महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसे लोग बहुत कम रहे हैं जो जितने ज़रूरी थे, उतने ही नाराज़गी भी पैदा करते थे, और उतने ही सख्ती से काम करवाते थे — जैसे अजित अनंतराव पवार। बुधवार सुबह जब यह खबर आई कि उनका चार्टर्ड विमान बारामती एयरपोर्ट के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें सवार सभी पाँच लोगों की मौत हो गई, तो लोगों को यकीन ही नहीं हुआ। दुख से पहले हैरानी फैल गई। मंत्रालय में फाइलें रुक गईं।
अजित पवार वह सख्सियत थे जिन्होनें सरकारों को संभाले रखा। जिन्होनें बगावतों को शांत कराया। जिन्होनें समझा कि असली ताकत कहाँ होती है। महाराष्ट्र ने अपना सबसे भरोसेमंद राजनीतिक मैकेनिक खो दिया है। और जिस इंजन को वह चलाते थे, वह अब लड़खड़ाने लगा है।
पिछले तीस सालों में महाराष्ट्र ने हर तरह की राजनीति देखी है — गठबंधन बने, टूटे, विचार बदले, लोग अलग हुए, फिर जुड़े। 2019 में कुर्सी बदलने का खेल हुआ और 2022 में आधी-अधूरी स्थिरता का दौर आया। इन सबके बीच अजित पवार हमेशा मौजूद रहे।
वह न नैतिक भाषण देने वाले नेता थे, न भीड़ को जोश में लाने वाले। वह एक ऐसे आदमी थे जो सिस्टम को चलाना जानते थे।
वह कभी मंचों पर खड़े होकर लोगों को बहाने वाले वक्ता नहीं बने। उन्होंने कभी विचारधारा की शुद्धता का दावा नहीं किया। उन्होंने काम दिखाया, या कम से कम ऐसा माहौल बनाया कि काम हो रहा है। और सूखे, कर्ज और गुटबाजी से जूझते राज्य में यह बात भाषणों से ज्यादा अहम थे।
अजित पवार ने जल्दी समझ लिया था कि महाराष्ट्र मंचों से नहीं चलता, वह सिस्टम से चलता है।
सहकारी संस्थाएँ, जिला बैंक, सिंचाई की फाइलें, अफसरों पर दबाव, आधी रात के फोन और चुपचाप दी गई गारंटी।
वह इसी भाषा में बात करते थे, और बहुत अच्छे से करते थे।
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को देवलाली प्रवरा में हुआ था। तब यह अहमदनगर जिला था, अब अहिल्यानगर है। वह अपने चाचा शरद पवार की छाया में बड़े हुए। लेकिन सत्ता के पास रहना आसान जिंदगी की गारंटी नहीं होता।
पिता की जल्दी मौत के बाद अजित ने कॉलेज छोड़ दिया। यह भावनाओं का नहीं, जरूरत का फैसला था। उसी ने उन्हें वैसा बनाया जैसा वह बने।
- वह ज्यादा सोच-विचार से चिढ़ने लगे
- आदर्शवाद पर भरोसा कम हुआ
- नतीजों पर ध्यान बढ़ा।
शरद पवार दिल्ली की राजनीति में बड़े रणनीतिकार बने। अजित पवार महाराष्ट्र में रहकर मशीन चलाने वाले आदमी बने।
पवार परिवार की जड़ें सहकारी आंदोलन में हैं:
- चीनी मिलें
- दूध संघ
- बैंक
- क्रेडिट सोसायटी।
अजित पवार को ये सब विरासत में नहीं मिला, उन्होंने इन्हें समझा। 1980 के दशक में वह एक चीनी मिल के बोर्ड में आए। फिर 16 साल तक पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष रहे।
पश्चिमी महाराष्ट्र में सहकारिता मतलब ताकत। कर्ज़ किसे मिलेगा, वही तय करता है राजनीति और अजित पवार यह बात अच्छे से समझते थे:
जिसके पास संसाधन होंगे, वोट उसी के पीछे जाएंगे।
- 991 में उन्होंने बारामती से उपचुनाव जीता और फिर कभी नहीं हारे
- सात बार विधायक बने
बारामती उनका किला बन गया। लेकिन उन्होंने इसे सिर्फ विरासत नहीं, अपनी प्रयोगशाला बनाया।
उनके समय में सब कुछ उनके हाथ में था — सड़कें, स्कूल, मिलें, अफसरों तक पहुँच। कुछ भी संयोग पर नहीं छोड़ा गया।
बारामती एक उदाहरण बन गया कि ताकत को एक जगह जमा करने से क्या किया जा सकता है, और यही बात विरोधियों को सबसे ज़्यादा खलती थी।
1999 से 2010 तक वह सिंचाई मंत्री रहे और उन्होंने कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू कराए।
- नहरें बढ़ीं
- बजट बढ़ा
- वादे भी बढ़े।
फिर आरोप लगे — सिंचाई घोटाला।
कुछ जांचों में उन्हें क्लीन चिट मिली। कुछ मामले चलते रहे। 2012 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन वह लौट आए।
यह वापसी दिखाती है कि महाराष्ट्र की राजनीति में ताकत कैसे काम करती है।
2013 में सूखे के समय अजित पवार का बयान “क्या मैं डैम में पेशाब करूँ?” बहुत विवादित हुआ। लेकिन इससे साफ था कि उन्हें दिखावे की राजनीति पसंद नहीं थी।
उनकी असली ताकत भाषण नहीं, फाइलें थीं। वह फोन जो आधी रात को आता था। वह काम जो चुपचाप हो जाता था।
वह महाराष्ट्र में छह बार उपमुख्यमंत्री तो रहे, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। यह अधूरी चाह उनके पूरे करियर में दिखाई देती है।
2019 की 80 घंटे की सरकार ने उन्हें मजाक बना दिया, लेकिन इससे उनकी चालाकी भी दिखी।
2023 41 विधायकों को अपनी तरफ करके उन्होंने एनसीपी तोड़ दी और भाजपा और शिंदे गुट के साथ सरकार बना ली। यह उनका अंदाज़ था – तेज, शातिर और बहतरीन रणनिति वाला।
आज उनकी मौत से एक बड़ा खालीपन पैदा हुआ है, और ऐसा कोई नहीं है जो उनकी जगह ले सके।
हो सकता है सरकार डगमगा जाय। गुटों में अनबन हो जाय। और शायद पश्चिमी महाराष्ट्र में फेर बदल।
अजित पवार कोई संत नहीं थे। लेकिन उन्होंने कभी ऐसा बनने का दिखावा भी नहीं किया।
महाराष्ट्र चलता रहा क्योंकि उनके जैसे लोग मशीन में तेल डालते रहे।
Subscribe Deshwale on YouTube


