१९ फरवरी २०२६ को महाराष्ट्र सरकार ने मालाड-मालवणी के मुक्तेश्वर इलाके में ११८ एकड़ जमीन धारावी पुनर्विकास परियोजना को सौंप दी। यह जमीन उन धारावीकरों के पुनर्वास के लिए है जो धारावी के भीतर यथास्थान पुनर्वास के पात्र नहीं हैं। नवभारत मेगा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड यानी NMDPL – जो महाराष्ट्र सरकार और अडानी समूह का संयुक्त उपक्रम है – इस जमीन पर पुनर्वास इमारतें बनाएगा। एक जमीन का हस्तांतरण। लेकिन इसके पीछे एक पूरा शहर अपनी पहचान, अपनी जगह और अपने भविष्य के लिए जूझ रहा है।
तीसरी जमीन, लेकिन पहला सवाल अभी भी वही है
मालाड की यह जमीन परियोजना को मिली तीसरी बड़ी भूखंड है। इससे पहले कुर्ला में मदर डेयरी की जमीन और मुलुंड में जमास साल्टपैन की जमीन मिल चुकी है। मुक्तेश्वर में कुल १४० एकड़ चिह्नित थे जिनमें से ११८ एकड़ सौंपे गए हैं। शेष २२ एकड़ अभी मुकदमेबाजी में फँसे हैं। इस जमीन का कुल मूल्य करीब ५४० करोड़ रुपये आँका गया है। NMDPL ने विकास अधिकारों के लिए १३५ करोड़ रुपये प्रीमियम के तौर पर चुका दिए हैं। जमीन का स्वामित्व DRP और SRA के पास रहेगा जबकि विकास अधिकार SPV के हाथ में होंगे। यह ढाँचा समझना जरूरी है क्योंकि यहीं से जवाबदेही की रेखा खिंचती है।
कौन पात्र है और कौन नहीं – यही असली दरार है
मालाड की इस जमीन पर मुख्य रूप से वे लोग बसाए जाएँगे जो १ जनवरी २०११ के बाद और १५ नवंबर २०२२ से पहले धारावी में आकर बसे। इनके अलावा ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले निवासी भी इस श्रेणी में आते हैं। पात्रता की यह कट-ऑफ तारीख कोई तकनीकी विवरण नहीं है। यह हजारों परिवारों की नियति तय करती है। जो २०११ से पहले से धारावी में हैं उन्हें धारावी के भीतर यथास्थान पुनर्वास मिलेगा। जो बाद में आए उन्हें मालाड, मुलुंड या कुर्ला भेजा जाएगा। और जो पात्रता की किसी भी श्रेणी में नहीं आते उनके लिए किराये के आवास का प्रावधान है। धारावी में दशकों से रहने वाले कई परिवारों के पास दस्तावेज नहीं हैं। उनके लिए यह कट-ऑफ एक दीवार बन सकती है।
मालाड के निवासी भी नाखुश हैं
दिलचस्प बात यह है कि विरोध केवल धारावी तक सीमित नहीं रहा। जनवरी और फरवरी २०२५ में मुलुंड और मालाड के निवासियों ने सड़क पर उतरकर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि बाहर से लाए गए हजारों लोग उनके इलाके के बुनियादी ढाँचे पर अतिरिक्त बोझ डालेंगे। पानी, सड़क, सीवेज, स्कूल – ये सब पहले से ही दबाव में हैं। यह विरोध महज स्थानीय असुविधा की भावना नहीं था। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा था जो हर बड़े शहरी पुनर्वास प्रकल्प में उठता है – एक इलाके की समस्या को दूसरे इलाके में धकेलने से समस्या हल नहीं होती।
धारावी की अर्थव्यवस्था और विस्थापन का खतरा
धारावी सिर्फ एक बस्ती नहीं है। यह एक जीवित आर्थिक तंत्र है। चमड़े का काम, कपड़ा उद्योग, मिट्टी के बर्तन, रिसाइक्लिंग – यहाँ का अनुमानित वार्षिक कारोबार आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया जाता है। इस बस्ती में रहने वाले अधिकांश लोगों का रोजगार धारावी की गलियों से जुड़ा है। उन्हें मालाड या मुलुंड भेजना उनकी छत तो दे सकता है लेकिन रोजी छीन भी सकता है। नई इमारत में ३०० या ३५० वर्ग फुट का घर और घर से दो घंटे दूर काम – यह पुनर्वास है या विस्थापन का नया नाम है। यह सवाल अभी तक किसी सरकारी दस्तावेज में ठीक से नहीं आया है।
५४० एकड़ की योजना और सात साल की समयसीमा
सरकार ने मुंबई महानगर क्षेत्र में कुल ५४० एकड़ जमीन चिह्नित की है। इस पर करीब सवा लाख से डेढ़ लाख घर बनाए जाने हैं और लगभग दस लाख निवासियों का पुनर्वास होना है। कुर्ला, कांजुरमार्ग, भांडुप, मुलुंड और देवनार की जमीनें इसमें शामिल हैं। सात साल की समयसीमा तय है। महिम में रेलवे की जमीन पर पहले चरण में ३० मंजिला इमारतों में दस हजार फ्लैट बन रहे हैं। देवनार डंपिंग ग्राउंड की जमीन पर पुनर्वास की योजना है लेकिन पर्यावरणविदों ने वहाँ की जहरीली जमीन को लेकर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं जिनका अभी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया है।
स्वामित्व और विकास अधिकारों का पेचीदा सवाल
इस पूरी परियोजना में एक बात बार-बार दोहराई जाती है कि जमीन का स्वामित्व DRP और SRA के पास रहेगा। लेकिन विकास अधिकार NMDPL के पास होंगे। यह भेद व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है। विकास अधिकार का अर्थ है कि क्या बनेगा, कितना बनेगा और व्यावसायिक घटक कहाँ और कितना होगा – यह सब निजी उपक्रम तय करेगा। धारावी की २५९ हेक्टेयर जमीन मुंबई के सबसे महँगे इलाकों के बीच है। इस जमीन का व्यावसायिक मूल्य अकल्पनीय है। पुनर्वास आवास की आड़ में यह व्यावसायिक घटक ही परियोजना की असली आर्थिक चालक शक्ति है। इसीलिए विपक्ष इसे TDR घोटाला कहता है और सरकार इसे शहरी नवीकरण।
कागज पर घर, जमीन पर सवाल
महाराष्ट्र सरकार का यह कदम परियोजना को गति देने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। जमीन मिलना निर्माण की पहली शर्त है। लेकिन इमारतें बन जाने से पुनर्वास पूरा नहीं होता। पात्रता की पारदर्शिता, रोजगार की निरंतरता, बुनियादी ढाँचे की तैयारी और स्थानीय निवासियों की आपत्तियों का समाधान – ये सब उतने ही जरूरी हैं। धारावी के लोग दशकों से मुंबई की अर्थव्यवस्था को चलाते आए हैं। उनके साथ न्याय सिर्फ छत देने से नहीं होगा। न्याय तब होगा जब उनकी जगह, उनका काम और उनकी पहचान – तीनों सुरक्षित रहें।


