मुंबई की गर्मियाँ असहनीय होती हैं। कंक्रीट की इमारतों से गर्मी रात तक निकलती रहती है और मॉनसून में नमी पूरे शहर में घुल जाती है। बारिश जब आती है, तो राहत नहीं बल्कि जलजमाव, फंसी ट्रेनें और ठप सड़कें लेकर आती है। इसी मुश्किल भरे मौसम के बीच मुंबई क्लाइमेट वीक २०२६ शुरू हुआ। इसमें नीति निर्माता, कॉर्पोरेट और वैश्विक जलवायु संस्थान के नेता, और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल हुए, जो सीओपी३० की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
सम्मेलन का उद्देश्य मुंबई को शहरी जलवायु समाधान के लिए प्रयोगशाला बनाना है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा महत्वाकांक्षा और जलवायु सहनशीलता योजना पर जोर दिया। भारत ने २०३० तक ५०० GW गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है और २०२५ के अंत तक १९० GW से अधिक की नवीकरणीय क्षमता स्थापित हो चुकी थी। महाराष्ट्र सौर ऊर्जा में अग्रणी है और राज्य के कई हिस्सों में ग्रामीण विद्युतीकरण में मदद मिल रही है।
हालांकि सवाल यह है कि क्या ऐसे सम्मेलनों में किए गए वादे धरातल पर पूरे होते हैं। भारत में निवेश सम्मेलनों में बड़े एमओयू (एमओयू) साइन किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, २०१८ के मैग्नेटिक महाराष्ट्र सम्मेलन में लगभग ₹१२.१ लाख करोड़ के एमओयू हुए थे, लेकिन केवल ₹३ लाख करोड़ की परियोजनाएं ही अमल में आईं। यानी लगभग २५ प्रतिशत ही कार्यान्वित हुआ।
कुछ मामलों में एमओयू सफल रहे। टाटा पावर के सौर विस्तार और रिलायंस इंडस्ट्रीज के जामनगर सोलर मॉड्यूल प्रोजेक्ट ने कागज से बाहर निकलकर सोलर क्षमता और रोजगार सृजन में योगदान दिया। वहीं, कई बड़े औद्योगिक एमओयू अब भी वित्त, भूमि और पर्यावरण मंजूरी की बाधाओं के कारण अधूरे हैं।
विपक्ष नेता आदित्य ठाकरे ने कहा कि जलवायु चर्चा केवल दिखावे की नहीं, बल्कि मापनीय शहर सहनशीलता पर केंद्रित होनी चाहिए। उन्होंने मुंबई की बार-बार बाढ़ और अपर्याप्त जलनिकासी की ओर ध्यान दिलाया।
कुछ आलोचक वैश्विक संस्थाओं पर स्थानीय नीति को प्रभावित करने का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि बाहरी फंडिंग से भारत की स्वायत्तता सीमित हो सकती है। लेकिन भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएं राष्ट्रीय स्तर पर तय होती हैं और बाहरी फंडिंग केवल सहयोगात्मक है, कोई कानूनी नियंत्रण नहीं।
मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिमी तट पर चरम वर्षा की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। मुंबई में मॉनसून के दौरान औसत आर्द्रता ७०% से अधिक रहती है और शहरी गर्मी द्वीप प्रभाव और अधिक महसूस होता है।
मुंबई क्लाइमेट वीक की सफलता भाषणों में नहीं, बल्कि परियोजनाओं के समयबद्ध और पारदर्शी क्रियान्वयन में तय होगी। तिमाही रिपोर्टिंग, तृतीय-पक्ष ऑडिट और मील के पत्थर पर खुलासे विश्वास बढ़ा सकते हैं।
मुंबई में जलवायु परिवर्तन सिर्फ शब्दों में नहीं है। यह जुलाई की बाढ़ और मई की दमघोंटू गर्मी में महसूस होता है। शहर को घोषणाओं की नहीं, बल्कि बेहतर जलनिकासी, तटीय सुरक्षा और भरोसेमंद स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत है।
यदि राजनीतिक इच्छा, कॉर्पोरेट निवेश और सार्वजनिक जवाबदेही एक साथ आए, तो मुंबई क्लाइमेट वीक सार्थक साबित हो सकता है। अन्यथा यह उन कई सम्मेलनों की तरह रह जाएगा जिनके वादे केवल नमी में घुल गए। असली फर्क कागज पर हस्ताक्षर में नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे और जरूरतमंद पड़ोसियों की सुरक्षा और शहर की सहनशीलता में होगा।
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