रामनवमी पर विशेष…
मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न देखी सूरत तेरी। देश में इतने बड़े-बड़े मंदिर तेरे बने हुए हैं और सबमें मैंने झांक भी लिया है। सबमें अयोध्या के राजा राम ही दिखाई देते हैं, शबरी के राम तो पता नहीं कहाँ चले गए हैं? मेरी तो उसी राम की तलाश है जिन्होंने निषाद को भी गले लगाया था और ग्रामवासी को भी। जिन्हें वनवासी मुनियों के मेहमान बनने में भी आनंद आता था और कबीले के सरदार सुग्रीव के मेहमान बनने में भी। पददलित दीन दुखियारी शबरी के साथ जिन्होंने ताई समझकर लाड़ लड़ाया था और जिनके ताजे-सूखे बेर खाये थे; मुझे दरअसल उसी राम की तलाश है। कोई उनका मुकाम बताएगा क्या…?
न जाने मैं किस नगर में आ गया हूँ उन्हें ढूँढ़ते- ढूँढ़ते…? पता नहीं ये कौन-से सैनिक हैं जो चारों ओर बिखरे हुए हैं। ये शोर तो खूब मचाते हैं पर मेरे राम का पता नहीं बताते हैं। क्या पता या तो इन्हें राम का पता पता ही नहीं; या इन्होंने राम को ही परकोटे में कैद कर दिया है। हल्ला भी शायद इसीलिए मचा रहे हैं ताकि मेरे जैसा कोई ऐरा-गैरा उन तक पहुँच ही न पाए। खुली हवा में रमण करने वाले राम को परकोटे में कैसा लगता होगा…?
मुझे नहीं लगता कि मेरे राम मुझे भूले होंगे। जिसके नाम पर राम को वन में भेजा गया, उस भरत को उन्होंने जंगल में भी नहीं भुलाया। निषाद का बिस्तर जिन्हें जीवनभर याद आता रहा, वो मुझे कैसे भूले होंगे…?
न…जरूर कोई षड्यंत्र है। वरना मेरा राम तो ऐसा है ही नहीं कि उन्हें मेरी खबर नहीं हो सकती। दलालों ने उन्हें कैद कर लिया है और भीड़ से बचाने की बात कहकर उन्हें फुसला लिया है। चल हट नामुरादों! मुझे मेरे राम के पास जाना है। तेरे पास की मुझे कोई जरूरत नहीं है। मेरे राम का जन्मदिन है और मुझे उन्हें कहनी है—हैप्पी बर्थडे टू यू…!!!


