“मैं आज़ाद था, आज़ाद हूं और आज़ाद ही रहूंगा!”
चन्द्रशेखर आज़ाद के ये शब्द सिर्फ़ एक नारा नहीं, बल्कि आज़ादी के जुनून की आग हैं… जो आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में धड़कते हैं। उन्होंने जो कहा, वो आख़िरी सांस तक निभाया।
ग़ुलामी कभी कुबूल नहीं की, और अंग्रेज़ों की पकड़ में कभी नहीं आये।
आज उनकी जयंती पर, आइये याद करें वो अहम लम्हे जिन्होंने एक लड़के को ‘आज़ाद’ बना दिया… इतिहास का एक अमिट नाम।
बचपन की चिंगारी
चन्द्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाभरा गाँव में हुआ। एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस बच्चे का नाम था चन्द्रशेखर तिवारी। बचपन से ही उनके मन में कुछ अलग करने की चाह थी। गाँव में बैठकर वो छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप की कहानियाँ सुनते थे। इन कहानियों ने उनके छोटे से दिल में देशभक्ति की आग जला दी। वो सोचते थे, ‘हमारा देश गुलाम क्यों है?’
जलियाँवाला बाग की चीख
1919 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। अमृतसर में निहत्थे लोगों पर अंग्रेजों ने गोलियाँ चलाईं। हज़ारों मरे, हज़ारों घायल हुए। उस वक्त चन्द्रशेखर सिर्फ़ 13 साल के थे। लेकिन इस घटना ने उनके मन में गहरी छाप छोड़ी। वो गुस्से से भर गए। उन्होंने ठान लिया कि अब अंग्रेजों को इस देश से भगाना ही होगा। ये वो पल था, जब एक बच्चे ने क्रांतिकारी बनने का रास्ता चुन लिया।

आज़ादी का सपना
जलियाँवाला बाग की घटना ने चन्द्रशेखर को झकझोर दिया। वो समझ गए कि आज़ादी की लड़ाई आसान नहीं होगी। लेकिन उनके मन में एक ही जुनून था… भारत को आज़ाद करना। उन्होंने अपने आप को इस मकसद के लिए समर्पित कर दिया। वो जानते थे कि ये रास्ता खतरों से भरा है, फिर भी वो डटकर मुकाबला करने को तैयार थे।
‘आज़ाद’ नाम की गूँज
1921 में चन्द्रशेखर ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। वाराणसी में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ प्रदर्शन किया। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो जवाब आया, “मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और घर जेल!” ये सुनकर सब दंग रह गए। उस दिन से चन्द्रशेखर तिवारी, ‘चन्द्रशेखर आज़ाद’ बन गए। ये नाम देशभक्ति की मिसाल बन गया।
रामप्रसाद बिस्मिल का साथ
असहयोग आंदोलन के रुकने से चन्द्रशेखर निराश हुए। लेकिन तभी उनकी मुलाकात मन्मथ नाथ गुप्ता से हुई। मन्मथ ने उन्हें रामप्रसाद बिस्मिल से मिलवाया। बिस्मिल एक जुझारू क्रांतिकारी थे। उनकी और चन्द्रशेखर की सोच एक थी। दोनों ने मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) को मज़बूत किया। चन्द्रशेखर ने संगठन के लिए पैसे जुटाने शुरू किए। उनकी ज़िंदगी अब क्रांति की राह पर थी।

भगत सिंह से मुलाकात
लाहौर में एक और नौजवान क्रांति की आग लिए घूम रहा था… भगत सिंह। चन्द्रशेखर ने उनसे मुलाकात की। दोनों की सोच मिली। चन्द्रशेखर ने भगत सिंह को एचआरए में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। ये मुलाकात दो ज्वालामुखियों का मिलन थी। दोनों ने मिलकर अंग्रेजों को चुनौती देने की ठानी। उनकी दोस्ती ने क्रांति की आग को और भड़का दिया।
काकोरी कांड
9 अगस्त 1925 को काकोरी में एक ट्रेन लूटी गई। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह के साथ चन्द्रशेखर ने इस योजना को अंजाम दिया। मकसद था अंग्रेजी खजाने से पैसे लूटना। ये पैसे क्रांति को मज़बूत करने के लिए चाहिए थे। काकोरी कांड ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया। ये घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मील का पत्थर बनी।

क्रांतिकारियों की कुर्बानी
काकोरी कांड के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कस दिया। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को पकड़ लिया गया। उन पर मुकदमा चला। 19 दिसंबर 1927 को चारों को फाँसी दे दी गई। चन्द्रशेखर का दिल टूट गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वो और मज़बूती से क्रांति की राह पर चल पड़े।
तस्वीर से दूरी
चन्द्रशेखर जानते थे कि उनकी तस्वीर ब्रिटिश पुलिस के लिए खतरा बन सकती है। अगर उनका चेहरा सामने आता, तो पकड़े जाने का डर था। इसलिए उन्होंने कभी अपनी तस्वीर नहीं खिंचवाई। उनकी चालाकी और सावधानी ने उन्हें अंग्रेजों की पकड़ से दूर रखा। वो एक साये की तरह काम करते थे।
गद्दारी का दंश
27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव राज से मिलने गए। लेकिन किसी ने उनकी मुखबिरी कर दी। कहा जाता है कि उनके करीबी वीरभद्र तिवारी ने पुलिस को खबर दी। हालांकि, इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं है। फिर भी, उस दिन पुलिस ने अल्फ्रेड पार्क को घेर लिया। चन्द्रशेखर के सामने मौत खड़ी थी।
‘आज़ाद’ की आखिरी सलामी
चन्द्रशेखर ने ठान रखा था कि वो कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएँगे। पुलिस से घिरने के बाद भी वो डटकर लड़े। उन्होंने कहा था, “दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आज़ाद ही हैं और आज़ाद ही रहेंगे।” आखिरी साँस तक वो लड़े। जब गोलियाँ खत्म हुईं, तो उन्होंने अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली। 27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर आज़ाद शहीद हो गए। लेकिन वो सचमुच आज़ाद रहे।
आज़ाद की विरासत
चन्द्रशेखर आज़ाद की कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक जुनून की है। उन्होंने दिखाया कि हिम्मत और जोश से कुछ भी मुमकिन है। आज भी उनका नाम हर भारतीय के दिल में गूँजता है। वो एक सितारा थे, जो जलकर भी रौशनी बिखेर गया। उनकी कुर्बानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी की कीमत कितनी बड़ी है।
Also Read: इंक़लाब ज़िंदाबाद! भारत के मशहूर क्रांतिकारी नारे के पीछे छिपा हुआ बाग़ी शायर


