खाने में जो भरोसा होता है
भारत में खाना सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं है। स्कूल जाने से पहले दूध का गिलास, दफ़्तर से लौटने के बाद दाल की कटोरी, त्योहार पर पड़ोसी को दी गई मिठाई। ये सब रोज़मर्रा की चीज़ें लगती हैं पर इनमें एक गहरा भरोसा छुपा होता है। जब खाना रसोई में आता है तो एक अनकहा वादा भी साथ आता है कि यह सुरक्षित है।
पर हाल के कुछ महीनों में यह वादा कमज़ोर पड़ता दिख रहा है।
आंध्र की त्रासदी और जयपुर का घोटाला
सन् २०२६ की शुरुआत में आंध्र प्रदेश में एक दर्दनाक हादसा हुआ। दूषित दूध पीने से कई लोगों की मौत हो गई और बहुत से लोग बीमार पड़ गए। जाँच में शक़ हुआ कि भंडारण या प्रसंस्करण के दौरान औद्योगिक रसायन दूध में घुस गए थे। पीड़ित साधारण परिवारों के लोग थे जो एक रोज़मर्रा की चीज़ ख़रीद रहे थे।
लगभग उसी समय जयपुर में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने एक बड़े घोटाले का पर्दाफ़ाश किया। अधिकारियों ने बारह हज़ार से अधिक डेयरी उत्पादों और मसालों के डिब्बे ज़ब्त किए। इन डिब्बों पर छपी समाप्ति तिथियाँ कथित तौर पर थिनर से मिटाई गई थीं और उनकी जगह नई फ़र्ज़ी तारीख़ें लगाई गई थीं। कुछ ज़ब्त डिब्बों पर अमूल जैसे बड़े ब्रांड के नाम थे हालाँकि जाँचकर्ताओं का कहना था कि यह हेरफेर वितरण श्रृंखला में हुई, न कि उत्पादन स्तर पर। जयपुर में कोई बड़ी मौत नहीं हुई पर इस तरह की सोची-समझी जालसाज़ी ने उपभोक्ताओं में बेचैनी फैला दी।
दूध भारत का सबसे भरोसेमंद खाद्य पदार्थ माना जाता है। जब वही डर का स्रोत बन जाए तो सवाल उठना लाज़िमी है। क्या देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था एक अरब से अधिक लोगों की ज़रूरत के लिए काफ़ी मज़बूत है?
यह पहली बार नहीं है
खाद्य सुरक्षा की घटनाएँ किसी एक शहर या एक उत्पाद तक सीमित नहीं रहतीं। वे अक्सर गहरी संरचनात्मक कमज़ोरियों को उजागर करती हैं। पिछले एक दशक में भारत ने बार-बार ऐसे हादसे देखे हैं जो दूषित आटे, मिलावटी दूध और असुरक्षित खाना पकाने की आदतों से जुड़े रहे हैं।
दूध में मिलावट सबसे पुरानी और सबसे परेशान करने वाली समस्या है। डिटर्जेंट, यूरिया और स्टार्च जैसे पदार्थों का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। इसकी वजह सीधी है। जब दूध के दाम कम हों और माँग अधिक हो तो कुछ आपूर्तिकर्ता लालच में पड़ जाते हैं।
यह सुनने में घटिया लगता है पर आर्थिक प्रलोभन असली है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर साल लगभग साठ करोड़ लोग दूषित भोजन से बीमार पड़ते हैं और क़रीब चार लाख बीस हज़ार लोगों की मौत होती है। भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में खाद्य सुरक्षा की छोटी-सी चूक भी बड़े पैमाने पर असर करती है।
दूध का सफ़र और उसके ख़तरे
दूध एक लंबा और नाज़ुक सफ़र तय करता है। यह सफ़र छोटे डेयरी किसान से शुरू होकर चिलिंग प्लांट, परिवहन टैंकर और वितरण केंद्रों से होता हुआ दुकानों और घरों तक पहुँचता है। हर क़दम पर उत्पाद कमज़ोर पड़ सकता है।
इस पूरी व्यवस्था पर एक बढ़ता हुआ दबाव है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है और वह है जलवायु। हाल के वर्षों में भारत के बड़े हिस्सों में लंबी लू चली है। तेज़ गर्मी में शीतलन श्रृंखला और कमज़ोर हो जाती है। अगर तापमान नियंत्रण थोड़ी देर के लिए भी बिगड़ जाए तो दूध बाज़ार तक पहुँचने से पहले ही बैक्टीरिया से भर सकता है।
गंदे बर्तन, ख़राब रेफ़्रिजरेशन और लापरवाह ढुलाई भी जोखिम को बढ़ाती है। ये कमज़ोरियाँ अलग-अलग छोटी लग सकती हैं पर मिलकर बड़ा ख़तरा बन जाती हैं। आंध्र की त्रासदी में जाँचकर्ताओं का मानना है कि इसी नाज़ुक श्रृंखला में कहीं एक चूक ने औद्योगिक ज़हर को सैकड़ों घरों तक पहुँचा दिया।
नियम हैं, पर ज़मीन पर?
भारत में नियामक ढाँचे की कमी नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफ़एसएसएआई सामग्री, स्वच्छता और लेबलिंग के मानक तय करता है। फ़रवरी २०२६ में प्राधिकरण ने संशोधित खाद्य उत्पाद मानक लागू किए जो खाद्य योजकों और कुछ प्रसंस्करण प्रक्रियाओं पर सख़्त नियम लाए।
काग़ज़ पर यह व्यवस्था पूरी दिखती है। खाद्य निरीक्षक बाज़ारों, डेयरियों और उत्पादन इकाइयों से नमूने लेते हैं। प्रयोगशालाएँ इनकी जाँच करती हैं। उल्लंघन पर जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है।
फिर भी आंध्र की त्रासदी ठीक उसी समय हुई जब नए मानक लागू हो रहे थे। यह एक जानी-पहचानी समस्या को सामने लाता है। नियम मज़बूत हो सकते हैं पर ज़मीनी स्तर पर उनका पालन असमान रहता है।
एफ़एसएसएआई के आँकड़ों के अनुसार हर साल डेढ़ लाख से अधिक खाद्य नमूनों की जाँच होती है। फिर भी एक बड़ा हिस्सा सुरक्षा या गुणवत्ता के मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसमें दूषण से लेकर ग़लत लेबलिंग तक की समस्याएँ शामिल हैं।
व्यवस्था कहाँ टूटती है
भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था विशाल और बिखरी हुई है। करोड़ों उत्पादक, व्यापारी और छोटे विक्रेता पूरे देश में फैले हैं।
राज्य सरकारों के पास अक्सर प्रशिक्षित खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की कमी है। एक निरीक्षक हज़ारों प्रतिष्ठानों की निगरानी करता है। प्रयोगशाला जाँच में समय लगता है और उल्लंघनकर्ताओं के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई धीमी चलती है।
राष्ट्रीय खाद्य जाँच अभियानों ने कई बार यह दिखाया है। कुछ वर्षों में परीक्षण किए गए लगभग पंद्रह से बीस प्रतिशत नमूने सरकारी आँकड़ों के अनुसार सुरक्षा या गुणवत्ता जाँच में असफल रहे। इसमें मिलावट, ख़राब स्वच्छता और ग़लत लेबलिंग तीनों शामिल हैं।
जयपुर के मामले ने एक और चिंताजनक प्रवृत्ति उजागर की। समाप्ति तिथियाँ मिटाने के लिए रसायनों का कथित इस्तेमाल बताता है कि वितरण श्रृंखला में कुछ लोग अब ज़्यादा सोची-समझी धोखाधड़ी की तरफ़ बढ़ रहे हैं। ऐसी चालाकी पकड़ने के लिए सामान्य निरीक्षण काफ़ी नहीं है।
स्ट्रीट फ़ूड: प्यार और परहेज़ के बीच
भारत में खाना पड़ोस की डेयरियों में, मंदिर की रसोई में और सड़क किनारे चाट-जलेबी की रेहड़ियों पर भी मिलता है। यह अनौपचारिक नेटवर्क हर रोज़ करोड़ों लोगों का पेट भरता है। और यही इसे नियमित करना सबसे मुश्किल बनाता है।
स्ट्रीट फ़ूड को भारत की पाक संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। पर प्रशंसा सावधानी की जगह नहीं ले सकती। कुछ अनियमित ठेलों पर साफ़ पानी, उचित कचरा निपटान या सुरक्षित भंडारण की सुविधा नहीं होती।
स्ट्रीट फ़ूड को लेकर जो सांस्कृतिक दीवानगी बढ़ी है वह कभी-कभी इन चिंताओं को ढक देती है। बहुत से विक्रेता ईमानदारी से काम करते हैं और अपने इलाक़े की सेवा गर्व के साथ करते हैं। फिर भी उपभोक्ताओं को यह याद रखना चाहिए कि स्वच्छता के मानक एक ठेले से दूसरे ठेले पर बहुत अलग हो सकते हैं।
जो क़ीमत दिखती नहीं
असुरक्षित खाने के नतीजे थाली तक सीमित नहीं रहते। डॉक्टरों का अनुमान है कि दूषित भोजन हर साल लाखों भारतीयों को बीमार करता है।
लक्षण हल्के पेट दर्द से लेकर अंगों को नुकसान पहुँचाने वाले गंभीर ज़हर तक हो सकते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग सबसे अधिक जोखिम में होते हैं।
आर्थिक बोझ भी कम नहीं है। अस्पताल का ख़र्च, काम के गँवाए दिन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ परिवारों और स्वास्थ्य तंत्र दोनों पर भार डालती हैं। असली संख्या का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि बहुत से लोग घर पर ही ठीक हो जाते हैं और कभी किसी सरकारी आँकड़े में दर्ज नहीं होते।
दूसरे देशों ने क्या सीखा
खाद्य दूषण सिर्फ़ भारत की समस्या नहीं है। कई विकसित देश भी गंभीर खाद्य सुरक्षा संकटों का सामना कर चुके हैं।
सन् २०१३ में ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में घोड़े के मांस का घोटाला सामने आया। बीफ़ के रूप में बेचे जा रहे उत्पादों में घोड़े का मांस पाया गया। इससे सुपरमार्केट में बड़े पैमाने पर उत्पाद वापस लिए गए और आपूर्ति श्रृंखलाओं की सख़्त जाँच शुरू हुई।
सन् २००८ में अमेरिका में मूँगफली दूषण का बड़ा संकट आया। एक प्रसंस्करण इकाई से फैले साल्मोनेला बैक्टीरिया ने सैकड़ों उत्पादों को प्रभावित किया। हज़ारों लोग बीमार पड़े और इसके बाद संघीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में बड़े सुधार हुए।
जापान ने एक अलग रास्ता अपनाया। पहले के खाद्य सुरक्षा संकटों के बाद जापान ने दुनिया की सबसे कड़ी ट्रेसेबिलिटी यानी खाद्य-उत्पत्ति-अनुरेखण व्यवस्था बनाई। अब वहाँ कई उत्पादों को खेत से दुकान तक विस्तृत दस्तावेज़ों और डिजिटल रिकॉर्ड से ट्रैक किया जा सकता है।
ये उदाहरण बताते हैं कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्थाएँ अक्सर तकलीफ़देह सबक़ के बाद ही बेहतर होती हैं।
सुधार कैसा दिखेगा
भारत में खाद्य सुरक्षा सुधारने के लिए व्यावहारिक बदलाव ज़रूरी हैं।
राज्यों को अधिक प्रशिक्षित निरीक्षक और बेहतर सुसज्जित प्रयोगशालाएँ चाहिए। डेयरी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नज़दीकी निगरानी ज़रूरी है क्योंकि दूध हर रोज़ करोड़ों घरों में पहुँचता है। उल्लंघनकर्ताओं के ख़िलाफ़ त्वरित क़ानूनी कार्रवाई भी ज़रूरी है ताकि जुर्माना सिर्फ़ काग़ज़ पर न रहे।
छोटे विक्रेताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें सुरक्षित तरीक़े अपनाने में मदद कर सकते हैं। उपभोक्ताओं की भी भूमिका है। जब लोग बेहतर मानकों की माँग करते हैं और संदिग्ध उत्पादों की शिकायत करते हैं तो नियामकों को बाज़ार से मज़बूत संकेत मिलते हैं।
सुधार सुनने में सीधे लगते हैं। इतने विशाल और विविध देश में इन्हें लगातार लागू करना दूसरी बात है।
रसोई में एक चुप्पी भरा सवाल
ज़्यादातर भारतीयों के लिए खाद्य सुरक्षा की बहस तब तक दूर की बात रहती है जब तक कुछ बुरा न हो जाए। आंध्र की दूध त्रासदी और जयपुर के नक़ली समाप्ति तिथि घोटाले ने कई परिवारों के लिए यह मुद्दा दर्दनाक तरीक़े से क़रीब ला दिया है।
बहुत से घरों में रोज़ का सिलसिला जारी है। चाय उबलती है। दूध गिलासों में ढाला जाता है। बच्चे स्कूल जाते हैं।
भारत में खाने में भरोसा अभी भी है। हमेशा से रहा है।
पर अब उस भरोसे के साथ एक चुप्पी भरा सवाल भी है।
आपकी रसोई तक खाना पहुँचने से पहले उस पर नज़र कौन रख रहा है?
यह लेख विश्व स्वास्थ्य संगठन के खाद्य सुरक्षा आँकड़ों, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की रिपोर्टों, सरकारी खाद्य परीक्षण आँकड़ों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जाँच रिकॉर्डों पर आधारित है।
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