तो आज का जो मेरा मुद्दा है वो एकदम मजेदार और थोड़ा सा अलग है। कभी पीसीओएस के बारे में सुना है? या जानने की कोशिश की है की पीसीओएस है क्या?
आज के समय में क्यों लड़कियों को प्रेग्नन्सी में दिक्कत होती है? क्यों लड़कियों का स्वभाव अचानक से चिड़चिड़ा हो जाता है? पीसीओएस एक ऐसी बीमारी है, जो आज अधिकतर लड़कियों में होने लगी है। इसमें कभी-कभी चेहरे पर बाल उग आते हैं, उन्हे पीरियड्स ठीक से नहीं आता, या फिर बच्चा होने में दिक्कत होती है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि ये बीमारी इंटरसेक्स जैसी हो सकती है। अरे, ये क्या बात हुई? पीसीओएस सिर्फ और सिर्फ हार्मोन्स के गड़बड़ाने से होता है, और इंटरसेक्स वो लोग होते हैं, जिनका शरीर जन्म से न पूरी तरह लड़की जैसा होता है, न लड़के जैसा। आज मैं आपसे एक दोस्त की तरह बात करता हूँ ताकि मुझे समझने की हिम्मत मिल सके और आपको समझने का नजरिया।
पीसीओएस होता क्या है?
पीसीओएस एक ऐसी परेशानी है, जो अधिकतर लड़कियों को होती है। लगभग 100 में से 5% से 18% लड़कियों को। इसमें शरीर में कुछ खास रसायन, जिन्हें हार्मोन कहते हैं, ज़्यादा बनने लगते हैं। ये हार्मोन, जैसे टेस्टोस्टेरोन, आमतौर पर लड़कों में ज़्यादा होते हैं। इनके कारण चेहरे या छाती पर बाल आ सकते हैं, मुहाँसे निकल सकते हैं, या बाल पतले हो सकते हैं। कुछ लड़कियों के अंडाशय में छोटे-छोटे गांठ जैसे बनते हैं, पर ये हर बार नहीं होता। इसे ठीक करने के लिए खान-पान बदलना पड़ता है या दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं।
इंटरसेक्स क्या है?
अब ये इंटरसेक्स क्या बला है? आसान भाषा में, इंटरसेक्स वो लोग होते हैं, जिनका शरीर न तो पूरी तरह लड़की जैसा होता है, न लड़कों जैसा। मतलब, उनके शरीर में कुछ खास चीज़ें, जैसे हार्मोन या अंग, दोनों के बीच में होते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि पीसीओएस में भी ऐसा होता है, क्योंकि इसमें लड़कियों के शरीर में लड़कों जैसे हार्मोन बढ़ जाते हैं। इन हार्मोन्स की वजह से कुछ लड़कियाँ सोचती हैं, ‘मेरा शरीर शायद सामान्य लड़की जैसा नहीं है।’ ये सोच उनके लिए खास हो सकती है, क्योंकि वो अपनी पहचान को नए तरीके से देखती हैं।
डॉक्टर क्या कहते हैं?
मैंने मेरी पहचान के एक डॉक्टर से इस बारे में पूछा, तो उनका जवाब था की वो इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा की पीसीओएस एक हार्मोन की बीमारी है, न कि इंटरसेक्स। क्यों? क्योंकि पीसीओएस में जन्म के समय शरीर की बनावट या गुणसूत्र अलग नहीं होते। ये परेशानी बाद में, जैसे जवानी में, शुरू होती है। चेहरे पर बाल या गांठ जैसी चीज़ें इसके लक्षण हैं, पर ये जन्म से नहीं आते। उन्होंने कहा कि यार ये किसी भी ऐंगल से इंटरसेक्स नहीं है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि दोनों अलग-अलग हैं। पीसीओएस को दवाइयों और अच्छे खान-पान से ठीक किया जा सकता है, जबकि इंटरसेक्स में कभी-कभी ऑपरेशन चाहिए। फिर भी पता नहीं कुछ लोग, पीसीओएस और इंटरसेक्स की बहस क्यों करते हैं।
ये बहस क्यों ज़रूरी है?
शायद तुम सोच रहे होगे की इससे क्या फर्क पड़ता है? सोचना गलत नहीं है आपका! नाम और परिभाषाएँ हमें समझने में मदद करती हैं कि हम कौन हैं। अगर कोई लड़की, जिसे पीसीओएस है, ये सोचे कि वो इंटरसेक्स हो सकती है, तो शायद उसे अपने शरीर को समझने में आसानी हो। मेरे हिसाब से वो ये कह सकती है की मेरा शरीर अनोखा है, और मुझे इससे प्यार है। वहीं कुछ लड़कियाँ यह कहती होंगी की मैं बस औरत हूँ, मुझे कोई नया नाम नहीं चाहिए। दोनों ही बातें ठीक हैं। और ये मेरी सोच है। क्योंकि हर इंसान का नजरिया और सोच हमेशा अलग होती है।
ये पीसीओएस और इंटरसेक्स की बहस हमें बताती है कि हर इंसान का शरीर अलग हो सकता है। समाज अक्सर कहता है कि लोग या तो लड़के हैं या लड़कियाँ। लेकिन पीसीओएस दिखाता है कि ऐसा हमेशा नहीं होता। ये हमें सिखाता है कि हर किसी को उसी तरह स्वीकार करें, जैसे वो हैं।
एक कहानियाँ के नजरिए से समझते हैं
अब इसे और आसान करते हैं। मान लो, रिया नाम की लड़की है, जिसे पीसीओएस है। उसे चेहरे पर बाल और पीरियड्स की दिक्कत है। जब उसे इस बहस के बारे में पता चला, उसने सोचा, ‘वाह, ये मेरे लिए नया तरीका है खुद को समझने का।’ उसे इंटरसेक्स का विचार अच्छा लगा। लेकिन उसकी दोस्त नेहा, जिसे भी पीसीओएस है, वो कहती है, ‘मैं बस अपनी बीमारी ठीक करना चाहती हूँ। मुझे और नाम की ज़रूरत नहीं।’ दोनों की सोच अलग है, और यही इस बातचीत को मज़ेदार बनाती है। हर कोई अपनी कहानी खुद चुन सकता है। आप और मैं उनपर टिप्पणी करने वाले कोई नहीं हैं।
विज्ञान क्या कहता है?
अब थोड़ा विज्ञान देखें। पीसीओएस में अंडाशय कभी-कभी ज़्यादा टेस्टोस्टेरोन बनाते हैं। ये हार्मोन सामान्य लड़कियों में कम होता है। इससे चेहरा या छाती पर बाल उगते हैं। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि ये सिर्फ़ हार्मोन का असंतुलन है। ये इंटरसेक्स जैसी जन्मजात चीज़ नहीं। कुछ शोध कहते हैं कि गर्भ में ज़्यादा हार्मोन का असर पीसीओएस ला सकता है। लेकिन अभी ये पूरी तरह साफ़ नहीं है। और हाँ, हर लड़की के लक्षण अलग-अलग होते हैं।
समाज पर क्या असर?
ये बात सिर्फ़ डॉक्टरों की नहीं, समाज की भी है। कुछ लोग, जो ट्रांस या अलग पहचान वाले हैं, इसे इंटरसेक्स से जोड़ते हैं। दूसरी तरफ कुछ लड़कियां नहीं चाहतीं कि उनकी बीमारी को अजीब समझा जाए। वो बस इसे एक सामान्य समस्या की तरह ठीक करना चाहती हैं। दोनों पक्षों को समझना ज़रूरी है।
क्या किया जाना चाहिए?
अब सवाल है की क्या किया जाना चाहिए? तो भाई उन लड़कियों की बात सुनें, जिन्हें पीसीओएस है। उनका हौंसला बढ़ाएं न की उनकी आलोचना करें। कुछ इंटरसेक्स नाम पसंद करती हैं, कुछ नहीं। डॉक्टरों की सुनें, जो कहते हैं कि बीमारी को सही समझना ज़रूरी है। और वैज्ञानिकों की सुनें, जो और जवाब ढूँढ रहे हैं।
ये बहस सही-गलत की नहीं, बल्कि नई सोच की है। हम खुद को कैसे देखते हैं? जब हमारा शरीर समाज के नियमों में फिट नहीं होता, तो क्या करें? पीसीओएस हमें यही सवाल पूछने को कहता है।
बात को आगे बढ़ाने की जरूरत है
अगर तुम्हें या तुम्हारे किसी दोस्त को पीसीओएस है, तो ये बात तुम्हें अपनी लग सकती है। शायद ये तुम्हें खुद को नए तरीके से देखने का मौका दे। या शायद ये बस याद दिलाए कि तुम्हारा शरीर खास है। जो भी हो, इस बात को चलने दो। अपने विचार बताओ, सवाल पूछो, और पुरानी सोच को चुनौती दो। क्योंकि पीसीओएस की बात सिर्फ़ हार्मोन्स की नहीं, हमारी अपनी कहानी की है।
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