सिनेमा हमेशा समाज के इतिहास और संस्कृति का आईना रहा है। यह हमें उन पलों तक ले जाता है जो किताबों में पढ़े तो जाते हैं, लेकिन पर्दे पर देखने से उनकी अनुभूति कई गुना गहरी हो जाती है। मराठी फिल्म ‘सत्यभामा’ भी ऐसा ही अनुभव देने का वादा करती है। हाल ही में जारी हुआ इसका ट्रेलर दर्शकों को बीते दौर की भावनाओं में डूबो देता है और फिल्म को लेकर उत्सुकता बढ़ा देता है। यह फिल्म 8 अगस्त को पूरे महाराष्ट्र में रिलीज़ होने जा रही है।
फिल्म की कहानी उस समय की है जब सती प्रथा जैसी अमानवीय परंपरा समाज में जकड़ बनाए हुए थी। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी, बल्कि ऐसी सच्चाई थी जिसने अनगिनत निर्दोष स्त्रियों की जिंदगी छीन ली। फिल्म का नायक इस अन्याय को देखकर विचलित होता है और इसके खिलाफ आवाज़ उठाने का संकल्प लेता है। यह विद्रोह न सिर्फ उसकी जिंदगी बदल देता है बल्कि समाज के लिए भी क्रांति की शुरुआत बनता है।
हरे-भरे प्राकृतिक दृश्य, पुराने मंदिर और बांसुरी की मधुर धुन से ट्रेलर की शुरूआत होती है। धीरे-धीरे कहानी प्रेम, त्याग और रिश्तों की गहराई में उतरती है। इसमें एक सुंदर प्रेम कथा के साथ भाई-बहन के स्नेहपूर्ण रिश्ते की झलक भी देखने को मिलती है। यह केवल एक फिल्म नहीं बल्कि एक ऐसा विचार है जो आज भी हमारे समाज को आईना दिखाने का काम करता है।
फिल्म का निर्माण श्री साई सृष्टि फिल्म्स एलएलपी के बैनर तले मनीषा पेखळे, सारंग मनोज, अंकुर सचदेव और वीरल दवे ने किया है। निर्देशन की जिम्मेदारी सारंग मनोज और अभिजीत झाडगांवकर ने संभाली है, जबकि पटकथा और संवाद खुद मनीषा पेखळे ने लिखे हैं। फिल्म में माधव अभ्यंकर, अभिजीत आमकर, भाविका निकम, सृष्टी मालवंडे, ज्योती पाटील जैसे कलाकारों ने अपनी दमदार अदाकारी से किरदारों को जीवंत कर दिया है। वहीं बाल कलाकारों ऋषिका सूर्यवंशी और अर्नव शिंदे का अभिनय भी खास प्रभाव छोड़ता है।
संगीत के मामले में भी फिल्म खास है। मनीषा पेखले के लिखे गीतों को निखिल महामुनी ने सुरों में पिरोया है, जबकि हनी सातमकर ने प्रभावी पृष्ठभूमि संगीत दिया है। नृत्य निर्देशन नरेंद्र पंडित ने किया है। फिल्म की खूबसूरती को और निखारने के लिए सचिन एच. पाटील की कला निर्देशन, जितेंद्र आचरेकर की सिनेमैटोग्राफी और निलेश गावंड की संपादन कला महत्वपूर्ण साबित होती है। वीएफएक्स सुमीत ओझा ने तैयार किए हैं, जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को और वास्तविक बनाते हैं।
यह फिल्म पहले ही ईस्टर्न यूरोप फिल्म फेस्टिवल, स्वीडन फिल्म फेस्टिवल, जागरण फिल्म फेस्टिवल और बर्लिन लिफ्ट-ऑफ फिल्म फेस्टिवल जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर सराही जा चुकी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली यह सराहना बताती है कि ‘सत्यभामा’ न सिर्फ एक क्षेत्रीय फिल्म है बल्कि एक ऐसा सिनेमा है जिसकी कहानी सीमाओं को लांघकर भी असर छोड़ती है।
निर्देशकों का कहना है कि यह फिल्म केवल अतीत को दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि यह आज के समाज में भी प्रासंगिक संदेश देती है। उनका मानना है कि भले ही हम तकनीकी रूप से आधुनिक युग में पहुंच चुके हों, लेकिन अब भी कुछ मान्यताएं और परंपराएं महिलाओं के अधिकारों में बाधा बनती हैं। ‘सत्यभामा’ का उद्देश्य दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करना है कि बदलाव की आवश्यकता केवल इतिहास में नहीं थी, बल्कि आज भी है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी भावनात्मक गहराई है। सती प्रथा के खिलाफ नायक की लड़ाई सिर्फ एक चरित्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन सभी महिलाओं की पीड़ा का प्रतीक है, जिन्होंने उस दौर में अपने अधिकारों के लिए आवाज़ भी नहीं उठा पाईं। फिल्म उनके संघर्षों को संवेदनशीलता से सामने लाती है और दर्शकों को झकझोर देती है।
‘सत्यभामा’ अपने सशक्त कथानक, उम्दा कलाकारों और उच्च निर्माण मूल्य के कारण न केवल दर्शकों को प्रभावित करेगी, बल्कि उन्हें सोचने पर मजबूर भी करेगी। यह फिल्म इतिहास को एक नई दृष्टि से पेश करती है और समाज को यह याद दिलाती है कि समानता और अधिकार के लिए लड़ी गई लड़ाइयां कभी व्यर्थ नहीं जातीं।


