भारतीय पारिस्थितिकी और संरक्षण के क्षेत्र में डॉ. माधव गाडगिल का नाम हमेशा याद रखा जाएगा। अपने जीवनकाल में उन्होंने न केवल विज्ञान को नए आयाम दिए, बल्कि समाज और पर्यावरण के बीच के संबंध को भी गहराई से समझा और प्रदर्शित किया। डॉ. गाडगिल को उनके संस्थागत योगदान और भारतीय पारिस्थितिकी विज्ञान पर पड़े प्रभाव के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है।
डॉ. गाडगिल ने भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर (IISc) में पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र की स्थापना की और इसे देश के प्रमुख पर्यावरणीय अनुसंधान संस्थानों में से एक बनाया। उनके नेतृत्व में केंद्र ने पारिस्थितिकी के अनेक पहलुओं पर गहन शोध किया जैव विविधता संरक्षण, भूमि उपयोग प्रबंधन, वन और जलवायु संबंधी अध्ययन, और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना।
उनकी सबसे प्रसिद्ध पहल में से एक वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल, जिसे गाडगिल आयोग के नाम से भी जाना जाता है, है। इस आयोग ने पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की, जिसने न केवल नीति निर्माताओं, बल्कि आम जनता के लिए भी संरक्षण की अहमियत को उजागर किया। गाडगिल की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन आवश्यक है और स्थायी विकास तभी संभव है जब प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जाए।
डॉ. गाडगिल ने अपने काम में स्थानीय समुदायों और जनसंख्या की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना। उन्होंने पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर जैसी पहल की, जिसके माध्यम से ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को उनके स्थानीय जैविक संसाधनों का दस्तावेजीकरण और प्रबंधन करने का अवसर मिला। यह प्रयास न केवल पारिस्थितिकी विज्ञान में क्रांति लाया, बल्कि समाज और विज्ञान के बीच एक मजबूत पुल भी बना।
उनकी लेखनी और पुस्तकों ने भी भारतीय पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव डाला। This Fissured Land और Ecology and Equity जैसी किताबें आज भी पर्यावरणविदों, नीति निर्माताओं और छात्रों के लिए मार्गदर्शक के रूप में पढ़ी जाती हैं। इन रचनाओं में डॉ. गाडगिल ने यह दिखाया कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक प्रयास नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और स्थानीय समुदायों के सहयोग के बिना स्थायी नहीं हो सकता।
डॉ. गाडगिल का दृष्टिकोण हमेशा मानवीय और समावेशी रहा। वे न केवल एक वैज्ञानिक थे, बल्कि जनता के लिए वैज्ञानिक भी थे। उनके कार्य ने यह सिखाया कि पारिस्थितिकी अध्ययन केवल प्रयोगशालाओं या विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका प्रभाव समाज के हर स्तर तक पहुँचना चाहिए।
आज जब भारत और विश्व जलवायु संकट, वन्य जीवन हानि और जैव विविधता के नुकसान जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, डॉ. गाडगिल की विरासत और उनके विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया कि विज्ञान और समाज के बीच संतुलन बनाए रखना ही भविष्य की स्थिरता की कुंजी है।
डॉ. माधव गाडगिल न केवल भारतीय पारिस्थितिकी के क्षेत्र में एक पायनियर थे, बल्कि उनके कार्य, शिक्षाएं और दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। उनके योगदान ने यह स्पष्ट किया कि विज्ञान और समाज को अलग नहीं देखा जा सकता और असली संरक्षण तभी संभव है जब स्थानीय समुदाय, नीति निर्माता और वैज्ञानिक मिलकर काम करें।
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