भारत का किसान हमेशा से ‘अन्नदाता’ कहलाता आया है। लेकिन आज वही अन्नदाता अपनी ज़मीन, खेती और भविष्य को लेकर सबसे ज़्यादा परेशान है। किसान की समस्या अब सिर्फ़ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य), खेती में घाटा और शहर की तरफ़ मजबूरी में पलायन उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है।
एमएसपी: भरोसा या भ्रम?
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल की कीमतों में होने वाली भारी गिरावट से बचाना और उन्हें उनकी उपज का एक गारंटीड मूल्य प्रदान करना था, ताकि वे संकट में अपनी फसल को कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर न हों। साथ ही, इसका दूसरा प्रमुख उद्देश्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के लिए आवश्यक खाद्यान्न की सरकारी खरीद सुनिश्चित करना भी था। लेकिन ज़मीनी स्तर पर सच्चाई कुछ और ही है। एमएसपी हर फ़सल पर लागू नहीं होती, बल्कि ज़्यादातर गेहूं और चावल जैसी कुछ फ़सलों तक सीमित है। अगर बात छोटे किसानों की की जाए तो उनको एमएसपी का फ़ायदा शायद ही मिलता है।
बाज़ार में फसलों पर अक्सर दाम एमएसपी से नीचे गिर जाते हैं। इसी समस्या पर 2020–21 में किसान आंदोलन हुआ था, जिसमें लाखों किसानों ने दिल्ली की सीमा पर महीनों तक प्रदर्शन किया। उनकी एक ही माँग थी एमएसपी की कानूनी गारंटी। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि जब किसान एकजुट होते हैं, तो उनकी आवाज़ पूरे देश में गूंजती है।
खेती में घाटा और कर्ज़ का बोझ
आज खेती करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। बीज, खाद, डीज़ल और मशीन के दाम बढ़ने की वजह से खेती का खर्चा बहुत ज्यादा हो गया है। फिर भी, जब किसान अपनी फसल बाजार में बेचने निकलता है, तो उसको उसकी मेहनत का दाम नहीं मिल पाता। नतीजा यह होता है कि किसान कर्ज़ में डूब जाता है। इसी बोझ की वजह से अक्सर हमें सुनने को मिलता है कि किसान ने मजबूर होकर आत्महत्या कर ली। यह सिर्फ़ एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश का संकट है।
मौसम की मार
खेती पर सबसे बड़ा असर मौसम का पड़ता है। कभी ज़्यादा बारिश, कभी सूखा, कभी अनियमित मानसून और कभी बाढ़ यह सब किसानों की फ़सल को तबाह कर देते हैं। इसी कारण बदलते जलवायु के साथ उनके लिए अपने परिवारों का गुज़ारा और मुश्किल होता जा रहा है।
बड़े व्यापारियों से हो रही किसानों की समस्या
इतनी मेहनत से जब किसान अपनी फ़सल उगाता है और उसे बेचने मंडी में जाता है, तो अक्सर मंडी के बड़े व्यापारी किसानों के हक़ के पैसे खा लेते हैं। जो भी बड़े व्यापारी होते हैं, वो किसानों से सस्ते दाम पर फ़सल ख़रीदते हैं और उसे महंगे दामों पर बेचते हैं। और इन सबके बीच जिसने असली मेहनत की, वही किसान पिस जाता है और सस्ते दाम पर अपनी फ़सल बेचने पर मजबूर हो जाता है।
शहर की ओर पलायन
जब खेती से गुज़ारा नहीं होता, तो किसानों और उनके बच्चों को शहर पलायन करना पड़ता है। शहर जाकर उन्हें मज़दूरी करनी पड़ती है। इन सबकी वजह से गाँव खाली होते जा रहे हैं और खेती की परंपरा टूट रही है। यह सिर्फ़ गाँव की पहचान ख़त्म करने वाली बात नहीं है, बल्कि भारत के कृषि क्षेत्र को भी कमज़ोर कर रही है।
किसान आंदोलन का सबक
किसान आंदोलन ने यह साबित किया कि अगर किसान एकजुट हो जाएँ, तो उनकी आवाज़ को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन आंदोलन के बाद भी एमएसपी और खेती के सुधारों पर अभी भी सवाल बाकि हैं। जब तक सरकार किसान की बात को ध्यान से सुनकर व्यावहारिक और ज़मीनी नीतियाँ नहीं बनाती, तब तक किसान का भरोसा वापस नहीं आ पाएगा।
समाधान की ओर
इन बिगड़ी हुई किसान की हालत सुधारने के लिए सरकार को जागरूक होना पड़ेगा। किसानों की हालत सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि एमएसपी को कानूनी गारंटी दी जाए, ताकि किसानों को भरोसा हो जाए कि उनकी फ़सल सही दामों में बिकेगी। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण यह कि कृषि लोन और इंश्योरेंस किसानों के लिए आसान बनाए जाएँ, ताकि छोटे से छोटा किसान उस योजना का लाभ पा सके। आजकल की आधुनिक खेती की तकनीक हर गाँव के किसान तक पहुँचाई जाए और गाँव में किसानों के लिए नए रोज़गार की तकनीक पहुँचाई जाए, जिससे किसान शहर की ओर पलायन करना बंद करें और अपनी खेती अच्छे से संभाल पाएँ।
किसान सिर्फ अनाज उगाने वाला नही है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अगर आज उनकी समस्या को आँख मूंद कर नकार दिया गया, तो कल पूरा देश इसका नुक़सान उठाएगा। समस्या का समाधान सिर्फ़ तभी होगा जब हम अन्नदाता को उनका असली सम्मान और उनके हक़ का दाम देंगे।


