31 घंटे। यह सिर्फ समय की एक इकाई नहीं है। यह 31 घंटे भूख के हैं, प्यास के हैं, थकान के हैं, और उस बेबसी के हैं जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। मुंबई–पुणे एक्सप्रेसवे पर फंसे हज़ारों लोग किसी यात्रा पर नहीं थे। वे बस घर लौट रहे थे, काम पर जा रहे थे, किसी से मिलने निकले थे। लेकिन एक सड़क जाम ने उनकी ज़िंदगी को ठहरा दिया।
कारों के भीतर बच्चे रोते रहे। बुज़ुर्ग बेचैन रहे। कई लोग बिना पानी के, बिना शौचालय के, बिना किसी जानकारी के इंतज़ार करते रहे। रात हुई, फिर सुबह हुई, फिर एक और रात। लेकिन जाम नहीं खुला।
यह कोई पहली घटना नहीं है। फर्क बस इतना है कि इस बार ड्रोन कैमरे ने ऊपर से वह तस्वीर दिखा दी, जिसे हम अक्सर नीचे से देखना नहीं चाहते। किलोमीटरों तक खड़ी गाड़ियां, एक-दूसरे से सटी हुई ज़िंदगियां, और उनके बीच कोई व्यवस्था नहीं।
हम खुद को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश कहते हैं। अर्थव्यवस्था के आंकड़े गिनाते हैं। एक्सप्रेसवे, स्मार्ट सिटी, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बातें करते हैं। लेकिन जब एक सड़क पर हादसा होता है और पूरा सिस्टम 31 घंटे तक ठप हो जाता है, तो यह सवाल उठता है कि हमारी तैयारी असल में कितनी है।
यह सिर्फ ट्रैफिक की कहानी नहीं है। यह प्रशासनिक सोच की कहानी है। अगर एक बड़ा हादसा होता है, तो क्या हमारे पास तुरंत रास्ता साफ करने की योजना होती है। क्या यात्रियों के लिए पानी, मेडिकल सहायता, अस्थायी शौचालय जैसी बुनियादी चीज़ों की कोई व्यवस्था होती है। या फिर हम मान लेते हैं कि लोग अपने हाल पर छोड़ दिए जाएं।
सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि इस दौरान आम आदमी के पास कोई जवाब नहीं होता। न कोई स्पष्ट सूचना, न कोई तय समयसीमा। लोग कारों से बाहर निकलकर एक-दूसरे से पूछते हैं कि आखिर हुआ क्या है। अफवाहें फैलती हैं। बेचैनी बढ़ती है। लेकिन सिस्टम चुप रहता है।
यह वही आम आदमी है जो टैक्स देता है। हर लीटर पेट्रोल पर टैक्स देता है। टोल प्लाज़ा पर पैसे देता है। आयकर भरता है। फिर भी जब संकट आता है, तो वही आदमी सबसे ज़्यादा असहाय दिखाई देता है। यह सवाल पूछना गलत नहीं है कि टैक्स देने के बाद भी अगर हमें 31 घंटे सड़क पर फंसे रहना पड़े, तो हम किस व्यवस्था का हिस्सा हैं।
क्या एक्सप्रेसवे सिर्फ तेज़ रफ्तार के लिए बने हैं, या आपात हालात के लिए भी। क्या हमारी योजनाएं सिर्फ उद्घाटन तक सीमित हैं, या उनकी परीक्षा संकट के समय होती है। क्या हमने कभी गंभीरता से यह सोचा है कि एक बड़ी सड़क पर अगर सब कुछ रुक जाए, तो लोगों का क्या होगा।
यह भी सोचने की ज़रूरत है कि जिम्मेदारी तय किसकी है। हादसा होना कभी-कभी टाला नहीं जा सकता। लेकिन हादसे के बाद हालात संभालना तो सीखा जा सकता है। वैकल्पिक रास्ते, तेज़ निर्णय, ज़मीनी स्तर पर समन्वय—यह सब किसी भी आधुनिक देश की पहचान होती है।
31 घंटे तक फंसे लोगों ने सिर्फ समय नहीं खोया। किसी ने नौकरी का इंटरव्यू खोया। किसी की फ्लाइट छूट गई। किसी की तबीयत बिगड़ी। यह नुकसान किसी आंकड़े में दर्ज नहीं होगा, लेकिन भरोसे में आई दरार ज़रूर दर्ज हो जाएगी।
आज जब हम दुनिया को बताते हैं कि भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तो ऐसे दृश्य हमें आईना दिखाते हैं। यह आईना असहज है, लेकिन ज़रूरी है। क्योंकि सवाल पूछे बिना सुधार नहीं होता।
सवाल यह नहीं है कि जाम क्यों लगा। सवाल यह है कि जाम लगने के बाद हम इतने बेबस क्यों हो गए। सवाल यह भी है कि क्या अगली बार हालात कुछ बेहतर होंगे, या फिर वही 31 घंटे, वही इंतज़ार, वही चुप्पी।
एक देश की ताकत सिर्फ उसकी सड़कों की लंबाई से नहीं मापी जाती। उसकी ताकत इस बात से मापी जाती है कि संकट के समय वह अपने नागरिकों के साथ कैसे खड़ा होता है।
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