By: Ragini Chaubey
बिहार के बोधगया से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा गाँव है, जहाँ पहुँचते ही यह एहसास होता है कि समय यहाँ ठहर गया है। जैसे देश की तरक्की इस मोड़ से आगे बढ़ गई हो और यह इलाका पीछे छूट गया हो।
मोबाइल नेटवर्क और डिजिटल इंडिया के शोर के बीच यहाँ की ज़िंदगी अब भी अधूरी सड़कों, टिमटिमाती बिजली और इंतज़ार में बंद पड़ी सुविधाओं के भरोसे चलती है। अस्पताल का नाम सुनने में आता है, लेकिन इलाज दूर है। स्कूल मौजूद हैं, पर शिक्षा पहुँच से बाहर है।
यह गाँव महादलित समुदाय का है। एक ऐसा समाज जो सिर्फ गरीबी नहीं झेल रहा, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे सामाजिक बहिष्कार की कीमत चुका रहा है। यहाँ विकास की बातें पोस्टरों तक सीमित हैं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी अब भी संघर्ष की भाषा में लिखी जाती है।
बुज़ुर्गों की बातों में इस गाँव का इतिहास आज भी ज़िंदा है। उनकी यादों में वह समय दर्ज है, जब यह बस्ती आज़ादी से बहुत पहले बसाई गई थी।
उस दौर में महादलित समुदाय को मुख्य गाँव से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया। न ज़मीन का अधिकार मिला, न शिक्षा का अवसर और न ही किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा। अलगाव को परंपरा का नाम दिया गया और यही परंपरा धीरे-धीरे व्यवस्था का हिस्सा बन गई।
पीढ़ियाँ बदलीं, सरकारें बदलीं, लेकिन गाँव की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति लगभग जस की तस बनी रही। आज भी यह बस्ती उसी इतिहास की विरासत ढो रही है, जहाँ जन्म ही किसी की सीमा तय कर देता है।
बच्चों की हालत सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली है। कुपोषण के संकेत साफ नज़र आते हैं। शिक्षा के नाम पर या तो स्कूल बहुत दूर हैं या फिर ठीक से संचालित नहीं होते। कई बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं क्योंकि परिवार के पास न तो संसाधन हैं और न ही कोई ठोस भविष्य की उम्मीद। शिक्षा, जो सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम हो सकती थी, यहाँ पहुँच ही नहीं पाती।
सरकार की योजनाएँ और घोषणाएँ कागज़ों पर मौजूद हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बताती है। महादलित समुदाय के लिए बनाए गए विकास कार्यक्रमों का असर गाँव में बहुत सीमित दिखता है। आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार से जुड़ी योजनाएँ लोगों तक या तो पहुँचती नहीं हैं या अधूरी रह जाती हैं। नतीजतन, सरकारी व्यवस्था यहाँ मौजूद तो है, लेकिन महसूस नहीं होती।
रोज़गार की स्थिति बेहद अस्थिर है। कभी-कभार खेतों में दिहाड़ी मिल जाती है, लेकिन वह भी अनिश्चित होती है। जब काम नहीं मिलता, तो कई परिवारों को भीख माँगने पर मजबूर होना पड़ता है। यह उनकी इच्छा नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी है। यहाँ तीन वक्त का भोजन भी संघर्ष का विषय बना हुआ है, अधिकार का नहीं।
यह तस्वीर तब और तीखी हो जाती है जब इस गाँव की तुलना पास के बोधगया से की जाती है। बोधगया, जहाँ हर साल दुनिया भर से लोग शांति और ज्ञान की तलाश में आते हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन, बड़े होटल और चमकती सड़कों के बीच यह गाँव लगभग अदृश्य बना रहता है। यह विरोधाभास सवाल उठाता है कि विकास की रोशनी आखिर किन तक पहुँच रही है।
अक्सर यह दावा किया जाता है कि आज के भारत में जातिवाद खत्म हो चुका है। लेकिन इस गाँव की स्थिति कुछ और ही कहानी कहती है। आज जातिवाद खुली हिंसा या अपमान के रूप में नहीं, बल्कि उपेक्षा और अनुपस्थिति के रूप में मौजूद है। जब किसी समुदाय तक शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर नहीं पहुँचते, तो यह भी भेदभाव का ही एक रूप है।
यह कहानी किसी एक गाँव तक सीमित नहीं है। यह उन अनगिनत बस्तियों की कहानी है जो विकास के आँकड़ों में शामिल नहीं होतीं। सवाल यह नहीं है कि योजनाएँ बनाई गई हैं या नहीं, सवाल यह है कि वे ज़रूरतमंदों तक पहुँच रही हैं या नहीं। जब तक विकास को सिर्फ शहरों और आंकड़ों से मापा जाता रहेगा, तब तक ऐसे गाँव इसी तरह पीछे छूटे रहेंगे।
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