बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी को महत्वाकांक्षा की कोई कमी नहीं है। आयुक्त भूषण गगरानी ने फ़रवरी के आख़िरी दिनों में २०२६-२७ का बजट पेश किया। यह बजट ₹८०,९५२.५६ करोड़ का था। देश के सबसे अमीर नगर निगम का यह अब तक का सबसे बड़ा बजट है। लेकिन इस विशाल रक़म के भीतर एक ख़ास प्रस्ताव है जिसने सबसे अधिक ध्यान खींचा। शहर भर में ११५० CCTV कैमरों पर AI आधारित वीडियो एनालिटिक्स लगाने की योजना। इस पर ₹४६.६७ करोड़ ख़र्च होंगे।
इस योजना के तहत मौजूदा ५०० कैमरों पर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग सॉफ़्टवेयर लगाया जाएगा और ६५० नए कैमरे जोड़े जाएँगे। मक़सद है अवैध कूड़ा फेंकना, खुलेआम गंदगी, फुटपाथ पर क़ब्ज़ा, जलभराव और उफनते कूड़ेदानों पर नज़र रखना। लाइव फ़ीड मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के साथ साझा की जाएगी।
काग़ज़ पर यह एक दमदार बदलाव लगता है। असल ज़िंदगी में जो सवाल उठते हैं वे इस तकनीक से कहीं ज़्यादा उलझे हुए हैं।
वह समस्या जिसे ठीक करने की कोशिश है
मुंबई की नागरिक व्यवस्था की कमज़ोरियाँ किसी से छिपी नहीं हैं। धारावी, कुर्ला, मलाड या भांडुप की किसी भी सुबह वहाँ निकल जाइए। फुटपाथ पर बरसों पुराने अतिक्रमण मिलेंगे। एक ही कोने में दशकों से पड़ा कूड़ा मिलेगा। नालियाँ ठोस कचरे से भरी मिलेंगी। वार्ड स्तर के कर्मचारियों के पास न पर्याप्त संख्या है और कई बार काम करने की इच्छाशक्ति भी नहीं दिखती। बीएमसी के बजट में वर्षों से कचरा-विरोधी मार्शल तैनात करने का प्रावधान होता रहा है लेकिन नतीजे हर कोई देख सकता है।
AI कैमरों का प्रस्ताव इसी कमी को दूर करने की कोशिश है। बीएमसी ने ख़ुद माना है कि उसके पास फ़िलहाल कोई बुनियादी घटना-अलर्ट सिस्टम नहीं है और मैनुअल निगरानी की सीमाएँ ज़ाहिर हैं। वीडियो एनालिटिक्स से उल्लंघन अपने आप पकड़े जाएँगे और वार्ड दफ़्तरों तक तुरंत अलर्ट पहुँचेगा।
यह समस्या की एक सही पहचान है। लेकिन यह पहचान एक ज़्यादा ज़रूरी सवाल से बचती है। मैनुअल सिस्टम इतने सालों तक क्यों नाकाम रहा? कैमरा एक उल्लंघन की सूचना दे सकता है। वह यह नहीं सुनिश्चित कर सकता कि वार्ड अधिकारी उस अलर्ट पर कुछ करे, या कि जिस पर कार्रवाई होनी है वह राजनीतिक रूप से असुविधाजनक तो नहीं। निगरानी से डेटा मिलता है। जवाबदेही नहीं।
दूसरे शहरों का तजुर्बा
दूसरे शहरों ने यह कोशिश की है। नतीजे मिले-जुले हैं।
सूरत का उदाहरण सबसे क़रीबी है। सूरत नगर निगम ने ३,५०० से अधिक AI कैमरे लगाए हैं और पुलिस के ८०० अलग कैमरे हैं। इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर में ८० से अधिक कर्मचारी चौबीसों घंटे काम करते हैं। सिस्टम गड्ढों, जलभराव और ट्रैफ़िक की भीड़ को रियल टाइम में पकड़ता है। लेकिन सूरत में काम करने वाली चीज़ कैमरे नहीं थे। वह था उनके पीछे की जवाबदेही की संस्कृति। वार्ड अधिकारियों को तय समय में जवाब देना होता था। कैमरे का डेटा सिर्फ़ अलर्ट नहीं बल्कि जवाबदेही का रिकॉर्ड था। इस संस्थागत ढाँचे के बिना वही सिस्टम नज़रअंदाज़ की गई समस्याओं का एक महँगा संग्रह बनकर रह जाता।
हैदराबाद ने बहुत बड़े पैमाने पर काम किया। तेलंगाना भर में ९ लाख कैमरों का नेटवर्क बनाया गया जिस पर ₹६०० करोड़ ख़र्च हुए। चेहरे की पहचान, ट्रैफ़िक नियमों का पालन और आपात स्थिति की पहचान इस नेटवर्क से होती है। बुनियादी ढाँचा प्रभावशाली है। लेकिन इससे शहर के ग़रीब इलाक़ों के आम लोगों की ज़िंदगी कितनी बेहतर हुई यह एक विवादित सवाल बना हुआ है। डेटा कितने समय तक रखा जाए और उस तक किसकी पहुँच हो इस पर कोई क़ानूनी ढाँचा नहीं है।
बेंगलुरु से शायद सबसे काम की सीख मिलती है। वहाँ ट्रैफ़िक पुलिस ने ५० चौराहों पर AI कैमरे लगाए और २०२५ तक ८७ प्रतिशत ट्रैफ़िक उल्लंघन स्वचालित तरीक़े से पकड़े जाने लगे। एक साल में ₹१८५ करोड़ से ज़्यादा का जुर्माना वसूल हुआ। यह इसलिए कामयाब रहा क्योंकि काम सीमित था, प्रक्रिया सीधी थी और नतीजे मापे जा सकते थे। लेकिन जब ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी ने इसी तरह के AI कैमरे नागरिक उल्लंघनों जैसे गड्ढों, कूड़े और अतिक्रमण के लिए लगाने की कोशिश की तो निजता को लेकर उठे विवाद में योजना ठंडे बस्ते में चली गई। मुंबई ने इन पेचीदगियों को अभी तक सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
सिंगापुर की सफ़ाई उसके कैमरों की वजह से नहीं है। दशकों की सख़्त प्रवर्तन संस्कृति और भारी जुर्माने ने यह काम किया। कैमरे एक पहले से काम कर रहे सिस्टम की मदद करते हैं। लंदन दुनिया के सबसे घने कैमरा नेटवर्क वाले शहरों में से एक है। वह कोई ख़ास साफ़-सुथरा शहर नहीं है।
आपदा प्रबंधन: तकनीक यहाँ वाक़ई काम आती है
सच पूछें तो AI कैमरों का सबसे ज़रूरी इस्तेमाल नाले में प्लास्टिक फेंकने वाले को पकड़ना नहीं है। यह है उन आपदाओं की जल्दी चेतावनी जो जानें लेती हैं।
मुंबई एक साथ कई ख़तरों के बीच है। बाढ़, पुरानी इमारतों का गिरना, ऊँची इमारतों में आग, मानसून में चरमराती नालियाँ। ये सब बार-बार होने वाली और दर्ज की गई आपदाएँ हैं। बीएमसी ने प्रस्ताव दिया है कि AI कैमरे आग लगने, इमारत गिरने और पाइपलाइन फटने जैसी घटनाओं को ख़ुद-ब-ख़ुद पहचानकर आपदा प्रबंधन कंट्रोल रूम को अलर्ट करें। किसी के फ़ोन करने का इंतज़ार नहीं।
यहाँ तकनीक वाक़ई अर्थ रखती है। कुछ मिनट पहले मिली सूचना भी बचाव अभियान की दिशा बदल सकती है। City Institute of Disaster Management में एक ऑन-प्रिमाइसेस डेटा सेंटर और डिज़ास्टर रिकवरी सुविधा भी बनाई जाएगी ताकि आपात स्थिति में सिस्टम ठप न पड़े।
संदर्भ इस प्रस्ताव को और अधिक ज़रूरी बना देता है। बीएमसी का आपदा प्रबंधन विभाग अभी भी MTNL की लैंडलाइनों पर निर्भर है जिनमें से लगभग ९० प्रतिशत बंद पड़ी हैं। DMR रेडियो शहर के कुछ हिस्सों में काम नहीं करते। बड़ी आपदाओं में मोबाइल नेटवर्क जाम हो जाते हैं। बीएमसी सैटेलाइट आधारित संचार की तलाश में है। तस्वीर यह बनती है कि एक तरफ़ ₹४६.६७ करोड़ के AI कैमरे और दूसरी तरफ़ एक टूटा हुआ संचार तंत्र। दोनों को ठीक करना ज़रूरी है। एक पर काम हो रहा है।
बजट का हिसाब-किताब
₹४६.६७ करोड़ में ११५० कैमरे यानी प्रति कैमरा लागत क़रीब ₹४ लाख। यह संख्या बिना संदर्भ के कुछ नहीं बताती। दिल्ली ने अपने शहरव्यापी CCTV अभियान में लगभग २.४६ लाख बुनियादी कैमरे लगाए और कुल ख़र्च क़रीब ₹६०० करोड़ था। प्रति कैमरा लागत ₹२,०००-₹२,५०० के बीच थी। मुंबई की लागत कहीं ज़्यादा है लेकिन तुलना उतनी सीधी नहीं है। मुंबई के प्रस्ताव में AI एनालिटिक्स सॉफ़्टवेयर, मशीन लर्निंग प्रोसेसिंग, डेटा सेंटर और डिज़ास्टर रिकवरी सब शामिल हैं। दिल्ली के कैमरे बुनियादी थे।
लेकिन जो नहीं बताया गया वह यह है कि ₹४६.६७ करोड़ को हार्डवेयर, सॉफ़्टवेयर लाइसेंसिंग, इंस्टॉलेशन और संचालन के बीच कैसे बाँटा गया है इसका कोई सार्वजनिक ब्यौरा नहीं है। भारत में सरकारी AI निगरानी अनुबंधों में पहले साल के बाद सॉफ़्टवेयर शुल्क अक्सर तेज़ी से बढ़ते हैं और रखरखाव समझौते दीर्घकालिक विक्रेता-निर्भरता बना देते हैं। इस परियोजना में खुली प्रतिस्पर्धी निविदा हुई या नहीं, तकनीकी विक्रेता कौन हैं और पाँच साल की कुल लागत क्या होगी, ये सवाल बजट दस्तावेज़ों में अनुत्तरित हैं।
सफ़ाईकर्मी और तकनीक के बीच
यह हिस्सा आमतौर पर तकनीक की चमक में छूट जाता है।
बीएमसी के स्थायी सफ़ाईकर्मियों की स्वीकृत संख्या २८,०२८ है। यह संख्या आख़िरी बार १९९५ में तय की गई थी। तब मुंबई की आबादी क़रीब १.२ करोड़ थी। अब यह २ करोड़ से अधिक है। शहर में हर दिन लगभग ६,५०० मीट्रिक टन कचरा निकलता है। कर्मचारियों की संख्या इस अनुपात में नहीं बढ़ी। इन स्थायी कर्मचारियों के अलावा हज़ारों ठेका आधारित सफ़ाईकर्मी हैं जिनकी नौकरी की स्थिति तीन दशकों से अदालतों में विवादित है।
बीएमसी पहले भी इंसानी उपायों से कोशिश कर चुकी है। सार्वजनिक जगहों पर गंदगी रोकने के लिए मार्शल तैनात किए गए थे। वह प्रयोग बाद में बंद हो गया। मई २०२५ में बीएमसी ने “पिंक आर्मी” शुरू की। महिला सफ़ाईकर्मियों की एक टीम जो शहर की व्यस्त सड़कों की दूसरी बार सफ़ाई करती है। इरादा अच्छा था। लेकिन जिस काम के लिए यह कार्यबल तैनात है वही काम अब कैमरों से हल करने की बात हो रही है।
कोई औपचारिक रूप से नहीं कह रहा कि यह स्वचालन की दिशा में क़दम है। लेकिन जब कैमरे वही रिपोर्ट करने लगते हैं जो पहले इंसान करते थे तो संस्था के भीतर एक अलग ही दबाव बनने लगता है। कम वेतन पाने वाले सफ़ाई पर्यवेक्षकों को यह संदेश कि अब कैमरे उनकी भूमिका निभाएँगे, उन्हें और मेहनत करने की प्रेरणा नहीं देता।
कैमरा वजह नहीं देख सकता
मुंबई की नागरिक अव्यवस्था दरअसल ऊपर की नीतिगत विफलताओं का नीचे दिखने वाला परिणाम है।
फुटपाथ पर इतने अतिक्रमण इसलिए हैं क्योंकि शहर की पथ विक्रेता नीति कभी ठीक से लागू नहीं हुई। एक दशक से अधिक पहले बना स्ट्रीट वेंडर्स क़ानून काग़ज़ पर कुछ समितियाँ बना सका, ज़मीन पर बहुत कम बदला। इसी बजट में बीएमसी ने अधिकृत फेरीवालों के लिए QR कोड प्रमाणीकरण का प्रस्ताव रखा है जो इस बात की सीधी स्वीकृति है कि शहर के पास अभी भी यह साफ़ जानकारी नहीं है कि क़ानूनी रूप से कहाँ कौन रह सकता है। AI कैमरा एक अनधिकृत विक्रेता को पहचान सकता है। वह उस नीतिगत विफलता को नहीं पहचान सकता जिसकी वजह से वह वहाँ खड़ा है।
नालों के किनारे और ख़ाली प्लॉटों पर अवैध डंपिंग इसलिए होती है क्योंकि अनौपचारिक बस्तियों में कचरा संग्रह की व्यवस्था अनियमित है। जिस इलाक़े में ५०० मीटर के दायरे में कोई कूड़ेदान न हो वहाँ के लोग जो करते हैं वह एक समझ में आने वाला फ़ैसला है। मानसून में जलभराव इसलिए नहीं होता कि कोई देख नहीं रहा। यह इसलिए होता है क्योंकि नाली का ढाँचा ही शहर की मौजूदा घनत्व और बदले हुए बारिश के मिज़ाज को सह नहीं सकता।
बीएमसी की विकास योजना का ढाँचा ऐतिहासिक रूप से उन गलियारों में निर्माण दबाव बनाता रहा है जहाँ नाली और सफ़ाई का बुनियादी ढाँचा उसे झेल नहीं सकता। AI कैमरे उस विफलता के नतीजे बहुत कुशलता से दर्ज करेंगे। उसे दूर नहीं कर पाएँगे।
मुंबई की समस्या दस्तावेज़ की कमी नहीं है
मुंबई ऐसा शहर नहीं जिसकी समस्याएँ दर्ज न हों। इंस्पेक्टर हैं, रिपोर्टें हैं, वार्ड रजिस्टर हैं, सैटेलाइट तस्वीरें हैं और पच्चीस साल के अख़बार हैं जो उसी मोहल्ले की उसी उफनती नाली की बात करते आए हैं। जो नहीं है वह है यह सब जानते हुए भी काम करने की संस्थागत इच्छाशक्ति और राजनीतिक माहौल।
११५० AI कैमरे मुंबई को कितना साफ़ और सुरक्षित बनाएँगे यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि स्क्रीन के पीछे कोई सच में देख रहा है या नहीं। और जो देख रहा है उसके पास कुछ करने का अधिकार और इरादा भी है या नहीं।
यह कभी तकनीक का सवाल नहीं था।
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