यह घुमाव नहीं है। यह एक चीख़ है।
मुंबई के बांद्रा-कुर्ला परिसर से महज़ तीन किलोमीटर की दूरी पर एक शहर है। उस शहर में कोई बड़ा बाज़ार नहीं, कोई चौड़ी सड़क नहीं, कोई बंद-दरवाज़ों वाली कॉलोनी नहीं। लेकिन उस शहर में हर रोज़ सुबह दस बजे से पहले चमड़े की सिलाई शुरू हो जाती है, कचरे की छँटाई चालू हो जाती है, मिट्टी के बर्तन भट्टी में जाने लगते हैं। यह शहर धारावी है। और अब इस शहर के लोग जिन्हें दुनिया झुग्गी-वाले कहती है पंद्रह हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति में अपनी ज़िंदगी का दौरा करा रहे हैं।
बाहर से देखने वालों ने इसे “ग़रीबी दर्शन” कहा। कुछ ने हँसकर टाल दिया। कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। लेकिन जो इस पंद्रह हज़ार के टिकट की असली भाषा समझते हैं, उनके लिए यह एक हताश, गुस्साई, और अत्यंत समझदार राजनीतिक घोषणा है।
वो ज़मीन जिसे झुग्गी कहकर हड़पा जा रहा है
धारावी को समझने के लिए पहले एक सच्चाई समझिए। धारावी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी नहीं है यह एशिया की सबसे बड़ी अनगिनत छोटे-छोटे कारोबारों की नगरी है। चमड़ा, कपड़ा, कचरा बीनना, मिट्टी के बर्तन बीस हज़ार से अधिक छोटी कारखाने मिलकर हर साल लगभग आठ हज़ार करोड़ रुपये का उत्पादन करते हैं। यह एक ऐसी बस्ती है जो मुंबई के बीचोंबीच, हवाई अड्डे के पास बैठी है और जो दशकों से खुद अपने दम पर चल रही है।
लेकिन सरकार की नज़र में यह ज़मीन “विकसित” होनी चाहिए। 2022 में अडानी समूह को इस परियोजना की अस्सी फ़ीसदी हिस्सेदारी सौंप दी गई। गौतम अडानी ने कहा कि यह परियोजना धारावी के निवासियों को उनका सम्मान वापस दिलाएगी। धारावीकरों ने पूछा किसने कहा कि हमारा सम्मान गया हुआ है?
पंद्रह हज़ार का टिकट: विरोध है या हार?
इस दौरे को “ग़रीबी दर्शन” कहकर नज़रअंदाज़ करना उस आदमी की तरह है जो अदालत में किसी की आख़िरी दलील को “बस एक भाषण” कहे। यह दौरा एक साथ कई काम कर रहा है।
पहला यह दुनिया को दिखा रहा है कि धारावी में ग़रीबी है, हाँ, लेकिन उससे भी बड़ी एक जीवंत, मेहनती, स्वाभिमानी दुनिया है। जो पंद्रह हज़ार देकर आएगा वो सिर्फ टूटी-फूटी दीवारें नहीं देखेगा वो देखेगा कि एक चमड़े का कारीगर किस कुशलता से काम करता है, एक कुम्हार के हाथों में कितनी पीढ़ियों का हुनर है।
दूसरा यह एक आर्थिक जवाब है। जब अडानी और सरकार कहती है कि यह ज़मीन विकसित होनी चाहिए, तो धारावीकर कह रहे हैं यह ज़मीन पहले से विकसित है। हमने इसे विकसित किया है। आओ और देखो।
तीसरा और यह सबसे तीखी बात है जब आपकी ज़मीन पर कोई और 95000 करोड़ की योजना बना रहा हो और आपको उसमें से कुछ नहीं मिल रहा, तो आप वही करते हैं जो आपके पास है। धारावीकरों के पास उनकी ज़िंदगी है। उन्होंने उसी का टिकट बनाया। यह लालच नहीं है। यह बेबसी की सबसे रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
जो उजाड़ा जा रहा है वो घर नहीं एक पूरा तंत्र है
धारावी की असली ताक़त उसका आपसी जुड़ाव है। एक कचरा बीनने वाले का कचरा दूसरे का कच्चा माल है। एक दर्ज़ी की कतरन तीसरे के काम आती है। यह जाल दशकों में बना है। इसे तोड़कर लोगों को ऊँची-ऊँची इमारतों में बिठा दो सारा कारोबार ख़त्म।
एक कुम्हार जो तीसरी पीढ़ी से धारावी में काम कर रहा है, उसकी तकलीफ़ समझिए। उसके काम के लिए खुली जगह चाहिए। भट्टी चाहिए। दसवीं मंज़िल के कमरे में वो भट्टी कहाँ रखेगा? उसके नाज़ुक बर्तन ऊपर-नीचे ले जाते वक़्त टूट जाएंगे। यह एक आदमी की तकलीफ़ नहीं है यह धारावी की पूरी अर्थव्यवस्था का सच है।
और जो लोग पात्रता की सूची में नहीं हैं जो सन दो हज़ार के बाद आए उन्हें कहाँ भेजा जा रहा है? देवनार के कूड़े के मैदान की तरफ़। उन ज़मीनों पर जिन्हें अदालतें पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घोषित कर चुकी हैं। यानी जो पात्र हैं उन्हें ऊँची इमारत में बंद करो, जो अपात्र हैं उन्हें कूड़े के मैदान पर बसाओ। इसे विकास कहते हैं।

वो सर्वेक्षण जो भरोसा नहीं जीत सका
जब अडानी की टीम धारावी में घुसी, तो बड़े-बड़े इलाक़ों ने दरवाज़ा बंद कर लिया। कुम्हारों की बस्ती ने मना किया। चमड़े के कारीगरों की गली ने मना किया। एक दर्ज़ी जो बीस साल से धारावी में काम कर रहा है, उसे ज़बानी भरोसा दिया गया कि दुकान के बदले दुकान मिलेगी। लेकिन लिखित में कुछ नहीं। कोई नक़्शा नहीं दिखाया गया। कोई योजना साझा नहीं की गई।
ज़बानी भरोसा। कोई लिखित वादा नहीं। 95000 करोड़ की योजना में।
झुग्गी के करोड़पति लेकिन कौन से?
2008 में एक अंग्रेज़ी फ़िल्म आई जिसमें धारावी की गलियाँ थीं। दुनिया ने धारावी को एक पर्दे की पृष्ठभूमि की तरह देखा। पुरस्कार मिले। सैलानी आए। अब अडानी कहते हैं कि वो चाहते हैं कि धारावी करोड़पति पैदा करे। यह सुनने में अच्छा लगता है।
लेकिन एक सवाल है। वो करोड़पति कौन होंगे? क्या वो वही कुम्हार होगा जिसकी भट्टी तीसरी पीढ़ी से जल रही है? क्या वो वही कचरा बीनने वाला होगा जिसने धारावी की अर्थव्यवस्था को खड़ा किया? या वो करोड़पति वो होगा जिसने यह ज़मीन ली और उस पर आलीशान मकान बनाकर ऊँचे दामों पर बेचेगा?
पंद्रह हज़ार का असली हिसाब
दुनिया भर में ग़रीब बस्तियों का पर्यटन एक पुरानी बहस है। ब्राज़ील की झुग्गियाँ। केन्या की बस्तियाँ। हर जगह एक ही नैतिक सवाल उठता है क्या किसी की ग़रीबी को तमाशा बनाना उचित है? लेकिन धारावी का पंद्रह हज़ार वाला दौरा उस श्रेणी में नहीं आता।
यह दौरा किसी यात्रा कंपनी ने नहीं बनाया। यह दौरा उन लोगों ने बनाया जो जानते हैं कि उनकी ज़मीन जल्द ही आलीशान इमारतें बन जाएगी। जो जानते हैं कि उनका नाम पात्रता की सूची में है या नहीं यह भी तय नहीं। जो जानते हैं कि उनकी अर्थव्यवस्था जिसे उन्होंने दशकों में खड़ा किया एक झटके में औपचारिक बनाने के नाम पर ख़त्म हो सकती है।
वो पंद्रह हज़ार का टिकट एक दस्तावेज़ है। देखो हम यहाँ हैं। हम सच्चे हैं। हमारा काम सच्चा है। हमारी ज़िंदगी सच्ची है। यह विरोध है। यह बेबसी है। और इसमें एक गहरी, कड़वी विडंबना भी है जिस ग़रीबी को मिटाने के नाम पर यह योजना चल रही है, उसी ग़रीबी का टिकट बेचकर धारावीकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
एक सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा
धारावी में तीस साल से सब्ज़ी बेचने वाली एक बुज़ुर्ग औरत है। वो कहती है हमने धारावी को दशकों तक सींचा है। अब अचानक कहा जा रहा है कि बेहतर घर में जाओ। लेकिन किसी ने पूछा क्या कि हम जाना चाहते हैं?
यही वो सवाल है जो इस पूरी योजना के केंद्र में होना चाहिए था। विकास के नाम पर जब भी किसी को उसकी जगह से हटाया जाता है चाहे नर्मदा हो, चाहे नोएडा हो, चाहे धारावी एक ही सवाल होता है। यह विकास किसके लिए है? धारावी के लोगों के लिए? या उस ज़मीन के लिए जिस पर वो रहते हैं?
पंद्रह हज़ार का वो टिकट उसी सवाल का जवाब माँग रहा है।
Subscribe Deshwale on YouTube


