By: Hiren Gandhi
28 फरवरी 2026 के बाद मिडिल ईस्ट में शुरू हुआ तनाव अब केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक व्यापक वैश्विक टकराव का रूप ले चुका है, जिसमें ऊर्जा, मुद्रा और जियोपॉलिटिकल नियंत्रण की जटिल परतें शामिल हैं। अमेरिका द्वारा “एपिक फ्यूरी” ऑपरेशन की शुरुआत और इज़राइल के साथ मिलकर ईरान पर किए गए हमलों के बाद स्थिति तेजी से बिगड़ी, और इसके जवाब में ईरान ने भी इज़राइल तथा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों को निशाना बनाया। इस पूरे घटनाक्रम का असर अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर साफ दिखाई देने लगा है।
इस संघर्ष का सबसे बड़ा और तात्कालिक असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य और रेड सी जैसे अहम समुद्री मार्ग, जो दुनिया की लगभग 32 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति को संभालते हैं, प्रभावित हुए हैं। इसके चलते कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़कर 112 डॉलर तक पहुंच गई है। यह बढ़ोतरी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि सीधे महंगाई, व्यापार लागत और उत्पादन पर असर डालती है।
रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका इस संघर्ष को एक बड़े आर्थिक खेल के रूप में देख रहा है। लगभग 38 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज और आर्थिक दबाव के बीच डॉलर को मजबूत बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। पेट्रो डॉलर सिस्टम को फिर से सशक्त करने की कोशिश इसी दिशा में एक कदम मानी जा रही है। तेल को शक्ति और मुद्रा नियंत्रण का आधार मानते हुए अमेरिका ने पहले वेनेज़ुएला जैसे बड़े तेल भंडार वाले देशों पर ध्यान दिया और अब ईरान पर दबाव उसी रणनीति का विस्तार है। इसके साथ ही अमेरिका के हजारों डेटा सेंटर, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए जरूरी हैं, उन्हें सस्ती और स्थिर ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिससे तेल और गैस पर नियंत्रण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हथियार उद्योग भी इस समीकरण में अहम भूमिका निभाता है, क्योंकि वैश्विक हथियार बाजार में अमेरिका की बड़ी हिस्सेदारी है और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से इस क्षेत्र में मांग बढ़ती है।
इज़राइल के लिए यह संघर्ष केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। 2023 में हमास के हमले के बाद सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। ईरान द्वारा हमास, हिज़बुल्लाह और हूथी जैसे संगठनों को समर्थन मिलने के कारण इज़राइल सीधे ईरान को खतरे के रूप में देख रहा है। हालिया सैन्य कार्रवाइयों में ईरान के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाना इस बात का संकेत है कि इज़राइल खतरे को पूरी तरह समाप्त करने की नीति पर काम कर रहा है और किसी भी प्रकार की आधी कार्रवाई के लिए तैयार नहीं है।
वहीं, ईरान की रणनीति अलग और व्यावहारिक है। वह सीधे युद्ध में अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसके पास सप्लाई चेन को प्रभावित करने की ताकत है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है और रेड सी रूट के साथ मिलाकर इसका प्रभाव 32 प्रतिशत तक पहुंचता है। ईरान इस स्थिति का उपयोग वैश्विक दबाव बनाने के लिए कर रहा है। GCC देशों के रिफाइनरी और गैस प्लांट पर हमले इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनके पुनर्निर्माण में 4 से 5 साल लग सकते हैं। ईरान का लक्ष्य युद्ध जीतना नहीं, बल्कि दबाव बनाकर अपने हितों को सुरक्षित करना है।
इस संघर्ष के वैश्विक प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। एशिया और यूरोप में ऊर्जा की कमी के संकेत हैं, महंगाई फिर से बढ़ने लगी है और एशियाई देशों के निर्यात पर 8 से 12 प्रतिशत तक असर देखा जा रहा है। डॉलर मजबूत हो रहा है और वैश्विक मंदी की आशंका एक बार फिर बढ़ रही है। ऐसे में ऊर्जा पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी लगभग 80 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। इसके बावजूद भारत ने संतुलित और व्यावहारिक रणनीति अपनाई है। रूस से तेल आयात बढ़ाने के साथ-साथ GCC देशों और ईरान दोनों के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखे गए हैं। गैस आपूर्ति के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी की जा रही हैं, जो भारत के संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष भले ही सैन्य रूप में दिखाई देता हो, लेकिन इसकी असली जड़ ऊर्जा और मुद्रा के नियंत्रण में है। अमेरिका दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति पर काम कर रहा है, इज़राइल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठा रहा है, और ईरान दबाव बनाकर अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह निश्चित है कि इस संघर्ष का प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक बना रहेगा।

Secretary — InGlobal Business Foundation (IBF)
Director — ReNis Agro International LLP, Ahmedabad, India
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