कल्पना कीजिए, एक ऐसा देश जहां हर सुबह लोग यह सोचकर उठते हैं कि उनकी ज़मीन का एक टुकड़ा शायद आज समुद्र में समा जाए। यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर में बसे छोटे से देश तुवालु की सच्चाई है। ये छोटा-सा द्वीप देश है। यहां 11,000 लोग रहते हैं। जमीन समुद्र से बस दो मीटर ऊंची है। जलवायु परिवर्तन इसे निगल रहा है। समुद्र का पानी बढ़ रहा है। तुवालु अब डूबने की कगार पर है। वैज्ञानिक कहते हैं, अगले कुछ सालों में जमीन पानी में समा सकती है। पहले ही दो द्वीप डूब चुके हैं। 2023 में समुद्र का स्तर बहुत ऊंचा था। तीस सालों में 15 सेंटीमीटर बढ़ा। बाढ़ अब रोज की बात है। तूफान घर तोड़ रहे हैं, लोग डरे हुए हैं। फिर भी, तुवालु की सरकार हिम्मत नहीं हार रही। वो दुनिया से मदद मांग रही है।
जलवायु ने बिगाड़ी जिंदगी
तुवालु नौ छोटे-छोटे कोरल द्वीपों का देश है। ये द्वीप बहुत नाजुक हैं। समुद्र का पानी हर साल बढ़ रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं, 2050 तक ज्यादातर जमीन डूब जाएगी। 2080 तक शायद देश खाली हो जाए। लोग रोजमर्रा की जिंदगी में मुश्किल झेल रहे हैं। बाढ़ बार-बार आती है। ऊंची लहरें घरों को बहा ले जाती हैं। खेती करना मुश्किल हो गया। पीने का पानी गंदा हो रहा है। बीमारियां बढ़ रही हैं। तुवालु ने दुनिया से मदद मांगी है। वो जलवायु परिवर्तन से लड़ रहा है। लेकिन बड़े देश जिम्मेदारी नहीं ले रहे। तुवालु छोटा देश है, उसकी ताकत कम है।
ऑस्ट्रेलिया बनेगा नया घर
तुवालु की सरकार ने हिम्मत दिखाई है। 2023 में ऑस्ट्रेलिया और तुवालु के बीच में एक संधि हुई। इसके तहत हर साल 280 लोग ऑस्ट्रेलिया जा सकेंगे। उन्हें वहां पक्का घर मिलेगा। स्वास्थ्य, शिक्षा और नौकरी का हक मिलेगा। ये योजना जून में शुरू हुई। 16 जून से 18 जुलाई तक लोगों ने रजिस्ट्रेशन किया। 8,750 लोगों ने आवेदन भरा। परिवारों ने साथ में नाम लिखवाया। 25 जुलाई को लॉटरी हुई। 280 लोग चुने गए। वो इस साल ऑस्ट्रेलिया जाएंगे। ये बस शुरुआत है। अगले 10 सालों में हजारों लोग जा सकते हैं। तुवालु की आबादी का चालीस फीसदी वहां बस सकता है।
दुनिया का पहला बड़ा पलायन
तुवालु का पलायन इतिहास में अनोखा है। पूरा देश कहीं और बस रहा है। ये दुनिया में पहली बार हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया ने वादा किया है, लोग सम्मान से बसेंगे। वहां की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने ये बात कही। तुवालु के प्रधानमंत्री फेलेटी तेयो ने दुनिया से अपील की। वो चाहते हैं, छोटे देशों की मदद हो। समुद्र के बढ़ते स्तर से बचाव की जरूरत है। तुवालु अपनी संस्कृति बचाना चाहता है। वो डिजिटल राष्ट्र बनने की कोशिश कर रहा है। जमीन भले खो जाए, संस्कृति जिंदा रहेगी। कुछ लोग न्यूजीलैंड भी जा सकते हैं। हर साल 4% आबादी जा सकती है। विशेषज्ञ जेन मैकएडम का कहना है, दस साल में 40% लोग जा सकते हैं। कुछ लोग वापस भी आ सकते हैं। योजना को लचीलापन दिया गया है।
तुवालु की कहानी हमें झकझोरती है। जलवायु परिवर्तन बड़ी समस्या है। छोटे देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बड़े देशों को अब जिम्मेदारी लेनी होगी। कार्बन उत्सर्जन कम करना जरूरी है। तुवालु जैसे देशों को मदद चाहिए। वो अकेले नहीं लड़ सकते। फिर भी, तुवालु के लोग हिम्मत दिखा रहे हैं। वो नया जीवन शुरू करने को तैयार हैं। अपनी संस्कृति को साथ ले जाएंगे। दुनिया इस पलायन को देख रही है, ये पहला उदाहरण है। आगे और देशों का नंबर आ सकता है। तुवालु ने रास्ता दिखाया, अब दुनिया को साथ देना होगा। समय तेजी से भाग रहा है। अगर अभी नहीं जागे, तो और देश डूब सकते हैं। तुवालु के लोग मजबूत हैं। वो नई शुरुआत करेंगे। लेकिन दुनिया को उनकी मदद करनी होगी। ये कहानी हमें सबक देती है। जलवायु संकट को अब रोकना होगा।
तुवालु शायद आने वाले दशकों में नक्शे से गायब हो जाए, लेकिन यह कहीं सारे सवाल छोड़ जाएगा – क्या दुनिया बाक़ी देशों को भी इसी अंजाम तक पहुंचने देगी, या फिर समय रहते जलवायु संकट पर काबू पा लेगी?


