आज मैं एक ऐसी फ़िल्म के बारे में बात करने वाला हूं, जिसका बनना बेहद ज़रूरी था और इसके लिए मैं धन्यवाद देना चाहूंगा डायरेक्टर सीए अरविंद भोसले को, जिन्होंने एक ऐसे मुद्दे को छुआ है जिसे हम हमेशा नज़रअंदाज़ करते आए हैं।
मैं बात कर रहा हूं हाल ही में रिलीज़ हुई मराठी फ़िल्म “अवकारीका – द बिगेस्ट एनवायरनमेंटल थ्रेट” की। अगर आप इसे समझदारी से देखें, तो ये फ़िल्म किसी भाषा की मोहताज नहीं है। शायद ये फ़िल्म बिना डायलॉग्स के भी होती, तो इसके इमोशन्स ही इसे बेहतरीन बना देते।
सबसे पहले जान लेते हैं कि ‘अवकारीका’ का मतलब क्या है? तो भाई ‘अवकारीका’ एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘कूड़ेदान।’ इस शब्द का सीधा संबंध होता है उन सफाईकर्मियों से, जो दिन-रात बिना रुके हमारे लिए शहर को साफ़ रखते हैं। ये फिल्म उन्हीं की संघर्षभरी ज़िंदगी, हमारा पर्यावरण, और हमारी सोच को आइना दिखाती है।
ये फिल्म आधारित है चार अलग-अलग पहलुओं पर:
- हमारे स्वच्छता दूत: जो ना त्योहार देखते हैं, ना बारिश, ना गर्मी, बस अपने काम में लगे रहते हैं।
- एक बाप और बेटी का प्यार: प्यार, देखभाल और एक छोटी-सी उम्मीद की डोर जो दिल को छू जाती है।
- हमारा पर्यावरण: जिसे हम रोज़ नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।
- हमारी तथाकथित सोसाइटी: जो सफाईकर्मी को बस एक कामगार समझती है, इंसान नहीं।
कहानी शुरू होती है एक वॉइसओवर से जिसमें धीरे-धीरे सभी किरदारों का परिचय दिया जाता है। इन्हीं किरदारों में प्रमुख हैं फ़िल्म का केंद्रीय चेहरा… ‘विराट माडके,’ जिन्होंने निभाया है ‘सत्या’ का किरदार।
सत्या एक सफाईकर्मी है, जो अपने काम के प्रति बेहद मेहनती और ईमानदार है। उसकी एक छोटी-सी फैमिली है… बीवी और दो बेटियाँ। लेकिन उसकी बीवी की मौत कैंसर के कारण हो चुकी है। अब घर में सिर्फ़ सत्या और उसकी दो बेटियाँ हैं।
इनमें से बड़ी बेटी का नाम है ‘दीपू,’ जो अपने पापा से बेहद प्यार करती है और बेहद समझदार है। सत्या और दीपू के बीच दिखाया गया इमोशनल बॉन्ड आपको भी अंदर से छू जाएगा।
फ़िल्म में एक बेहद इमोशनल सीन दिखाया गया है, जिसमें दीपू, सुबह के 3 बजे उठकर, अपने पिता के साथ सड़कों की सफाई करने उतर आती है। ये सीन बाप-बेटी के रिश्ते की गहराई और इंसानियत को दर्शाता है।
सबसे अहम बात… अगर आप सोच रहे हैं कि मैं आगे चलकर फ़िल्म की पूरी कहानी बताने वाला हूं, तो नहीं भाई… मैं चाहता हूं कि आप ख़ुद थिएटर जाकर इस फ़िल्म को देखें और इस अनमोल अनुभव का हिस्सा बनें।
फ़िल्म सबसे पहले हमें उन गुमनाम नायकों की याद दिलाती है जो हमारे शहर, हमारी गली-मोहल्लों के सफाईकर्मी हैं, जिन्हें शायद कभी कोई सराहना नहीं मिलती।
उनके लिए त्यौहार, मौसम, बीमारी कुछ मायने नहीं रखता।
उन्हें बस अपना काम करना होता है… और यही पहलू इस फ़िल्म में बहुत ही ख़ूबसूरती से दिखाया गया है।
हज़ारों सफाईकर्मियों ने सीवर की सफाई के दौरान अपनी जान गंवाई है… और ये मैं नहीं, सरकारी रिपोर्ट्स कहती हैं। लेकिन उनकी मेहनत, संघर्ष, इंसानियत किसी को नहीं दिखती। मेरी और आपकी तरह वो भी इंसान हैं, उनके भी घर-परिवार हैं, वो भी सुख-दुख से गुजरते हैं।
सीए अरविंद भोसले ने इसी पहलू को फ़िल्म के माध्यम से बहुत सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है।
फ़िल्म में एक और गहरी बात कही गई है… प्रकृति के प्रति हमारी लापरवाही।
हम इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे। हम प्रकृति के साथ जो कर रहे हैं, वो न सिर्फ़ उसे, बल्कि हमें भी नष्ट कर रहा है।
फ़िल्म इसी सच को बिना प्रवचन दिए, बेहद संवेदनशीलता से दिखाती है।
हमारा समाज सफाईकर्मियों को बस एक कामवाला मानता है।
हम सोचते हैं कि ये तो इनका काम है। ये नहीं करेंगे तो कौन करेगा।
लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि जिस तरह वो ज़िम्मेदारी से अपना काम करते हैं, उसी तरह हमें भी सभ्यता से व्यवहार करना चाहिए। उन्हें सम्मान देना चाहिए, ना कि उन्हे गिरी हुई नज़रों से देखना चाहिए।
सीए अरविंद भोसले की यह पहली निर्देशित फिल्म है… लेकिन उनकी कमांड, विज़न और संवेदनशीलता किसी अनुभवी निर्देशक से कम नहीं। उन्होंने साफ़ दिखा दिया कि सिनेमा सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का ज़रिया भी हो सकता है।
फिल्म की कहानी कमाल की है, क्योंकि फिल्म खुद अरविंद भोसले ने लिखि है। फिल्म कसी हुई और गहराई से भरी और हर दृश्य उद्देश्यपूर्ण है। कोई भी दृश्य बेवजह इस्तेमाल नहीं किया गया है।
सिनेमैटोग्राफी जितनी सादा है, उतनी ही सुंदर और प्रभावशाली है।
अगर एक्टिंग कि बात करें तो हर कलाकार अपनी भूमिका में डूबा हुआ था। खासकर वीराट माडके और दीपू का किरदार निभाने वाली ‘वैभवी कुटे’ ने दिल छू लेने वाली परफॉर्मेंस दी है।
बैकग्राउंड स्कोर ठीक-ठाक है, और गाने सिचुएशन के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं।
फ़िल्म का आखिरी गाना जो कैलाश खेर ने गाया है… वो पूरी फ़िल्म का सार है।
और आप लोग तो जानते ही हो… जब कैलाश गाते हैं, तो वाकई में दिल हिल जाता है।
सुनीधी चौहान ने भी इस फ़िल्म के एक गाने को अपनी आवाज़ दी है… जो फ़िल्म की रेंज को और ऊंचा करता है।
इस फ़िल्म को भारत टिळेकर और अरुण जाधव ने प्रोड्यूस किया है। उनके इस प्रयास के लिए भी सराहना बनती है कि उन्होंने ऐसा संवेदनशील विषय प्रोड्यूस किया।
अवकारीका जैसी फ़िल्में रोज़ नहीं बनतीं। इसमें ना कोई मसालेदार लव स्टोरी है, ना हाई वोल्टेज एक्शन, लेकिन फिर भी ये फ़िल्म आपको झकझोर देती है।
क्योंकि ये सच दिखाती है, वो भी बिना घबराए, बिना डरे।
सीए अरविंद भोसले और उनकी टीम ने साबित कर दिया है कि अगर इरादा नेक हो और सोच साफ़, तो पहली फ़िल्म भी असरदार बन सकती है।
मेरी तरफ़ से एक सलाह है… भाई, आप लोग थिएटर में जाकर ये फ़िल्म ज़रूर देखो। नहीं तो एक बेहतरीन फिल्म मिस कर दोगे।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)
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