विजय कृष्णा (1944–2026) — जिन्हें रंगमंच ने अमर किया, लेकिन सुर्खियों ने हमेशा किसी और का नाम लेकर याद किया
बुधवार को जब यह खबर फैली, तो सुर्खी यह थी ‘देवदास में शाहरुख खान के पिता का किरदार निभाने वाले अभिनेता विजय कृष्णा का 81 वर्ष की आयु में निधन।’ यह सुर्खी गलत नहीं थी। लेकिन यह एक बड़े सच का सबसे छोटा हिस्सा थी उस तरह की कटौती जो इस देश का मनोरंजन जगत उन तमाम लोगों के साथ करता है, जिन्होंने मार्की की चमक के बजाय मंच को चुना।
लिलेट दुबे ने बेहतर जाना। जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर यह दुखद समाचार साझा किया, तो उन्होंने ‘शाहरुख खान के पिता’ नहीं लिखा। उन्होंने लिखा “RIP मेरे जयराज।” यही थी उनकी असली पहचान जयराज। महेश दत्तानी के मशहूर नाटक ‘डांस लाइक अ मैन’ का वह किरदार, जिसे विजय कृष्णा ने पच्चीस से भी ज़्यादा साल जिया। हर बार एक जीवित मंच पर, बिना किसी रीटेक के, बिना किसी एडिट के सिर्फ एक इंसान, एक कहानी, और एक दर्शक।
पच्चीस साल सिर्फ एक किरदार, लेकिन पूरी ज़िंदगी
भारत में थिएटर को लेकर हमारी स्मृति हमेशा कमज़ोर रही है। लेकिन जो लोग इस दुनिया को जानते हैं, वे बताएंगे कि ‘डांस लाइक अ मैन’ भारतीय अंग्रेज़ी रंगमंच की सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तुतियों में से एक है। यह नाटक शास्त्रीय नृत्य, पितृसत्ता और कलात्मक महत्वाकांक्षा के बीच की जंग की कहानी कहता है। पमेला रूक्स के निर्देशन में बनी इस नाटक की फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और उसकी रीढ़ थे विजय कृष्णा।
ज़रा सोचिए पच्चीस साल। एक ही किरदार। हर रात उसी जयराज को जीना, लेकिन हर बार थोड़ा और गहरे उतरना। यही है थिएटर का जादू और उसकी कठिनाई भी। बॉलीवुड में एक किरदार को दो-तीन महीने में शूट करके भूल दिया जाता है। रंगमंच में एक किरदार आपकी सांसों में घुल जाता है।
गोदरेज का दामाद जो मंच की परछाइयों में खड़ा रहा
विजय कृष्णा की ज़िंदगी का एक और पहलू है जो उन्हें और भी असाधारण बनाता है। वे गोदरेज परिवार से जुड़े थे स्मिता कृष्णा-गोदरेज के पति। गोदरेज नाम इस देश में हर दरवाज़ा खोलता है। उद्योग हो, राजनीति हो, समाज हो वह नाम एक पासपोर्ट की तरह काम करता है।
लेकिन विजय कृष्णा ने वह पासपोर्ट सस्ती जगहों पर खर्च नहीं किया। वे रिहर्सल हॉल के अंधेरे में खड़े रहे, डायलॉग याद करते रहे, अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। गोदरेज समूह में कार्यकारी निदेशक के तौर पर काम किया और साथ-साथ एक पर्यावरणविद् के रूप में भी जाने गए। बोर्डरूम से थिएटर विंग्स तक एक शांत, अडिग यात्रा।
भंसाली के सेट पर भी थिएटर की छाप
2002 में संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ आई। भंसाली का सेट मतलब भव्यता का महासागर। हर चीज़ ज़्यादा बड़ी, ज़्यादा चमकीली, ज़्यादा नाटकीय। उस माहौल में विजय कृष्णा ने शाहरुख खान के पिता का किरदार निभाया सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद ऐसी छाप छोड़ी जो दर्शक भूल नहीं पाए।
यही है उस अभिनेता की पहचान जो थिएटर से आता है हर पल पूरी तरह से उपस्थित। कोई रीटेक नहीं, कोई माफी नहीं। भंसाली के विज़ुअल तूफान में भी वो डूबे नहीं, बल्कि अपनी ज़मीन पर टिके रहे। फिर 2010 में ‘गुज़ारिश’ में ऋतिक रोशन के साथ लौटे आठ साल बाद, फिर से भंसाली, फिर से वही शांत धैर्य।
और इससे पहले? रिचर्ड एटनबरो की 1982 की महाकाव्य फिल्म ‘गांधी’ में भी उनका किरदार था वह फिल्म जिसने पूरी दुनिया को भारतीय इतिहास की एक झलक दी। और राजकुमार हिरानी की ‘पीके’ में भी।
जब समुदाय रोया तो असली कद का पता चला
श्रद्धांजलियों से किसी इंसान का असली कद नापा जाता है। सोनी राज़दान ने लिखा “हे भगवान, नहीं। यह बहुत दुखद है। मैं उन्हें तब से जानती हूं जब मैं मात्र 15 साल की थी। दिल टूट गया।” यह कोई सेलेब्रिटी की औपचारिक शोक संवेदना नहीं थी। यह एक समुदाय के भीतर से उठा असली दर्द था। अनुपम खेर बस इतना ही कह सके “बहुत दुखद। ओम शांति।”
एक सवाल जो भारतीय पत्रकारिता को खुद से पूछना चाहिए
यहां? यहां जो अभिलेखागार बचा है वह लिलेट दुबे का इंस्टाग्राम पोस्ट है। 81 साल की उम्र में, जब सही सवाल पूछने का वक्त जा चुका होता है।जब विजय कृष्णा जैसी शख्सियत हमें छोड़ कर जाती है, तो एक सवाल मन में कचोटता है हमारे रंगमंच कलाकारों की स्मृति इतनी कमज़ोर क्यों है? ब्रिटेन में, जो अभिनेता पच्चीस साल किसी बड़े वेस्ट एंड प्रोडक्शन में काम करे, उस पर फीचर प्रोफाइल लिखी जातीं। नेशनल थिएटर उसकी रिकॉर्डिंग संजो कर रखता। ड्रामा स्कूलों के सिलेबस में उसका नाम होता।
महेश दत्तानी का ‘डांस लाइक अ मैन’ दुनिया भर में खेला जाता है। वह एक ऐसे नाटक की बात करता है जो पितृसत्ता और कला के बीच की लड़ाई को आज भी उतनी ही तीक्ष्णता से व्यक्त करता है जितना पहले। लेकिन जिस अभिनेता ने दो दशकों तक उसके मुख्य किरदार को जिया, वो राष्ट्रीय बातचीत से इस तरह फिसल गया जैसे ढीली मुट्ठी से पानी।
उनका नाम जयराज था
वे अपनी पत्नी स्मिता कृष्णा-गोदरेज और बेटियों न्यारिका और फ्रेयान को पीछे छोड़ गए हैं। परिवार ने निधन का कारण सार्वजनिक नहीं किया।
लेकिन जो काम वे छोड़ गए हैं वह बचा रहेगा। उन लोगों की यादों में जिन्होंने उन्हें काम करते देखा। थिएटर झूठ नहीं बोलता। पच्चीस साल किसी की सनक नहीं होती वह एक पुकार होती है।
विजय कृष्णा के पास हर सुविधा थी किसी और की परछाईं में रहने की। गोदरेज नाम था। भंसाली का संपर्क था। शाहरुख जैसे सितारे के साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका था। उन्होंने इनमें से कुछ भी अपनी असली पहचान नहीं बनने दी।
उनकी पहचान थी जयराज। एक किरदार। एक मंच। एक जीवन।
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