भारत, अपनी विशाल सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता के साथ, एक अद्वितीय भाषाई परिदृश्य प्रस्तुत करता है। इस जटिल भाषाई जाल को समझने और उसका सर्वप्रथम व्यवस्थित अध्ययन करने का श्रेय जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन को जाता है। एक ब्रिटिश प्रशासक और भाषाविद् के रूप में, ग्रियर्सन ने “भारत का भाषाई सर्वेक्षण” (Linguistic Survey of India – LSI) नामक एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना का नेतृत्व किया था। यह सर्वेक्षण, जो 1898 से 1928 तक चला था और मूल रूप से 11 खंडों व 19 भागों में प्रकाशित हुआ था, न केवल भारतीय भाषाओं और बोलियों का पहला व्यापक दस्तावेज़ था, बल्कि इसने पहली बार दक्षिण एशिया की भाषाई विविधता की गहरी समझ भी प्रदान की थी। आधुनिक पुनर्मुद्रण, जैसे कि कल्पज़ पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित 11 खंडों में 20 भागों वाला संस्करण (लगभग 9823 पृष्ठ), आज भी भाषाई अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण है। अतः ग्रियर्सन के सर्वेक्षण की प्रक्रिया, निष्कर्षों और इसके वर्तमान भाषाई संघर्षों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करना बहुत महत्त्वपूर्ण है।
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन: एक समर्पित भाषाविद्
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का जन्म 7 जनवरी, 1851 को डबलिन, आयरलैंड में हुआ था। उनकी शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन और हाले विश्वविद्यालय, जर्मनी में हुई थी। वहीं उनमें भाषाओं के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई थी। 1873 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) में शामिल होने के बाद उन्होंने ब्रिटिश भारत के विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्य किया। बिहार में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने स्थानीय बोलियों का गहन अध्ययन किया। इससे उनकी भाषाई विद्वता और भारतीय भाषाओं के प्रति समर्पण का पता चलता है। उनकी भाषाई विशेषज्ञता और प्रशासनिक अनुभव ने उन्हें भारत के भाषाई सर्वेक्षण जैसे विशाल परियोजना का नेतृत्व करने के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त बनाया।
भारत के भाषाई सर्वेक्षण की प्रक्रिया:
ग्रियर्सन ने भारत के भाषाई सर्वेक्षण को एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से संचालित किया। इस जटिल कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित चरणों का पालन किया था:
योजना और संगठन: सर्वेक्षण की शुरुआत व्यापक योजना और संगठन के साथ हुई। ग्रियर्सन ने पूरे ब्रिटिश भारत को विभिन्न भाषाई क्षेत्रों में विभाजित किया और प्रत्येक क्षेत्र के लिए सर्वेक्षणकर्ताओं की नियुक्ति की। इन सर्वेक्षणकर्ताओं में प्रशिक्षित भाषाविद् और स्थानीय विद्वान शामिल थे, जो स्थानीय भाषाओं और बोलियों से परिचित थे।
प्रश्नावली का निर्माण: भाषाई आँकड़े एकत्र करने के लिए विस्तृत प्रश्नावली तैयार की गई थी। इन प्रश्नपत्रों में व्याकरण, शब्दावली, उच्चारण, लोकगीत, कहानियाँ और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से संबंधित प्रश्न शामिल किये गए थे। प्रश्नावली को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया था कि यह भाषाओं और बोलियों के सूक्ष्म अंतरों को भी पकड़ सके।
क्षेत्रीय दौरा और आँकड़ा संग्रह: सर्वेक्षणकर्ताओं की टीमें देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में गईं। उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत की, उनकी भाषा और बोली में जानकारी रिकॉर्ड की और प्रश्नावली भरी। इस प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों के साथ घनिष्ठ संपर्क स्थापित करना और उनकी भाषाई परंपराओं को समझना काफी महत्त्वपूर्ण था। ग्रियर्सन ने स्वयं भी कई क्षेत्रों का दौरा किया और प्रत्यक्ष रूप से आँकड़े एकत्र किये।
वर्गीकरण और विश्लेषण: फिर एकत्र किये गए भाषाई आँकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया। भाषाओं और बोलियों को उनकी ध्वन्यात्मक, व्याकरणिक और शाब्दिक समानता व अंतर के आधार पर विभिन्न भाषा-परिवारों और उप-परिवारों में वर्गीकृत किया गया। तुलनात्मक भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए, इन सभी भाषाओं के बीच ऐतिहासिक संबंध और उनके विकास क्रम को समझने का प्रयास किया गया।
दस्तावेजीकरण और प्रकाशन: और अंत में विश्लेषण के निष्कर्षों को विस्तृत रिपोर्टों के रूप में दर्ज किया गया। प्रत्येक भाषा और बोली के लिए अलग-अलग खंड तैयार किये गए, जिनमें उसका भौगोलिक वितरण, बोलने वालों की संख्या, व्याकरणिक संरचना, शब्दावली, ऐतिहासिक विकास और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व का विवरण दिया गया था। इन रिपोर्टों को “भारत का भाषाई सर्वेक्षण” नामक एक विशाल शृंखला में प्रकाशित किया गया। यह पहले संस्करण में 11 खंडों और 19 भागों में प्रकाशित हुई थी। आधुनिक पुनर्मुद्रण, जैसे कि कल्पज़ पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित संस्करण, 11 खंडों व 20 भागों में उपलब्ध है और इसमें लगभग 9823 पृष्ठ हैं। ग्रियर्सन ने स्वयं इस शृंखला के कई खंडों का लेखन और संपादन किया था।
सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष और भाषाई विविधता:
ग्रियर्सन के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप, भारत के भाषाई सर्वेक्षण ने निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किये:
अभूतपूर्व भाषाई विविधता—सर्वेक्षण ने भारत में सैकड़ों विभिन्न भाषाओं और बोलियों के अस्तित्व को प्रमाणित किया, जो भाषाई विविधता के मामले में इसे दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक बनाता है।
चार प्रमुख भाषा-परिवार—सर्वेक्षण ने भारत की भाषाओं को मुख्य रूप से चार भाषा परिवारों में वर्गीकृत किया – इंडो-आर्यन (उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भारत), द्रविड़ (दक्षिण भारत), ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मध्य और पूर्वी भारत के जनजातीय क्षेत्र), और तिब्बती-बर्मी (हिमालयी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी भारत)।
भाषाई भूगोल—सर्वेक्षण ने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के सटीक भौगोलिक वितरण को दर्शाया। इसने भाषाई सीमाओं और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भाषाई संक्रमण की प्रक्रियाओं को भी स्पष्ट किया।
सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध—सर्वेक्षण ने भाषाओं और उनके बोलने वाले समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों के बीच गहरे संबंधों को उजागर किया।
भाषाई विकास—सर्वेक्षण के आँकड़ों ने भाषाओं के ऐतिहासिक विकास और उनमें हुए परिवर्तनों को समझने में मदद की। इसके साथ ही इसने विभिन्न भाषाओं के बीच आदान-प्रदान और प्रभाव की प्रक्रियाओं को भी दर्शाया।
वर्तमान भाषाई संघर्षों से संबंध:
स्वतंत्रता के बाद, भारत ने भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया, जो ग्रियर्सन के सर्वेक्षण द्वारा प्रदान की गई भाषाई मानचित्रों और जानकारी पर आधारित था। हालांकि, भाषाई विविधता को समायोजित करने की प्रक्रिया में कई भाषाई संघर्ष भी उत्पन्न हुए:
राजभाषा का विवाद—हिंदी को राजभाषा बनाने के संवैधानिक प्रावधान का गैर-हिंदी भाषी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में, कड़ा विरोध हुआ। उन्हें डर था कि इससे उनकी अपनी भाषाओं को नुकसान होगा और केंद्र सरकार में उनके प्रतिनिधित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, जो आज भी विभिन्न रूपों में जारी है।
त्रिभाषा सूत्र का विरोध—राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तावित त्रिभाषा सूत्र, जिसका उद्देश्य भाषाई सद्भाव को बढ़ावा देना था, को भी कुछ राज्यों में प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु ने इसे हिंदी को थोपने का एक प्रयास मानते हुए अस्वीकार कर दिया और द्विभाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) पर कायम रहा।
भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार—विभिन्न राज्यों में भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा में शिक्षा और सरकारी सेवाओं तक समान पहुंच प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। भाषाई भेदभाव के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
सीमा विवाद—भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद, कुछ क्षेत्रों में भाषाई सीमाओं को लेकर विवाद बने हुए हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच का सीमा विवाद, जिसमें बेलगावी जैसे मराठी भाषी क्षेत्रों पर कर्नाटक का दावा है, एक दीर्घकालिक समस्या है।
भाषा और राजनीतिक पहचान—भाषा अक्सर क्षेत्रीय और जातीय पहचान का एक शक्तिशाली प्रतीक होती है। राजनीतिक दल कई बार भाषाई भावनाओं का उपयोग करके लोगों को संगठित करते हैं, जिससे भाषाई संघर्ष और तीव्र हो सकते हैं।
अब समस्याएँ तो अपनी जगह हैं, वे जब समाप्त होंगी तब होंगी। लेकिन इससे ग्रियर्सन के योगदान का महत्त्व कम नहीं हो जाता। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का “भारत का भाषाई सर्वेक्षण”, जो मूल रूप से 11 खंडों में 19 भागों में प्रकाशित हुआ और आधुनिक समय में कल्पज़ पब्लिकेशंस और ज्ञान बुक्स जैसे प्रकाशकों द्वारा पुनर्मुद्रित किया जा रहा है, एक अद्वितीय और अमूल्य योगदान है। उन्होंने अथक परिश्रम और समर्पण के साथ एक ऐसे समय में भारत की भाषाई विविधता का विस्तृत और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जब संसाधन और तकनीकें सीमित थीं। उनका कार्य न केवल भाषाई अध्ययन के लिए एक आधारशिला बना, बल्कि इसने भारत की जटिल भाषाई वास्तविकता को समझने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। लगभग 9823 पृष्ठों वाले इस विशाल सर्वेक्षण का महत्त्व आज भी बना हुआ है। कल्पज़ पब्लिकेशंस द्वारा उपलब्ध संपूर्ण सेट लगभग ₹12,949.00 में खरीदा जा सकता है।
ग्रियर्सन का सर्वेक्षण भाषाई मानचित्रण, भाषा नीति निर्माण और अल्पसंख्यक भाषाओं के संरक्षण के लिए आज भी एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। उनकी विद्वता, संगठन कौशल और भारतीय भाषाओं के प्रति उनका गहरा सम्मान इस विशाल परियोजना के हर पहलू में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह सर्वेक्षण हमें याद दिलाता है कि भाषाएँ हमारी संस्कृति, इतिहास और पहचान का अभिन्न अंग हैं, और उनकी विविधता को समझना तथा सम्मान करना एक बहुभाषी राष्ट्र के रूप में भारत की एकता और समृद्धि के लिए आवश्यक है। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का योगदान भावी पीढ़ियों के लिए भाषाई अध्ययन और भारत की सांस्कृतिक विरासत की समझ के लिए एक प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
ग्रियर्सन का यह भाषाई सर्वेक्षण भारत की भाषाई विविधता का एक ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। इसने न केवल भाषाओं की पहचान की और उनका वर्गीकरण किया, बल्कि भाषाई पहचान और क्षेत्रीयता की भावना को भी मजबूत किया। हालांकि इसके ही परिणामस्वरूप भारत में स्वतंत्रता के बाद भाषाई संघर्ष हुए। आज भी भाषा नीति, भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार और भाषाई सीमाओं से जुड़े मुद्दे भारत की सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करते हैं। लेकिन यह विशेष रूप से समझने की जरूरत है कि ग्रियर्सन के सर्वेक्षण के निष्कर्षों को समझकर और भाषाई विविधता के महत्त्व को स्वीकार करके ही भारत एक समावेशी और सामंजस्यपूर्ण भविष्य की ओर बढ़ सकता है।


