बिहार में सरकारी नौकरी अब सिर्फ रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि इज़्जत और पहचान का प्रतीक बन चुकी है। यहां हर गली, हर गांव में युवाओं की एक ही चाहत होती है किसी तरह एक सरकारी नौकरी लग जाए। क्योंकि बिहार के समाज में नौकरी सिर्फ आमदनी नहीं देती, बल्कि सम्मान और स्थिरता भी देती है। यही कारण है कि लाखों युवा सालों तक परीक्षा की तैयारी करते रहते हैं, कई बार असफल होने पर भी उम्मीद नहीं छोड़ते।
बिहार में सरकारी नौकरी पाने का जुनून इतना गहरा है कि निजी नौकरी करने वालों को भी कई बार समाज में कमतर समझा जाता है। परिवार और रिश्तेदारों की नजर में ‘सरकारी नौकरी वाला’ व्यक्ति इज़्जतदार माना जाता है, जबकि ‘प्राइवेट नौकरी वाला’ बस गुज़ारा करने वाला। इस मानसिकता का बोझ युवाओं के मन पर गहराई से बैठ चुका है। 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 15 से 29 वर्ष की उम्र के बीच बेरोज़गारी दर लगभग 10 प्रतिशत रही, जबकि स्नातक युवाओं के बीच यह आंकड़ा करीब 34 प्रतिशत तक पहुंच गया। ये आंकड़े दिखाते हैं कि नौकरियों की कमी सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता भी बन चुकी है।
पटना का मुशल्लहपुर हाट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां हजारों छात्र-छात्राएं छोटे-छोटे कमरों में रहकर सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। कोचिंग फीस, किराया, किताबें और सालों की मेहनत सब मिलाकर यह एक लंबी, महंगी और थकाने वाली लड़ाई है। लाखों में आवेदन करने वालों में कुछ ही को सफलता मिलती है। 70वीं बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) परीक्षा में करीब 4.8 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया था, जिनमें से लगभग 3.25 लाख ने परीक्षा दी। यह दिखाता है कि कितनी सीमित नौकरियां हैं और कितनी बड़ी भीड़ उनका इंतजार कर रही है।
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार की बेरोज़गारी दर कुछ सालों में 8 प्रतिशत से घटकर लगभग 3 प्रतिशत तक आई है, लेकिन यह राहत असली नहीं है। ज़्यादातर लोग अस्थायी या अधूरे कामों में लगे हैं, जिनमें न स्थिरता है, न सुरक्षा। इसे ‘छिपी बेरोज़गारी’ कहा जाता है यानी काम तो है, पर करियर नहीं। यही कारण है कि सरकारी नौकरी अब भी सबसे भरोसेमंद विकल्प मानी जाती है।
बिहार में निजी नौकरियों के प्रति भी समाज में सम्मान की कमी है। बहुत से युवा मानते हैं कि प्राइवेट नौकरी में न तो सुरक्षा है, न इज़्जत। यह सोच उन्हें दूसरे अवसरों से दूर रखती है। जबकि आज के दौर में उद्यमिता, स्टार्टअप्स और तकनीकी नौकरियां भी अच्छे विकल्प हो सकते हैं। लेकिन इन रास्तों को अपनाने में सामाजिक नजरिया बड़ी बाधा बनता है।
लंबे इंतजार, प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी और बार-बार रद्द होने वाले रिज़ल्ट्स से युवाओं में मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है। कई छात्र सालों की तैयारी के बाद भी निराश होकर घर लौट जाते हैं। कुछ आंदोलन में उतरते हैं, तो कुछ चुपचाप अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं।
अब सवाल यह है कि इस स्थिति से बाहर कैसे निकला जाए। सबसे पहले, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ानी होगी ताकि युवा निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में आगे बढ़ सकें। सरकारी भर्तियों को पारदर्शी और तेज़ बनाना होगा ताकि युवाओं को इंतजार की मार न झेलनी पड़े। सबसे अहम बात यह है कि समाज को ‘इज़्जत’ को सिर्फ सरकारी नौकरी से जोड़ना बंद करना होगा।
बिहार के युवाओं को सिर्फ नौकरी नहीं चाहिए, उन्हें सम्मान चाहिए चाहे वह किसी भी काम से मिले। जब तक समाज इज़्जत को काम से नहीं, बल्कि उसके स्वरूप से जोड़ेगा, तब तक ‘नौकरी नहीं, तो इज़्जत नहीं’ जैसी सच्चाई बनी रहेगी। अब वक्त है इस सोच को बदलने का ताकि हर मेहनतकश युवा अपनी मेहनत पर गर्व कर सके, चाहे वह सरकारी दफ्तर में हो या निजी कंपनी में।
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