“गोविंदा रे गोपाळा, यशोदेच्या तान्ह्या बाळा” इस आवाज़ के साथ मुंबई की गलियों में हर साल जन्माष्टमी के मौके पर एक अनोखी धूम मचती है। इस धूम का नाम है दही हांडी। यह त्योहार न केवल भगवान कृष्ण की नटखट लीलाओं को जीवंत करता है, बल्कि मुंबई की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का प्रतीक बन चुका है। रंग-बिरंगे मटके, आसमान छूते मानवी पिरामिड और “आला रे आला, गोविंदा आला” के नारे मुंबई की सड़कों को उत्सवमय बना देते हैं। इस साल यह उत्सव 16 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा। मुंबई एक बार फिर इस जोश और उत्साह से सराबोर होगी। आइए, जानते हैं कि दही हांडी और मुंबई का यह रिश्ता इतना खास क्यों है।
दही हांडी का महत्व
दही हांडी, यानी ‘दही’ और ‘हांडी’ (मिट्टी का मटका), जन्माष्टमी का एक अभिन्न हिस्सा है। इसे महाराष्ट्र में गोपाळकाला भी कहा जाता है। यह त्योहार भगवान कृष्ण की उस बाल लीला को याद करता है, जिसमें वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर ऊंचाई पर टंगे मटके से दही और मक्खन चुराते थे। मुंबई में यह परंपरा न केवल धार्मिक उत्साह को दर्शाती है, बल्कि शहर की एकजुटता और जोश को भी सामने लाती है।
मुंबई में दही हांडी की धूम
मुंबई में दही हांडी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि शहर की आत्मा है। जन्माष्टमी के दिन मुंबई की सड़कें लोगों से खचाखच भरी होती हैं। बोरीवली, दादर, मझगांव और ठाणे जैसे इलाकों में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। मझगांव को तो ‘दही हांडी की पंढरी’ कहा जाता है, जहां यह परंपरा पूरी भव्यता के साथ मनाई जाती है। इस दिन ट्रैफिक थम जाता है, लोग ऑफिस की छुट्टी लेकर सड़कों पर उतर पड़ते हैं और हर गली-नुक्कड़ उत्सव के रंग में रंग जाती है।
मुंबई की तंग गलियों से लेकर चौड़े चौराहों और खुले मैदानों तक, हर जगह गोविंदा पथक मानवी पिरामिड बनाकर मटके फोड़ते हैं। इन मटकों मे दही, दूध और माखन रखा जाता है और उन्हे नारीयल एवं आम के पत्तो से सजाया जाता है। ढोल-नगाड़ों और डीजे की धुन पर लोग नाचते-झूमते हैं। भीड़ द्वारा पानी फेंककर गोविंदाओं ने बनाए हुए पिरामिड गिराने की कोशिश इस खेल को और रोमांचक बनाती है। मुंबई का यह उत्साह देश-विदेश में मशहूर है, और लोग इसे देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं।
दही हांडी और मुंबई की सामाजिक एकता
दही हांडी मुंबई की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इस त्योहार में हर वर्ग, हर उम्र और हर समुदाय के लोग शामिल होते हैं। गोविंदा पथक हफ्तों पहले से अभ्यास शुरू करते हैं, जिसमें टीमवर्क, हिम्मत और आपसी भरोसा साफ झलकता है। पिरामिड में सबसे नीचे मजबूत लोग, बीच में संतुलन बनाने वाले और सबसे ऊपर हल्का-फुल्का व्यक्ति चढ़ता है, जो मटके को फोड़ता है। यह पूरी प्रक्रिया मुंबईवासियों की एकजुटता और मेहनत को दर्शाती है।
मुंबई में दही हांडी के आयोजन स्थानीय मंडलों, सामाजिक संगठनों और व्यापारियों के सहयोग से होते हैं। इन आयोजनों में लाखों रुपये के इनाम और भव्य सजावट देखने को मिलती है, जो शहर की उदारता और उत्साह को दर्शाते हैं।
महिलाओं की भागीदारी
मुंबई ने दही हांडी को और समावेशी बनाया है। पहले गोविंदा पथक का मतलब सिर्फ पुरुषों की टीमें समझा जाता था, लेकिन 1996 में गोरखनाथ महिला दही हांडी पथक ने मुंबई की सड़कों पर उतरकर इतिहास रच दिया। इस पथक की शुरुआत इस विचार के साथ हुई कि जब देश में स्त्री-पुरुष समानता है, तो महिलाएं दही हांडी क्यों न फोड़ें? इस पथक में ज्यादातर नौकरी करने वाली और साधारण परिवारों की महिलाएं और लड़कियां शामिल हैं। उनके प्रशिक्षक बताते हैं कि यह आयोजन इन महिलाओं को बाहरी दुनिया देखने और अपनी परंपरा को देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने का मौका देता है। पिछले कुछ सालों से यह पथक मुंबई के बाहर जाकर पांच थरों वाले पिरामिड बनाकर दही हांडी फोड़ता है, जिसने मुंबई की प्रगतिशील सोच को और मजबूत किया है।
प्रसिद्ध गोविंदा पथक
मुंबई और आसपास के इलाकों में कई गोविंदा पथक अपनी ताकत और कौशल के लिए मशहूर हैं। इनमें से कुछ हैं:
- जय जवान गोविंदा पथक
- ताडवाडी गोविंदा पथक
- आर्यन्स गोविंदा पथक
- हिंदू एकता गोविंदा पथक
- बालवीर गोविंदा पथक
ये पथक मुंबई की सड़कों पर अपने शानदार प्रदर्शन से दही हांडी के उत्सव को और रंगीन बनाते हैं।
रिकॉर्ड और उपलब्धियां
मुंबई ने दही हांडी के जरिए कई रिकॉर्ड बनाए हैं। 10 अगस्त 2012 को जय जवान गोविंदा पथक ने ठाणे के टीएमसी स्कूल ग्राउंड में 9-स्तरीय पिरामिड बनाकर 13.34 मीटर (43.79 फीट) की ऊंचाई हासिल की, जो एक विश्व रिकॉर्ड है। मुंबई के पथक अपनी मजबूत और ऊंची पिरामिडों के लिए देश-विदेश में मशहूर हैं, जो शहर के जोश और जुनून को दर्शाते हैं।
मुंबई में दही हांडी अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक भव्य आयोजन बन चुका है। बड़े-बड़े आयोजनों में लाखों रुपये के इनाम, स्पॉन्सरशिप और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम देखने को मिलते हैं। बच्चों की सुरक्षा के लिए हेलमेट और घुटने के गार्ड अनिवार्य किए गए हैं। यह बदलाव मुंबई की आधुनिकता और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है, जो इस त्योहार को और सुरक्षित और आकर्षक बनाता है।
प्रो गोविंदा लीग: एक नया आयाम
प्रो गोविंदा लीग भारत की पहली पेशेवर लीग है, जो दही हांडी के पारंपरिक मानव पिरामिड खेल को समर्पित है। इस लीग की स्थापना इस प्राचीन परंपरा को संरचना और मान्यता देने के लिए की गई थी। इसमें मानकीकृत नियम, सुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रतिस्पर्धी प्रारूप शामिल हैं। प्रो गोविंदा लीग ने दही हांडी को एक सांस्कृतिक उत्सव से एक संगठित खेल में बदल दिया है, जिसने गोविंदा पथकों को अपने असाधारण कौशल को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित करने का अवसर दिया है। यह लीग पूरे देश से दर्शकों और प्रतिभागियों को आकर्षित करती है।
मुंबई की पहचान
दही हांडी मुंबई के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक धड़कन है। यह उत्सव मुंबईवासियों के उत्साह, एकता और साहस को दर्शाता है। चाहे तंग गलियां हों या बड़े चौराहे, दही हांडी मुंबई की हर सड़क को रंग और जोश से भर देता है। यह त्योहार मुंबई की उस भावना का प्रतीक है, जो हर चुनौती को हंसी-खुशी स्वीकार करती है और सामूहिकता के साथ आगे बढ़ती है।
दही हांडी मुंबई के दिल में बसी एक ऐसी परंपरा है, जो हर साल शहर को नई ऊर्जा से भर देती है। यह त्योहार न केवल भगवान कृष्ण की भक्ति को जीवंत करता है, बल्कि मुंबई की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक एकता को भी सेलिब्रेट करता है। 16 अगस्त 2025 को, जब मुंबई की सड़कें एक बार फिर दही हांडी के रंग में रंगेंगी, यह शहर अपने अनोखे अंदाज में दुनिया को दिखाएगा कि उत्साह, एकता और परंपरा का संगम कितना खूबसूरत हो सकता है।


