14 फरवरी की तारीख दुनिया के कई हिस्सों में प्रेम और उत्सव से जुड़ी मानी जाती है। लेकिन भारत में यह दिन एक और गहरी स्मृति के साथ दर्ज है। 14 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 40 जवान उस दिन शहीद हुए। यह केवल एक सुरक्षा घटना नहीं थी, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दिल पर लगा ऐसा घाव था, जिसने राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। इसलिए 14 फरवरी अब सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि शहादत और संकल्प की अमर विरासत है।
उस दोपहर जब विस्फोटकों से भरी एक गाड़ी ने सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाया, तो पल भर में कई घरों की दुनिया बदल गई। किसी मां ने अपना बेटा खोया, किसी पत्नी ने अपना जीवनसाथी, किसी बच्चे ने अपना पिता। शहीदों की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि यह दुख केवल उन परिवारों का नहीं था, बल्कि पूरे देश का था। तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर जब अपने-अपने गांव पहुंचे, तो हर आंख नम थी और हर हृदय गर्व और पीड़ा के मिश्रित भाव से भरा हुआ था।
पुलवामा की घटना ने देश को केवल शोक में नहीं डुबोया, बल्कि एकजुट भी किया। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर पूरा राष्ट्र अपने जवानों के साथ खड़ा दिखाई दिया। यह वह क्षण था जब भारत ने दुनिया को दिखाया कि आतंकवाद की चुनौती के सामने वह झुकेगा नहीं। 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक कर यह संदेश दिया कि शहादत का उत्तर केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से भी दिया जाएगा।
हालांकि इस विरासत का अर्थ केवल प्रतिकार तक सीमित नहीं है। यह विरासत हमें जिम्मेदारी भी सौंपती है। यह याद दिलाती है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सीमा पर तैनात सैनिकों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। जब हम एकजुट रहते हैं, जब हम नफरत और विभाजन से दूर रहते हैं, तब हम उन शहीदों के सपनों का सम्मान करते हैं जिन्होंने देश की एकता और सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
14 फरवरी की स्मृति हमें यह भी सिखाती है कि सुरक्षा और शांति सहज रूप से प्राप्त नहीं होतीं। इनके पीछे त्याग और बलिदान की लंबी कहानी होती है। पुलवामा के बाद सुरक्षा व्यवस्थाओं की समीक्षा हुई, काफिलों की आवाजाही के नियमों में बदलाव किए गए और खुफिया समन्वय को मजबूत करने के प्रयास हुए। यह सब उस दर्दनाक घटना से मिली सीख का हिस्सा है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण विरासत भावनात्मक है। शहीदों के परिवार आज भी उस दिन को याद करते हैं, पर उनकी आंखों में केवल आंसू नहीं, बल्कि गर्व भी होता है। उनके प्रियजनों ने राष्ट्र की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। यह गर्व और पीड़ा का संगम ही उस विरासत की पहचान है, जिसे कोई समय मिटा नहीं सकता।
आज जब 14 फरवरी आती है, तो देश एक क्षण के लिए ठहरकर उन 40 वीरों को याद करता है। यह स्मरण केवल श्रद्धांजलि भर नहीं है। यह संकल्प का नवीनीकरण है। यह याद दिलाता है कि हम शांति चाहते हैं, परंतु सुरक्षा के प्रश्न पर समझौता नहीं करेंगे।
इसलिए 14 फरवरी सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह उन शहीदों की अमर विरासत है, जिन्होंने अपने आज को हमारे कल के लिए समर्पित कर दिया। यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम उनके सपनों के भारत के लिए क्या कर रहे हैं। क्या हम एकजुट हैं, क्या हम जिम्मेदार हैं, और क्या हम उस बलिदान के योग्य नागरिक बनने की कोशिश कर रहे हैं।
जब भी यह तारीख आती है, वह हमें झुकने नहीं देती। वह हमें याद दिलाती है कि आंसुओं के बीच भी राष्ट्र का माथा ऊंचा रह सकता है। यही 14 फरवरी की सच्ची पहचान है। यही हमारे शहीदों की अमर विरासत है।
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