भारतीय खेलों के क्षेत्र में सुरेश कलमाड़ी का नाम एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा। 6 जनवरी 2026 को पुणे में उनका निधन हो गया। उनके जीवन और करियर ने भारतीय खेलों को नई ऊँचाइयाँ दीं और खेल प्रशासन में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उनका जीवन यह दिखाता है कि अनुशासन, नेतृत्व और समर्पण किसी भी क्षेत्र में स्थायी छाप छोड़ सकते हैं।
सुरेश कलमाड़ी का जन्म 1944 में मद्रास में हुआ। उन्होंने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से शिक्षा पूरी की और इसके बाद भारतीय वायुसेना में शामिल हुए। 1964 से 1974 तक उन्होंने पायलट और प्रशिक्षक के रूप में सेवा दी और स्क्वाड्रन लीडर के पद तक पहुंचे। इस अनुभव ने उन्हें अनुशासन, जिम्मेदारी और नेतृत्व की समझ दी, जो उनके भविष्य के खेल प्रशासन में काम आई।
उनकी राजनीतिक यात्रा भी उल्लेखनीय रही। उन्होंने पुणे यूथ कांग्रेस की कमान संभाली और संजय गांधी तथा राजीव गांधी जैसे नेताओं के संपर्क में आए। कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद भी वे पार्टी में सक्रिय रहे और 1982, 1988, 1994 और 1998 में राज्यसभा सदस्य के रूप में चुने गए। 1995 में वे प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में रेल मंत्रालय के राज्य मंत्री भी रहे। इस समय से उन्हें राजनीति और प्रशासनिक कौशल दोनों का अनुभव मिला, जिसने उनके खेल प्रशासन के करियर को नई दिशा दी।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान खेल प्रशासन में रही। 1996 से 2011 तक उन्होंने भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के अध्यक्ष के रूप में सेवा दी। उनके नेतृत्व में भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन सफलतापूर्वक आयोजित किए, जिनमें 2003 के अफ्रीका-एशिया खेल, 2008 के कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय खेलों को पुनर्जीवित किया और एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के रूप में घरेलू प्रतियोगिताओं में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को आकर्षित किया।
कलमाड़ी के योगदान में 2008 बीजिंग ओलंपिक्स का ऐतिहासिक पल भी शामिल है, जब निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने भारत का पहला व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 2001 से 2015 तक वर्ल्ड एथलेटिक्स काउंसिल का हिस्सा भी बने और 2008 में ओलंपिक जागरूकता फैलाने के लिए ANOC अवार्ड प्राप्त किया।
उनका करियर केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा। 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें चुनौती दी। हालांकि अप्रैल 2025 में प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें क्लीन चिट दी। इसके बावजूद, उनके योगदान और खेलों के प्रति समर्पण को हमेशा याद किया जाएगा।
सुरेश कलमाड़ी का जीवन दिखाता है कि एक व्यक्ति, चाहे वह पायलट हो या राजनीतिक और खेल प्रशासन में नेतृत्वकर्ता, सही दृष्टिकोण और मेहनत से देश के खेल क्षेत्र में स्थायी छाप छोड़ सकता है। उनके द्वारा स्थापित कार्यक्रम और आयोजन भारतीय खेलों के विकास में एक मजबूत नींव के रूप में काम करते रहेंगे।
उनकी यादें और योगदान न केवल खेल जगत में बल्कि युवा खिलाड़ियों और प्रशासकों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बने रहेंगे। सुरेश कलमाड़ी की यह यादगार यात्रा एक संदेश देती है कि समर्पण, नेतृत्व और जुनून किसी भी क्षेत्र में महानता की कुंजी हैं।
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