1898 से 1920 के बीच बिहार में किया गया कैडस्ट्रल सर्वेक्षण ब्रिटिश भारत के सबसे महत्त्वाकांक्षी और महत्त्वपूर्ण भूमि सर्वेक्षणों में से एक था। इसका मुख्य उद्देश्य बिहार की भूमि स्वामित्व और राजस्व प्रणाली को सुव्यवस्थित करना था। यह सर्वेक्षण दो दशकों से अधिक समय तक चला और इसने भूमि अभिलेखों की एक मजबूत नींव रखी। इसका प्रभाव आज भी बिहार में चल रहे भूमि सर्वेक्षणों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
सर्वेक्षण का नेतृत्व और उद्देश्य:
इस व्यापक सर्वेक्षण का नेतृत्व एफ. डब्ल्यू. मुलैन (F.W. Mullane) ने किया था। इन्हें बिहार में कैडस्ट्रल सर्वेक्षण का अधीक्षक नियुक्त किया गया था। मुलैन एक अनुभवी सर्वेक्षणकर्ता और प्रशासक थे, जिनकी विशेषज्ञता और दूरदर्शिता ने इस जटिल परियोजना की सफलता सुनिश्चित की थी। उनके प्रमुख कार्यों में सर्वेक्षण की योजना बनाना, कर्मचारियों की भर्ती और प्रशिक्षण, सर्वेक्षण टीमों का गठन और समन्वय, तकनीकी मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण, विभिन्न सरकारी विभागों के साथ समन्वय, भूमि विवादों का समाधान और अंतिम रिकॉर्ड एवं मानचित्रों का प्रमाणीकरण शामिल था।
सर्वेक्षण की प्रक्रिया:
बिहार में कैडस्ट्रल सर्वेक्षण एक विस्तृत और चरणबद्ध प्रक्रिया थी और इसमें निम्नलिखित चरण शामिल थे:
क्षेत्र का सीमांकन: गाँवों और भूखंडों की सीमाओं का निर्धारण।
त्रिकोणीय सर्वेक्षण: उच्च सटीकता के लिए त्रिकोणीय स्टेशनों का नेटवर्क स्थापित करना।
चतुर्भुज सर्वेक्षण: गाँवों और बड़े भूखंडों की सीमाओं के साथ बिंदुओं का मापन।
भूखंडों का सीमांकन और माप: व्यक्तिगत भूखंडों की सीमाओं का निर्धारण और क्षेत्रफल का मापन।
खसरा तैयार करना: प्रत्येक भूखंड की विस्तृत जानकारी दर्ज करना।
खतियान तैयार करना: प्रत्येक किसान के स्वामित्व वाले सभी भूखंडों की जानकारी एकत्र करना।
मानचित्रण: विस्तृत भूकर मानचित्र तैयार करना।
अधिकारों का अभिलेख तैयार करना: भूमि पर विभिन्न अधिकारों और देनदारियों को दर्ज करना।
प्रकाशन और वितरण: अंतिम रिकॉर्ड और मानचित्रों का प्रकाशन और वितरण।
1898-1920 के कैडस्ट्रल सर्वेक्षण में जमींदारों की भूमिका:
तत्कालीन बिहार में जमींदार भूमि के मध्यस्थ थे और उनकी भूमिका भी उस सर्वेक्षण में महत्त्वपूर्ण थी:
सीमाओं की पहचान में सहायता: अपने क्षेत्रों की सीमाओं और भूखंडों की जानकारी प्रदान करना।
अधिकारों के दावों का सत्यापन: भूमि पर किसानों के अधिकारों की जानकारी देना।
किसानों को प्रोत्साहित करना: सर्वेक्षण में भाग लेने के लिए किसानों को प्रेरित करना।
विवादों का समाधान: स्थानीय स्तर पर भूमि विवादों को हल करने में मध्यस्थता करना।
अभिलेखों का रखरखाव: अपने स्तर पर भूमि अभिलेखों की जानकारी देना।
हालांकि, जमींदारों के हित हमेशा किसानों के अनुकूल नहीं होते थे। कुछ मामलों में उन्होंने सर्वेक्षण को प्रभावित करने की कोशिश भी की होगी, इस आशंका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। साथ ही पटवारियों पर उनका प्रभाव भी निष्पक्ष रिकॉर्ड रखने में बाधा डाला हो सकता था।
वर्तमान में चल रहे सर्वेक्षणों में 1898-1920 के सर्वेक्षण का योगदान:
1898-1920 के कैडस्ट्रल सर्वेक्षण ने बिहार में भूमि रिकॉर्ड की एक मजबूत नींव रखी है, जिसका योगदान वर्तमान सर्वेक्षणों में महत्त्वपूर्ण है:
आधारभूत मानचित्र और अभिलेख: पुराने भूकर मानचित्र और अधिकार अभिलेख वर्तमान सर्वेक्षणों के लिए शुरुआती बिंदु हैं।
विवादों के समाधान में संदर्भ: पुराने रिकॉर्ड वर्तमान भूमि विवादों को हल करने में ऐतिहासिक साक्ष्य प्रदान करते हैं।
तकनीकी विकास के लिए तुलना: पुराने सर्वेक्षण की प्रक्रिया का अध्ययन तकनीकी प्रगति के प्रभाव को समझने में मदद करता है।
कानूनी और नीतिगत ढांचा: पुराने सर्वेक्षण ने भूमि कानूनों और सर्वेक्षण प्रक्रियाओं को आकार दिया।
जनसांख्यिकीय और सामाजिक परिवर्तनों की समझ: पुराने रिकॉर्ड भूमि स्वामित्व में परिवर्तनों को समझने के लिए ऐतिहासिक डेटा प्रदान करते हैं।
अब चूंकि समय के साथ हुए भूमि के आकार और दखल-कब्जे में आमूल-चूल परिवर्तन हो चुके हैं, इस कारण पुराने रिकॉर्ड को अद्यतन करने की परम आवश्यकता है। और वर्तमान सर्वेक्षण आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके इसी उद्देश्य को पूरा कर रहा है।
वर्तमान स्थिति और पुनः सर्वेक्षण
बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा अब ‘डिजिटल रिवेन्यू मैपिंग’ और ‘भूमि सर्वेक्षण पुनर्नवीनीकरण’ का कार्य किया जा रहा है। राज्य में कई जिलों में आधुनिक GPS आधारित भूमि मापन की प्रक्रिया चल रही है। 2022 से शुरू हुई यह डिजिटल पुनः सर्वेक्षण परियोजना भूमि रिकॉर्ड को और अधिक पारदर्शी, विवादमुक्त और नागरिक केंद्रित बनाने की दिशा में प्रयासरत है।
वर्तमान सर्वे की मुख्य योजनाएं:
भूमि सर्वेक्षण एवं अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP)
भू-स्वामित्व प्रमाण पत्र वितरण योजना
डिजिटल खतियान और नक्शा (Bhumi.bihar.gov.in पोर्टल)
बिहार का कैडस्ट्रल सर्वेक्षण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक बदलाव का आधार रहा है। एफ. डब्ल्यू. मुलैन और उनकी टीम द्वारा किये गए इस ऐतिहासिक कार्य ने राज्य को एक सशक्त भूमि व्यवस्था प्रदान की, जो आज भी अपने आधुनिक रूप में विकास की दिशा में अग्रसर है। यदि यह सर्वेक्षण न हुआ होता, तो शायद बिहार आज इतने व्यवस्थित भू-अभिलेखों के साथ आगे न बढ़ पाता। भूमि पर अधिकार से लेकर योजनाओं के लाभ तक – सबकुछ इसी नींव पर टिका है। सो हम कह सकते हैं कि 1898-1920 का बिहार कैडस्ट्रल सर्वेक्षण, जिसका नेतृत्व एफ. डब्ल्यू. मुलैन ने किया था, एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी जिसने बिहार की भूमि व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया था।


