उनकी बातचीत और बॉडी लैंग्वेज में न तो राजस्थानी मिट्टी की झलक दिखती है और न ही भाटी राजपूतों वाली गरिमा। यह रोल किसी ऐसे अभिनेता को करना चाहिए था जो इस किरदार में ढल सके—फरहान अख्तर इसमें फिट नहीं बैठते।
‘रेज़ांग ला’ से पहले शहीद मेजर शैतान सिंह कई महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ चुके थे, पर फिल्म में एक बार भी इसका जिक्र तक नहीं किया गया। चीन भारत की सीमा में इतनी अंदर तक कैसे आया, फिल्म में इस पर भी कोई स्पष्टीकरण नहीं है।
फरहान अख्तर के किरदार को छोड़ दें तो बाकी कलाकार जैसे ईजाज़ ख़ान और अजींक्य देव सिर्फ नाम के लिए रखे गए हैं। फिल्म में भावनाओं की भी बड़ी कमी महसूस होती है। भाषा पर भी ध्यान नहीं दिया गया, विशेषकर फरहान के संवाद कमजोर और असरहीन लगते हैं। सबसे अहम बात—फिल्म की जगह वेब सीरीज़ एक बेहतर विकल्प होती, जहाँ कहानी को विस्तार से दिखाया जा सकता था।
डायलॉग की बात करें तो ‘दादा किशन की जय’ को छोड़ कर ऐसा कोई डायलॉग नहीं है जो रोंगटे खड़े कर दे। और ये डायलॉग उन वीरों का एक वीरता भरा नारा था, जिसका अर्थ है — ‘कृष्ण के विजय का उद्घोष’ और ये मुख्य रूप से भारत-चीन युद्ध के दौरान कुमाऊं रेजिमेंट के अहीर सैनिकों के युद्धघोष के रूप में जाना जाता है। तो अगर इसे भी निकाल दिया जाए तो कोई भी ऐसा डायलॉग नहीं है जो आकर्षक लगे।
कुल मिलाकर फिल्म सिर्फ शहीद मेजर शैतान सिंह और उनके सैनिकों की याद में देखी जा सकती है, बाकी फिल्म के अंदर इतना कुछ खास नहीं है।
अभिनय सभी कलाकारों का ठीक-ठाक है। गाने अच्छे हैं, हालांकि ‘याद आते हैं’ सुनकर ‘बॉर्डर’ फिल्म की याद आती है, लेकिन ‘मैं हूँ वो धरती माँ’ गाना भावुक और असरदार है। बैकग्राउंड म्यूज़िक बस ठीक है, लेकिन सिनेमेटोग्राफी अच्छी है।
गाने जावेद अख्तर ने लिखे हैं और अमित त्रिवेदी, सलीम–सुलेमान और अमजद नदीम–आमिर ने संगीत दिया है।
फिल्म की स्टार कास्ट में हैं:
फरहान अख्तर, राशी खन्ना, विवान भटेना, अंकित सिवाच, ईजाज़ खान और अजिंक्य देव।
फिल्म के निर्माता हैं:
फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी और अमित चंद्रा और फिल्म का निर्देशन रजनीश घई ने किया है।
फिल्म अपनी कमियों के बावजूद एक बार ज़रूर देखी जानी चाहिए, क्योंकि यह शहीद मेजर शैतान सिंह और उनके 120 बहादुर जवानों की उस कुर्बानी को सामने लाती है, जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए। आज के दौर में, जब ज्यादातर फ़िल्में रोमांस और फालतू कॉमेडी तक सीमित हो चुकी हैं, ऐसी कहानियों पर बनी फिल्में और भी अहम हो जाती हैं, क्योंकि ये हमें हमारे असली नायकों की याद दिलाती हैं।
फिल्म से हटकर
शहीद मेजर शैतान सिंह भाटी ने नागालैंड के एथनिक कॉन्फ्लिक्ट, 1961 में गोवा मुक्ति और भारत-चीन युद्ध जैसी कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया था। उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके पिता भी लेफ्टिनेंट कर्नल थे और ब्रिटिश शासन ने उन्हें ‘Order of the British Empire’ से सम्मानित किया था।
इसलिए उम्मीद है कि मेजर शैतान सिंह भाटी पर एक विस्तृत वेब सीरीज़ जरूर बननी चाहिए, ताकि उनका साहस और जीवन हर भारतीय तक पहुँच सके।
Rating: ⭐⭐ ⭐️(3/5)
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