सुबह का वक्त था, लोग रोज़ की तरह अपने काम पर जा रहे थे। लेकिन 9 जुलाई 2025 की सुबह वडोदरा जिले में एक ऐसा मंजर लेकर आई जिसे कोई नहीं भूल पाएगा। एक 40 साल पुराना पुल अचानक टूट गया और उस पर से गुजर रहे कई वाहन सीधे महिसागर नदी में जा गिरे। इस वडोदरा पुल हादसे में अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है और पूरे देश में फिर से बुनियादी ढांचे की हालत पर बहस छिड़ गई है।
यह हादसा सुबह करीब 7 बजे हुआ, जब गगंभीरा पुल का एक हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा। यह पुल मध्य गुजरात को सौराष्ट्र से जोड़ता है और रोज़ाना सैकड़ों गाड़ियों का बोझ झेलता है। हादसे के वक्त उस पर दो ट्रक, दो वैन और एक ऑटो रिक्शा गुजर रहे थे। कुछ ही सेकंड में ये सभी वाहन पानी में समा गए। आस-पास के लोग भाग कर मदद के लिए पहुंचे, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उसके बाद राहत दल मौके पर पहुंचा और रेस्क्यू शुरू हुआ।
नदी से निकाले गए नौ लोगों में से पांच घायल हैं। सभी का इलाज वडोदरा के SSG अस्पताल में चल रहा है। अच्छी बात ये रही कि किसी की हालत नाज़ुक नहीं है। वहीं, शाम होते-होते दो और शव मिले, जिससे मरने वालों की संख्या बढ़कर 13 हो गई।
इस बीच एक तस्वीर ने पूरे हादसे की गंभीरता को उजागर कर दिया… एक बड़ा टैंकर पुल के टूटे हिस्से से अधर में लटका हुआ था। उसका ड्राइवर किसी तरह बाहर निकल आया, लेकिन फिर से उसे किसी ने नहीं देखा। वहीं नदी में गिरे एक ट्रक को घंटों की कोशिशों के बावजूद अब तक नहीं निकाला जा सका है।
अधिकारियों और इंजीनियरों की टीमें अगली सुबह तड़के ही मौके पर पहुंच गईं। कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक पूरी रात घटनास्थल पर डटे रहे। राज्य सरकार ने सड़क एवं भवन विभाग की टीमें भेजीं और NDRF के साथ मिलकर बचाव कार्य चलाया गया।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस घटना को बेहद दुखद बताया और मृतकों के परिवारों को ₹4 लाख और घायलों को ₹50,000 की सहायता की घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संवेदना जताई और अतिरिक्त ₹2 लाख की राहत राशि घोषित की।
यह पुल 1981 में बनना शुरू हुआ था और 1985 में आम जनता के लिए खोला गया था। लेकिन बीते कई वर्षों से इसकी हालत खराब बताई जा रही थी। 2017 में कांग्रेस ने मांग की थी कि इसे भारी वाहनों के लिए बंद किया जाए, लेकिन कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया। पुल पर ट्रैफिक चलता रहा… और अब ये हादसा हो गया।
विडंबना देखिए, सरकार ने इसी साल मार्च में ₹212 करोड़ की लागत से एक नया पुल बनाने की योजना को मंज़ूरी दी थी। डिज़ाइन और टेंडरिंग की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी थी। हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि ब्रिज डिज़ाइन के विशेषज्ञों की एक टीम को मौके पर भेजा गया है, जो तकनीकी कारणों की जांच कर जल्द रिपोर्ट देगी।
लेकिन सवाल सिर्फ इस पुल का नहीं है। पूरे देश में ऐसे सैकड़ों पुल हैं जो पुराने हो चुके हैं, फिर भी रोज़ाना इस्तेमाल हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या कोई इंतज़ार कर रहा था कि पहले कोई हादसा हो, तब मरम्मत की जाए? ऐसी घटनाएं सिर्फ लोगों की जान ही नहीं लेतीं, लोगों का सिस्टम पर भरोसा भी तोड़ देती हैं।
भारत में आज भी हजारों पुल ऐसे हैं जो आज़ादी के शुरुआती दशकों में बने थे और अब या तो मरम्मत मांग रहे हैं या पूरी तरह से बदले जाने की ज़रूरत में हैं। लेकिन मरम्मत या जांच अक्सर टाल दी जाती है… जब तक कुछ गिर न जाए।
पडरा और आस-पास के इलाकों के लोग अब भी सदमे में हैं। उनके लिए यह केवल पुल का टूटना नहीं था, यह उनके अपनों का हमेशा के लिए चले जाना था। अब उनके पास केवल दुख ही नहीं, गुस्सा भी है… इस बात का कि यह हादसा शायद टल सकता था।
अब नज़रें भविष्य पर हैं। सरकार ने जांच का वादा किया है, लेकिन लोग सिर्फ रिपोर्ट नहीं चाहते। उन्हें ठोस कार्रवाई चाहिए, तेज़ी से निर्माण और साफ़ जवाबदेही चाहिए। इंजीनियरों की टीम जल्द ही प्रारंभिक रिपोर्ट दे सकती हैं… शायद यह पल राज्य के बुनियादी ढांचे को सुधारने की दिशा में एक मोड़ बन जाए।
गंभीरा पुल का यह हादसा एक चेतावनी है… जब रखरखाव को टाल दिया जाता है, तो बुनियादी ढांचे जानलेवा बन जाते हैं। यह सिर्फ वडोदरा की कहानी नहीं है, यह पूरे देश के लिए एक जागरूक करने वाला संकेत है।


