तो भाई पंचायत का नया सीज़न देखा कि नहीं देखा?
पंचायत का नया सीज़न आ चुका है, और इस बार आपको फुलेरा में चुनावी माहौल देखने को मिलेगा। ये वही चुनाव है, जिससे शहर के लोग हमेशा वंचित रहे हैं, जिन्हे शायद इतनी जानकारी न हो। लेकिन पंचायत देखने के बाद उनकी आशंका थोड़ी काम हो जाएगी। ये चुनाव हैं गांव के प्रधानी के चुनाव। पंचायत का ये चुनावी माहौल आपको ले जाने वाला है एक रोलर-कोस्टर राइड पर।
बात करते हैं सीज़न 3 से, जहां बृजभूषण दुबे, यानी प्रधान जी को गोली लगी थी। इस सीजन में प्रधान जी की तबीयत में सुधार हो रहा है, और गोली चलाने वाले की भी खोज चालू है। सचिव, भूषण और विधायक जी तीनों पे पुलिस केस हो चुका है। शुरुआत में तो सब केस हटाने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन फिर सबकुछ जैसे फुर्र हो गया हो। एक ही एपिसोड में मुद्दा चल रहा है और उसके बाद पूरे सीजन में इसका जिक्र तक नहीं है।
एक बेहद जरूरी बात मैं ये कहना चाहूंगा, कि ये सीज़न थोड़ा स्लो है, और कभी-कभी लगता है कि बस बेवजह खींचा जा रहा है। काफी सारे सीन तो ऐसे हैं कि जैसे जबरदस्ती ठूंसे गए हों। लेकिन एक बात काबिल-ए-तारीफ है इस शो के क्रिएटर्स की… चारों सीज़न देखने के बाद, आप सोच में पड़ जाएंगे, कि कुछ किया हो या ना किया हो लेकिन एक कमाल ज़रूर किया है क्रिएटर्स ने… और वो है हर एक सीज़न की एंडिंग को डिज़ाइन करना उसमें ऐसा हुक छोड़ देना, जो अगला सीजन देखने पे मजबूर कर दे। किसी भी सीज़न की बात कर लो, इन्होंने हर सीज़न के एंड में एक फील-गुड वाला फीलिंग और एक होप छोड़ी है।
इस सीजन में कहानी एक फ़्लो में चलने के बजाए, मुद्दों पर आधारित है। हर एक एपिसोड में एक अलग मुद्दा चल रहा है। चाहे बात हो बिनोद से पार्टी बदलवाने की, चाहे बात हो फुलेरा में जेनरेटर लगवाने की या चाहे बात हो प्रधान के घर छापा डलवाने की। आप जब भी नया एपिसोड देखते हो तो उसमें एक अलग और नया मुद्दा देखने को मिलता है।
हम कह सकते हैं कि स्टोरी कनेक्ट कम और मुद्दे ज़्यादा हैं इस सीज़न में।
8 एपिसोड का ये सीज़न, पिछले 3 सीज़न्स की तरह वो कमाल नहीं कर पाया, जितनी इससे उम्मीदें थीं। ऐसा लगता है कि बस बनाने के लिए बनाया है। आप कहीं-कहीं बोर हो जाएंगे, तो कुछ सीन में आपको मज़ा भी आएगा।
इस सीज़न का जो मेन मकसद है, वो है पंचायती चुनाव। जिसमें एक तरफ हैं मंजू देवी हैं और दूसरी तरफ हैं क्रांति देवी। एक तरफ प्रधान जी और मंजू देवी चुनाव जितने की रणनीतियां बना रहे हैं तो दूसरी तरफ भूषण और उनकी पत्नी, प्रधान जी और मंजू देवी को नीचा दिखाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।
पिछले सीज़न्स की तरह फुलेरा अब सिर्फ़ हंसी मज़ाक का अड्डा नहीं रहा, बल्कि ये अब सियासत की रणभूमि बन चुका है।
अब अगर किरदारों की बात करें तो, एक तरफ सचिव जी, यानी जितेन्द्र कुमार अपनी CAT की परीक्षा के रिज़ल्ट के आने की राह देख रहे हैं, वहीं उन्हें प्रधान जी की बेटी से इश्क़ भी हो गया है। और इसी वजह से वो निष्पक्ष कम नज़र आते हैं। अब समझ ये नहीं आ रहा की प्रधान जी की बेटी की चुनेंगे या अपने करिअर को। इस बार सचिव जी और भी ज्यादा उलझन में दिख रहे हैं।
प्रधान जी भी हमेशा की तरह अपनी अकड़ बरक़रार रखे हुए हैं, जिन्हें अभी भी यह लगता है कि वही प्रधान हैं, और मंजू देवी की जगह अभी भी वही फ़ैसलें लेते हैं।
प्रह्लाद पांडे एक मासूमियत के साथ आगे चल रहे हैं, जिस तरह से उनकी धाक पिछले तीन सीज़न में थी, वही धाक अभी भी बरक़रार है। शायद प्रह्लाद वो किरदार हैं, जिसके बिना पंचायत अधूरी है। प्रह्लाद अब चुनाव लड़ने में ज़रा भी इच्छुक नहीं हैं। लेकिन क्लाइमैक्स तक आते-आते ये प्रह्लाद आपको एक सरप्राइज़ देने वाले हैं।
विकास का किरदार का वो ख़ासपन खत्म सा हो गया है, जो पिछले तीन सीज़न्स में था। ज़बरदस्ती के सीन, और विकास के बेवजह के डायलॉग इस सीज़न में काम के नहीं दिखाई देते और उन्हे काफी कमजोर बनाते हैं।
मंजू देवी, जो एक मेन कैरेक्टर हैं, इस सीज़न का जो सार है, काफ़ी कम नज़र आई हैं। और अभी भी उनके फ़ैसले उनके पति देव यानी कि बृजभूषण ही लेते हैं। मंजू देवी का किरदार निभाने वाली नीना गुप्ता एक बहतरीन कलाकार हैं, लेकिन उस हिसाब से उनका सही तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है। लेकिन हो सकता है की आने वाले सीजन में मंजू देवी एक इंडिपेंडेंट महिला के रूप में उभर के आयें।
भूषण, बिनोद और माधव तीनों की जुगलबंदी काबिल-ए-तारीफ़ है। इनके डायलॉग भी काफ़ी असरदार और छाप छोड़ने वाले हैं। ख़ासकर के बिनोद का ये डायलॉग – “ग़रीब हैं, गद्दार नहीं।” इस डायलॉग ने दर्शकों का दिल जीत लिया।

इस शो के सबसे अहम, सबसे कर्मठ, सबसे जुझारू किरदार, जिसे काफ़ी नज़रअंदाज़ किया गया था। इस किरदार से आप नफ़रत करने पर मजबूर हो जाओगे। और ये किरदार है क्रांति देवी का, जो हैं भूषण की पत्नी और प्रधान के पद की उम्मीदवार। क्रांति देवी के लिए एक बात दिल से निकलती है… “अदाकार वही होता है जो अपनी अदाकारी से रुला दे, अपनी अदाकारी से नफ़रत करने पे मजबूर कर दे।” क्रांति देवी का किरदार निभाने वाली सुनीता राजवर को आपने काफ़ी सीरीज़ में देखा होगा। लेकिन जो काम सुनीता ने पंचायत में किया है, उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

कुल मिल कर इस सीज़न में इतना दम नहीं है जितना पिछले 3 सीज़न्स में था, लेकिन फिर भी इस सीज़न के डायलॉग और कलाकारों की एक्टिंग आपको काफ़ी रिझाने वाली है। और हाँ… बाकी सीज़न्स की तरह इस सीज़न के एंड में भी एक ऐसा हुक दिया है, जो फिर से पंचायत के अगले सीज़न का इंतज़ार करने पे मजबूर करता है।
देखिए, इस सीज़न में अधूरापन तो है, लेकिन पंचायत के पिछले तीन सीज़न इसको बैलेंस कर लेते हैं। अब देखना ये है कि ये पंचायतीय ड्रामा कहां जाकर रुकता है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐☆☆ (3/5)
एक अच्छी लेकिन अधूरी – कुछ शानदार पल हैं, लेकिन असर उतना गहरा नहीं पड़ता जितनी उम्मीद थी।
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