2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज पहली बार मैदान में थी। चुनाव नतीजों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन इसकी उपस्थिति ने पूरे राज्य में राजनीतिक चर्चा को बदल दिया। इसलिए यह कहना गलत होगा कि जन सुराज की शुरुआत बेअसर रही। इसके उलट, पार्टी ने वोट शेयर, मुकाबलों की नज़दीकी और कुछ क्षेत्रों में दिखे प्रभाव के आधार पर खुद को एक उभरते राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया है।
जन सुराज ने कुल 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन किसी भी सीट पर जीत दर्ज नहीं हो सकी। शुरुआती रुझानों में पार्टी कुछ सीटों पर बढ़त में भी थी, लेकिन मतगणना के आगे बढ़ने के साथ यह बढ़त खत्म हो गई। हालांकि वोट शेयर के स्तर पर पार्टी ने करीब 3.44 प्रतिशत मत हासिल किए। यह संख्या भले कम लगे, लेकिन एक नए संगठन के लिए यह शुरुआती स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण संकेत है। इन चुनावों में पार्टी ने संगठनात्मक मजबूती, मुद्दा आधारित राजनीति और अपनी अलग जन-संपर्क शैली के आधार पर ध्यान खींचा।
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि 35 सीटों पर जन सुराज को मिले वोट उस सीट के जीतने वाले मार्जिन से ज्यादा थे। इसका अर्थ यह है कि इन सीटों पर जन सुराज की उपस्थिति ने अंतिम परिणामों को प्रभावित किया हो सकता है। यानी अगर पार्टी चुनाव मैदान में न होती, तो इनमें से कई सीटों का परिणाम बदल सकता था। यह दिखाता है कि भले सीट न मिली हो, लेकिन जन सुराज ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को हिलाया जरूर है।
वहीं दूसरी तरफ, पार्टी को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। 238 में से 236 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। यह बताता है कि राज्य के बड़े हिस्सों में पार्टी अपनी पकड़ अभी मजबूत नहीं कर पाई है। कई सीटों पर तो जन सुराज को NOTA से भी कम वोट मिले। यह पार्टी के लिए एक संकेत है कि उसे कई इलाकों में संगठन विस्तार और स्थानीय जुड़ाव पर और काम करने की जरूरत है।
इसके बावजूद, कुछ इलाकों में पार्टी का प्रभाव साफ दिखाई दिया। प्रशांत किशोर के गांव कोनर में पार्टी को मजबूत समर्थन मिला। यह दिखाता है कि पार्टी की “जन आधारित मॉडल” और लंबे समय तक किए गए पैदल अभियानों का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में जमीन पर नजर आया। इसी तरह, पूर्वी बिहार के कई क्षेत्रों में भी जन सुराज ने पारंपरिक दलों की तुलना में उल्लेखनीय समर्थन पाया।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि जन सुराज का यह प्रदर्शन असफलता नहीं बल्कि एक राजनीतिक शुरुआत है। प्रशांत किशोर ने चुनाव से पहले राज्यभर की पदयात्राओं और जनसंवाद कार्यक्रमों के माध्यम से बेरोजगारी, विकास, पलायन और शिक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। यह मुद्दा आधारित राजनीति बिहार में एक नई तरह की राजनीति का संकेत दे रही है।
आने वाले वर्षों में पार्टी की असली चुनौती संगठन को मजबूत करना, स्थानीय नेतृत्व विकसित करना और अपनी राजनीतिक पकड़ को बढ़ाना होगी। यदि यह रणनीति सफल हुई, तो यह “जीरो सीट” वाला चुनाव परिणाम भविष्य में बड़ी सफलता की ओर पहला कदम साबित हो सकता है। इस चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि भले जन सुराज सत्ता से दूर रही, लेकिन उसने बिहार की राजनीति में एक नई आवाज और वैकल्पिक सोच को जन्म दिया है। इससे राज्य की चुनावी राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना खुल गई है।
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