एक पार्टी की कहानी, जो धैर्य, अनुशासन और समय के साथ भारतीय राजनीति की धुरी बन गई
राजनीति में कोई भी उत्थान रातोंरात नहीं होता। इतिहास गवाह है कि जो दल आज सत्ता के शिखर पर दिखते हैं, उनकी नींव अक्सर दशकों की मेहनत, असफलताओं और धैर्य से बनती है। भारतीय जनता पार्टी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
6 अप्रैल 1980 को जन्मी भाजपा आज 46 साल की हो गई है। और यह महज एक पार्टी का जन्मदिन नहीं है यह भारतीय राजनीति के सबसे असाधारण रूपांतरणों में से एक का पड़ाव है।
वो शुरुआती दिन, जब कोई गंभीरता से नहीं लेता था
1980 में जब भाजपा का गठन हुआ, तब राजनीतिक परिदृश्य बिल्कुल अलग था। आपातकाल के बाद की उथल-पुथल में कई दल उभरे और बिखरे। भाजपा भी उसी दौर की उपज थी जनसंघ की विरासत को समेटते हुए एक नई शुरुआत।
शुरुआती वर्षों में पार्टी को लोकसभा में महज दो सीटें मिलीं। बड़े नेता थे, विचारधारा स्पष्ट थी, लेकिन जनाधार सीमित था। तब के राजनीतिक विश्लेषकों में से शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह पार्टी एक दिन देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनेगी।
लेकिन भाजपा ने वो किया जो बहुत कम दल कर पाते हैं उसने हार को निराशा नहीं, बल्कि निर्माण का अवसर माना। जब वोट नहीं मिले, तब कार्यकर्ता तैयार किए गए। जब सत्ता नहीं मिली, तब संगठन मजबूत किया गया।
यही वो बीज था जिसने आगे चलकर विशाल वृक्ष का रूप लिया।
1990 का दशक: हाशिये से मुख्यधारा तक
1990 का दशक भाजपा के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ। राम मंदिर आंदोलन ने पार्टी को एक नई पहचान और विशाल जनसमर्थन दिया। 1996 में पहली बार भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, हालांकि सरकार मात्र 13 दिन चली।
लेकिन 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने यह साबित कर दिया कि भाजपा न केवल चुनाव जीत सकती है, बल्कि गठबंधन की जटिलताओं के बीच देश चला भी सकती है। पोखरण परमाणु परीक्षण, कारगिल की जीत और आर्थिक सुधार इस दौर ने भाजपा की छवि को एक विश्वसनीय राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित किया।
मोदी युग: राजनीति का नया व्याकरण
2014 का चुनाव भारतीय राजनीति में एक भूकंप की तरह आया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को अकेले 282 सीटें मिलीं 30 साल बाद किसी एक दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला था।
मोदी ने राजनीतिक संवाद का तरीका बदल दिया। सोशल मीडिया, मन की बात, सीधे जनता से संपर्क यह परंपरागत नेताओं से बिल्कुल अलग शैली थी। “सबका साथ, सबका विकास” का नारा केवल एक राजनीतिक स्लोगन नहीं था, बल्कि एक नई शासन नीति की घोषणा थी।
जीएसटी लागू करना, नोटबंदी, डिजिटल इंडिया, उज्ज्वला योजना, जनधन खाते, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण इन फैसलों पर बहस जारी रह सकती है, लेकिन इन्होंने एक बात जरूर की: यह संदेश दिया कि यह सरकार निर्णय लेने से नहीं घबराती।
2019 में एक बार फिर 303 सीटें। और 2024 में गठबंधन के साथ सत्ता में वापसी। तीन लगातार बार केंद्र में सत्ता यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दुर्लभ उपलब्धि है।
विस्तार जो चौंकाता है
आज भाजपा का भौगोलिक विस्तार देखकर राजनीतिक विश्लेषक भी चकित रह जाते हैं। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम पार्टी उन राज्यों में भी अपनी जड़ें जमा चुकी है जहाँ कभी उसका नाम तक नहीं जाना जाता था।
पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना, कर्नाटक यह विस्तार केवल चुनावी नहीं, संगठनात्मक है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की तैनाती, स्थानीय भाषाओं में संवाद, और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय नैरेटिव से जोड़ने की क्षमता यही भाजपा की असली ताकत है।
जो सवाल भी उठते हैं
किसी भी लोकतंत्र में जब एक दल इतना प्रभावशाली हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। और उठने भी चाहिए।
संघीय ढांचे पर केंद्र का बढ़ता दबाव, विपक्ष के लिए सिकुड़ती जगह, संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर चिंताएं ये बातें लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हैं। एकतरफा जीत लोकतंत्र की परीक्षा नहीं, उसकी शुरुआत होती है। असली परीक्षा यह है कि जीतने के बाद शक्ति का उपयोग कैसे होता है।
भाजपा के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है यह साबित करना कि उसका वर्चस्व केवल चुनावी नहीं, संस्थागत और नैतिक भी है।
50 की तरफ: अगली परीक्षा
जैसे-जैसे भाजपा अपने 50वें साल की तरफ बढ़ रही है, चुनौतियाँ भी बदल रही हैं। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी बदलाव ये वो मुद्दे हैं जिन पर अगली पीढ़ी का वोट टिका है।
जिस पार्टी ने 2 सीटों से 303 सीटों तक का सफर तय किया, उसकी असली विरासत अब चुनावी जीत से नहीं बनेगी। वह बनेगी इस सवाल के जवाब से क्या भाजपा की राजनीतिक ताकत आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाने में तब्दील हो पाती है?
46 साल की यह यात्रा असाधारण है। अगले 4 साल यह तय करेंगे कि यह विरासत कितनी गहरी और कितनी टिकाऊ है।
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई थी। पार्टी ने इस वर्ष अपनी स्थापना के 46 वर्ष पूरे किए।
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