तमिलनाडु के अरियालुर जिले में स्थित गंगईकोंडा चोलपुरम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि चोल साम्राज्य की वैभवशाली विरासत का जीवंत प्रतीक है। यह वही भूमि है, जहां से 11वीं शताब्दी में सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम ने अपने साम्राज्य को दक्षिण से लेकर गंगा तक फैलाया था। गंगा नदी पर विजय के बाद उन्होंने यहां नई राजधानी बसाई और इसका नाम रखा गंगईकोंडा चोलपुरम, यानी “गंगा को जीतने वाले चोल की नगरी”।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंदिर में आदि तिरुवथिरई महोत्सव के अवसर पर पूजा-अर्चना की। उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। इस यात्रा ने मंदिर को एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया।
स्थापत्य कला का अनोखा चमत्कार
गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर द्रविड़ शैली की स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। इसका शिखर 55 मीटर ऊंचा है। यह तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर से थोड़ा छोटा है। हालांकि, इसका घुमावदार आकार इसे विशिष्ट बनाता है।
मंदिर के गर्भगृह में 4 मीटर ऊंचा और 18 मीटर परिधि वाला विशाल शिवलिंग स्थापित है। यह दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में शामिल है। इसके अलावा, मंदिर परिसर में 200 मीटर दूर स्थित विशाल नंदी मूर्ति गर्भगृह की सीध में रखी गई है।
दीवारों पर की गई नक्काशी भी बेहद खास है। इनमें भगवान शिव, विष्णु, सरस्वती और नटराज के चित्रण के साथ चोल काल के जीवन और युद्ध की झलक दिखाई देती है। विशेष रूप से एक मूर्ति में शिव और पार्वती, राजेंद्र चोल को विजय की माला पहनाते हुए नजर आते हैं।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल
यह मंदिर यूनेस्को की ‘ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल्स’ सूची में शामिल है। इसी सूची में तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर और दरासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर भी हैं। इसलिए, यह स्थल इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और संस्कृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
आदि तिरुवथिरई महोत्सव की भव्यता
हर साल सावन के महीने में यहां आदि तिरुवथिरई महोत्सव मनाया जाता है। यह महोत्सव भगवान शिव के नटराज रूप को समर्पित है। इस दौरान मंदिर में वेदपाठ, नृत्य और संगीत कार्यक्रम होते हैं।
इस साल यह आयोजन खास रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसमें हिस्सा लिया। उन्होंने इलैयाराजा के संगीत और ओधुवरों के पवित्र मंत्रोच्चार के बीच पूजा की। उन्होंने कहा कि इस भूमि की आध्यात्मिक ऊर्जा आत्मा को गहराई से छूती है।
पीएम मोदी का संबोधन
अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि सावन के इस पावन अवसर पर भगवान शिव की पूजा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने यहां 140 करोड़ भारतीयों के कल्याण और राष्ट्र की प्रगति के लिए प्रार्थना की।
उन्होंने राजेंद्र चोल के योगदान को भी याद किया। मोदी ने बताया कि चोल शासकों ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बढ़ाए। उन्होंने यह भी कहा कि चोल शासनकाल में कुदावोलाई अमाइप्पु तंत्र जैसी लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली अपनाई जाती थी। यह प्रणाली वैश्विक लोकतंत्र की शुरुआत से सदियों पुरानी है।
गंगा जल और चोल गंगा झील
राजेंद्र चोल ने उत्तर भारत से गंगा जल लाकर इसे चोल गंगा झील में प्रवाहित किया। आज इसे पोन्नेरी झील कहा जाता है। उस समय इसे “गंगा जलमयं जयस्तंभम्” यानी विजय का तरल स्तंभ कहा गया।
यह पहल चोल साम्राज्य की शक्ति और दूरदर्शिता का प्रतीक मानी जाती है। यह झील आज भी उनकी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव की गवाही देती है।
मंदिर की विशेषताएं
- वास्तुकला: वर्गाकार आधार, आठ स्तर और घुमावदार शिखर।
- मूर्तियां: लगभग 50 मूर्तियां जिनमें नटराज, सरस्वती और शिव के विभिन्न रूप शामिल।
- नंदी मूर्ति: मंदिर प्रांगण में 200 मीटर दूर अक्षीय रूप से संरेखित विशाल नंदी।
- शिवलिंग: 4 मीटर ऊंचा, 18 मीटर परिधि वाला विशाल शिवलिंग।
- अन्य संरचनाएं: छोटे मंदिर, गोपुरम और नौ ग्रहों की एकाश्म मूर्तियां।
सांस्कृतिक धरोहर और पर्यटन
मंदिर के शिलालेख उस समय की राजनीति, समाज और प्रशासन की झलक देते हैं। यह स्थल अब पर्यटन का बड़ा केंद्र बन चुका है।
गंगईकोंडा चोलपुरम केवल एक मंदिर नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक और स्थापत्य उत्कृष्टता का जीवंत उदाहरण है। पीएम मोदी की यात्रा और आदि तिरुवथिरई महोत्सव ने इसे फिर से राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि भारत की प्राचीन विरासत आज भी प्रेरणा का स्रोत है।


