आपने कभी गौर किया है कि जब आप Google Translate से “क्या हाल है?” का अंग्रेजी अनुवाद करते हैं, और फिर उस अंग्रेजी को वापस हिंदी में करते हैं, तो कभी-कभी यह आता है – “क्या है स्थिति?”। ऐसा लगता है जैसे कोई रोबोट बहुत औपचारिकता से पूछ रहा हो कि आपकी जीवन-स्थिति क्या है, मूड नहीं। यही है अनुवाद के कृत्रिम दिमागों की पहली और बड़ी गलती – संदर्भ का अकाल।
एआई के लिए शब्द, व्याकरण के नियमों का पुलिंदा हैं। पर इंसानी ज़बान तो संदर्भ, रिश्ते, मुहावरे और भावनाओं के जाल में बुनी होती है। एक किस्सा याद आता है। एक मित्र ने अंग्रेजी वाक्य “He is feeling blue.” को गूगल ट्रान्सलेट हिंदी में करवाया। आया – “वह नीला महसूस कर रहा है।” एआई को क्या पता कि ‘blue’ यहाँ रंग नहीं, उदासी है। मगर यह तो बस शुरुआत है।
मुहावरों और लोकोक्तियों पर तो ये टेक्नोलॉजी बिल्कुल अस्त-व्यस्त हो जाती है। हिंदी का मशहूर मुहावरा है “आँखों का तारा”। गूगल ट्रांसलेट इसे अक्सर “star of the eyes” कर देता है, जो सीधे-सीधे शब्दों का अनुवाद है, पर उस प्यार और लाड़ के भाव को मार देता है जो “apple of my eye” में छिपा है। ऐसा ही एक उदाहरण है “देर आयद दुरुस्त आयद”। एआई इसे “Late come, healthy come” जैसा कुछ बना देता है, उसकी समझ में यह आती ही नहीं कि यहाँ ‘दुरुस्त’ का मतलब ‘बेहतर’ या ‘ठीक’ है, सेहत से सीधा संबंध नहीं।
संस्कृति और शिष्टाचार की खाई भी गहरी है। भारतीय भाषाओं में रिश्तों के लिए अलग-अलग शब्द हैं – चाचा, ताया, मामा, फूफा। एआई अक्सर सबको ‘uncle’ बना देता है। वहीं, हिंदी में ‘आप’ और ‘तुम’ में फर्क है, जो अंग्रेजी के ‘you’ में गुम हो जाता है। एक बार किसी ने “क्या तुम मुझे पानी दे सकते हो?” का अनुवाद “Can you give me water?” करवाया, जो ठीक है। लेकिन जब इस वाक्य को एक बुजुर्ग से कहने के लिए “क्या आप मुझे पानी दे सकते हैं?” का अनुवाद करना था, तो एआई ने वही “Can you give me water?” दिया। ‘तुम’ और ‘आप’ का भेद, जो हमारी संस्कृति की गरिमा है, एआई की नज़र में महज एक ‘शब्द’ है।
काव्य और भावनात्मक पाठ तो इनकी पहुँच से कोसों दूर है। एक शेर का उदाहरण लीजिए – “दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है?”। गूगल ट्रांसलेट इसे कर देता है – “Heart, what has happened to you?”। भाषा की देह तो सुरक्षित रह गई, पर शायरी की रूह, वो तकलीफ़, वो पुकार गायब। एआई के पास ‘दिल’ है, ‘नादाँ’ है, पर ‘दिल-ए-नादाँ’ का मर्म नहीं।
तकनीकी सीमाएँ भी हैं। कई बार ये टूल किसी वाक्य के आखिरी शब्दों को जल्दबाजी में दोहरा देते हैं, या फिर जटिल वाक्य संरचना को समझ न पाने के कारण अर्थ का अनर्थ कर देते हैं। हाँ, यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि नई एआई तकनीकें, जैसे DeepL या ChatGPT, Google Translate से कहीं बेहतर हैं। वे संदर्भ को थोड़ा बेहतर पकड़ती हैं, पर मूल समस्या वही है – उनके पास अनुभव नहीं, केवल डेटा है।
तो क्या इसका मतलब है कि इन टूल्स का कोई फायदा नहीं? बिल्कुल नहीं। साधारण वाक्यों, सूचनात्मक पाठ, यात्रा में संकेत समझने के लिए ये बहुत उपयोगी हैं। पर जहाँ भाव है, संस्कृति है, मर्म है, वहाँ अभी भी इंसानी अनुवादक की ज़रूरत है। क्योंकि अनुवाद सिर्फ शब्द बदलने का नहीं, भाव और संदर्भ को साथ लेकर चलने का नाम है।
एआई अनुवाद और इंसानी अनुवाद एक ही खेल नहीं खेल रहे। एआई रफ़्तार और सुविधा का खिलाड़ी है, इंसान समझ और संवेदना का। एआई अनुवाद वहाँ काम का है जहाँ भाषा सिर्फ़ सूचना ढोने का ज़रिया हो। सड़क के संकेत, होटल का मेन्यू, साधारण ई-मेल, या तुरंत अर्थ समझना हो, यहाँ मशीन झटपट काम निपटा देती है। उसे थकान नहीं होती, भावनाएँ आड़े नहीं आतीं और लाखों शब्द एक साथ निगल जाने की क्षमता होती है। पर यहीं उसकी सीमा भी शुरू हो जाती है। संदर्भ बदलते ही एआई लड़खड़ा जाता है। मुहावरे, व्यंग्य, रिश्तों की बारीकियाँ, सांस्कृतिक संकेत इन सबको वह शब्दकोश की तरह पढ़ता है, अनुभव की तरह नहीं।
इंसानी अनुवाद धीमा है, महँगा है, पर ग़लती कम करता है। इंसान जानता है कि “नीला महसूस करना” रंग नहीं, मनःस्थिति है। वह तय करता है कि यहाँ “तुम” चलेगा या “आप”, मज़ाक रखना है या गंभीरता। कविता, भाषण, ओपिनियन लेख, क़ानूनी दस्तावेज़, इनमें इंसानी दख़ल के बिना अर्थ अधूरा रहता है।
इसलिए फैसला साफ़ है। सुविधा चाहिए तो एआई, भरोसा चाहिए तो इंसान। भाषा मशीन से नहीं, ज़मीन से आती है। जब तक एआई ज़िंदगी नहीं जीता, तब तक अनुवाद का आख़िरी शब्द इंसान ही बोलेगा।
भाषा सिर्फ संचार का माध्यम नहीं, इंसानी अनुभव की साझीदार है। और शायद, जब तक एआई में ‘अनुभव’ नहीं आता, तब तक ये गलतियाँ हमें याद दिलाती रहेंगी कि हमारी भाषाएँ कितनी जीवंत और अद्भुत हैं। और हाँ, इन गलतियों पर हंसना भी कम मज़ेदार नहीं है!
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