“मुझे लगता था कि मैं इन लोगों को सीखा रहा हूं लेकिन असल में इन्होंने मुझे बहुत कुछ सीखाया है,,” ‘सितारे ज़मीन पर’ के क्लाइमैक्स में गुलशन अरोड़ा (आमिर खान) स्वीकार करता है। उसी के साथ दर्शक की एक आँख खुशी से और दूसरी भावनाओं से छलक जाती है। 158 मिनट की यह फिल्म सहज हास्य, करुणा और आत्मीयता का खजाना है। इसके केंद्र में गंभीर मुद्दा होते हुए भी आर. एस. प्रसन्ना निर्देशित यह फिल्म लगातार हल्की-फुल्की बनी रहती है।
‘सितारे ज़मीन पर’ 2018 की स्पैनिश फिल्म ‘चैम्पियन्स’ की ओफिशियल रीमेक है। मेकर्स ने इसे ‘तारे ज़मीन पर’ की स्पिरिचूअल सीक्वल कहा है। आमिर की ‘तारे’ की तरह ‘सितारे’ इंसान को ‘मानव’ बनने की प्रेरणा देती है — ताज़गी भरे, मनोरंजक अंदाज़ में। बिना बोरियत से भरे उपदेशों के।
कहानी है दिल्लीवाले बास्केटबॉल कोच गुलशन की। शराब पीकर, नशे में गाड़ी चलाने और पुलिस की गाड़ी से टक्कर मारने के कारण उसे ‘सज़ा’ मिलती हैः बौद्धिक रूप से अक्षम लोगों को तीन महीने तक बास्केटबॉल कोचिंग देना। “चलो, जेल से तो बचे,” ऐसा गुलशन को सुकून है। मगर टीम के दस ‘पागलों’ का सामना होते ही वह चकरा जाता है। उसकी टीम के सदस्य शरीर से तो परिपक्व हैं पर दिमाग से बच्चे हैं। उनकी हरकतें अजीब हैं। गुलशन की मजबूरी यह है कि उसे या तो यह सज़ा भुगतनी है या इससे भी सख़्त सज़ा स्वीकार करनी है। वह बेमन से कोचिंग शुरू करता है और…
टीम में कौन-कौन हैं? गुड्डू (गोपी कृष्णन वर्मा) पानी और नहाने से डरता है, लेकिन गुलशन को बार-बार गले लगा कर उस पर बदबू की बारिश करता है। शर्मा जी (रिशी सहानी) क्या बोलते हैं वह एक रहस्य ही है। लोटस (आयुष भणसाली) बालों को रंगकर कभी-कभी ‘स्टैच्यू’ बन जाता है। सुनील (आशीष पेंडसे) पंखा गिरने के डर से हेलमेट नहीं उतारता। और बाकी? कोई पेड़ों से बातें करता है, कोई उल्टा होकर बास्केट में बॉल डालता है, तो किसी की एक उंगली हमेशा कान में होती है… मानो सब बच्चों सी निर्दोष हरकतें करते हैं लेकिन वे गुलशन के लिए कष्टदायक हैं।
…वैसे गुलशन भी कम नहीं है। प्रेमविवाह के बावजूद वह पत्नी सुनीता (जेनेलिया देशमुख) को छोड़कर माँ (डॉली अहलूवालिया) के साथ रहता है। अब इस इंसान का पाला ऐसे लोगों के साथ पड़ा है जिन्हें वह जड़बुद्धि वाला मानता है। दिल्ली की टीम के मैच से शुरू होकर फिल्म मुंबई में फाइनल मैच तक पहुँचती है। इस सफर में एक ओर गुलशन के माध्यम से नॉर्मल व्यक्ति की परतें उघड़ती हैं, दूसरी ओर समाज जिनको ‘नॉर्मल’ नहीं मानता ऐसे व्यक्तियों की खूबियों की परतें उघड़ती हैं।
‘सितारे ज़मीन पर’ हमारे सामने ग़लत विचारधारा की करुणा और यह कि अगर हम परस्पर सम्मान करना सीखें तो जीवन की सुंदरता क्या हो सकती है — दोनों पक्ष उजागर करती है। पहले कुछ मिनट में ही यह हमारा पूरा ध्यान खींच लेती है। दृश्यों की शानदार बुनावट और कथा का माहौल इसकी मज़बूत वजह हैं। गले में उतरते अलंकारों और उदाहरणों के ज़रिए फिल्म कठिन बात को आसान और मीठी बना देती है। उदाहरण के तौर पर, बौद्धिक रूप से अक्षम लोगों के सर्वोदय केंद्र के संचालक करतार सिंह (गुरपाल सिंह) और गुलशन के बीच एक दृश्य। व्यक्ति की बुद्धिमत्ता जन्म के समय अवरुद्ध रह जाने के पीछे का वैज्ञानिक कारण बताते हुए करतार कहते हैं, “हमारी किस्मत हथेलियों में नहीं, क्रोमोज़ोम में लिखी होती है।” फिर, बौद्धिक अक्षमता में छुपे हुए बालपन की बात करते हुए करतार कहते हैं, “हर घर को थोड़ा बचपन चाहिए होता है… (क्योंकि) वे (बच्चे) घर को बूढ़ा नहीं होने देते।” एक दृश्य में अपने घमंड की स्वीकारोक्ति करते हुए गुलशन सुनीता से कहता है, “मर्दों और हस्बैंड्स की हाइट कितनी भी हो, ईगो 100 फुट का होता है।” और एक दृश्य में वह सुनीता से कहता है, “हम प्रॉब्लम बन गए थे, हम कपल बन सकते हैं?” इसका श्रेय लेखक दिव्य निधि शर्मा को जाना चाहिए।
गीत कम हैं। शंकर-एहसान-लॉय के संगीत में वे कहानी के परफेक्ट पार्टनर हैं। ‘स्याही कम पड़ जाएगी’ और ‘पापा कहते थे’ (‘गुड फॉर नथिंग’) गीत अच्छे हैं। गुड्डू के भय का अंजााम दिखाता इंटरवल का दृश्य दिल को झकझोर देता है। इंटरवल के बाद फिल्म कहीं-कहीं पर पटरी से ज़रूर उतरती है। कुछ परिस्थितियाँ औसत और कम गहराई वाली हैं। जैसे कि मैच के लिए सार्वजनिक परिवहन की बस में यात्रा करती टीम और टीम को निजी बस दिलाने के जुगाड़ वाले दृश्य। वैसे ही पत्नी के लिए गुलशन का उभरता प्रेम और उसकी मम्मी के ट्रैक का अंत के द्रश्यों का कथा में विशेष महत्त्व नहीं हौ। फिर भी, दी एंड तक पहुँचते-पहुँचते छोटी-मोटी कमजोरियाँ दब जाती हैं। क्योंकि अंत में जो याद रह जाती है वह है कोमल मनोरंजन के साथ प्रेरणादायक मनन।
तकनीकी रूप से फिल्म लगभग त्रुटिहीन है। आमिर निर्मित फिल्म में यह अपेक्षित भी होता है। जी. श्रीनिवास रेड्डी की सिनेमैटोग्राफी और अपूर्व भगत का आर्ट डिरेक्शन फिल्म के अनुरूप है। चारु श्री रॉय की एडिटिंग व्यवस्थित है। राम संपत का बैकग्राउंड म्यूज़िक प्रभावशाली है।
अभिनय की बात करें तो आमिर श्रेष्ठ फॉर्म में हैं। सवाल ही नहीं। उन्होंने गुलशन के किरदार में बारीकियाँ डाली हैं। उदाहरण के तौर पर, मुंबई की होटल में वह मम्मी से जिस तरह मोबाइल पर बात करता है वह दाद के क़ाबिल है। जेनेलिया छोटे लेकिन सटीक किरदार को जीवंत कर देती हैं। गुरपाल सिंह, डॉली अहलूवालिया अपने-अपने मोर्चे पर जमे हैं। हरगोविंद की माँ के छोटे किरदार में आमिर की बहन निखत खान हैं। बृजेन्द्र काला भी फिल्म में हैं। उनके किरदार की खासियत फिल्म देखकर जाननी रहेगी। बात रही दस तोपों की — यानी बास्केटबॉल टीम बने कलाकारों की — तो उन्हें आमिर की थ्री इडियट्स का एक संवाद समर्पित है, “जहाँपनाह, तुस्सी ग्रेट हो, तोहफा क़बूल करो…” क्योंकि ये सभी कलाकार असल जीवन में भी ईश्वर के विशेष आशीर्वाद प्राप्त सितारे हैं। इनकी प्रतिभा को मज़ेदार फिल्म से दर्शकों के सामने लाने वाले प्रसन्ना-आमिर की जोड़ी को भी सलाम।
जैसे आमिर ने ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ या ‘तारे ज़मीन पर’ जैसी रिलीज़ से पहले कम प्रचारित फिल्मों से सभी को चौंका दिया था, बिल्कुल वैसा इस फिल्म के मामले में भी हो सकता है। न भी हो तो भी, सिनेमाघर में इसे देखकर आप खुशहाल एक सौ दस प्रतिशत होने वाले हैं। ‘सितारे ज़मीन पर’ बौद्धिक अक्षमता को असरकारक ढंग से उजागर करती है और हमारे जैसे तथाकथित ‘नॉर्मल’ लोगों को उनकी ओर नए दृष्टिकोण से देखने को प्रेरित करती है, जिससे हो सकता है कि पूरा समाज अपना नज़रिया बदल दे।
‘सितारे ज़मीन पर’ दिल में बस जाने वाली फिल्म है, परिवार के साथ बड़े पर्दे पर देखने लायक है, ख़ास तौर पर आमिर के चाहने वालों और दिल को छू जाने वाली फिल्मों के शौकीनों के लिए। परिवार के साथ बड़े पर्दे पर देखने लायक है।
रेटिंग – साढ़े तीन स्टार्स
नोट: शर्मा जी का किरदार निभाने वाले ऋषि सहानी ने 1999 में स्पेशल ओलंपिक्स में तैराकी में भारत के लिए गोल्ड और सिल्वर मेडल जीता था।
‘सितारे ज़मीन पर’ के दस सितारे ये हैं: गुड्डू (गोपीकृष्णन वर्मा), शर्मा जी (ऋषि सहानी), लोटस (आयुष भणसाली), सुनील (आशीष पेंडसे), सतबीर (आरुष दत्ता), करीम (संवित देसाई), बंटू (वेदांत शर्मा), राजू (ऋषभ जैन), हरगोविंद (नमन मिश्रा) और गोलू (सिमरन मंगेशकर)।


