अगर मैं कहूँ की हम अपनी आस्था मंदिर-मस्जिद में ढूँढने या निभाने की जगह यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेस्बुक पर निभा रहे हैं, तो शायद ऐसा कहना गलत न हो।
जरा एक बार अपनी आंखे बंद करिए और इंस्टाग्राम या फेस्बुक की उस पोस्ट को याद कीजिए जिसमें लिखा था… ‘हनुमान जी के इस फोटो को इग्नोर मत करना, 24 घंटे में अच्छी खबर मिलेगी।’ या फिर ‘जो अल्लाह के नाम से प्यार करता है वो लाइक करो, एक अच्छी खबर मिलेगी।’
देखा है न? हाँ तो बस मेरा सवाल उन्ही लोगों से है जो आज के सोशल मीडिया में इतना डूब चुके हैं की सही और गलत की समझ ही नहीं है। भाई अच्छी खबर या कुछ अच्छा तब होगा जब तुम हनुमान जी की पूजा करोगे या फिर मस्जिद में जाके नमाज़ पढ़ोगे।
पूजा की शक्ल बदल गई है
अच्छा, अपने फोन की स्क्रीन पर एक बार नजर डालिए। जरा सोचिए… आप सबसे ज़्यादा किसे किसे देख रहे हैं? किसे सुन रहे हैं? कोई अभिनेता… कोई इंस्टा बाबा… या वो क्रिएटर जो कहता है… ‘इस वीडियो को लाइक करो, खुशखबरी मिलेगी।’ क्यों सही कहा न?
हमारी जड़ें जितनी प्राचीन हैं, उतना ही हम इतना मॉडर्न हो चुके हैं की मोबाईल पे ही दर्शन कर लेते हैं। हनुमान जी की इंस्टा रील को डबल टैप करना, या किसी यूट्यूब वीडियो को ‘खुशखबरी के लिए शेयर’ करना भी भक्ति का हिस्सा बन गया है।
है न मज़े की बात?
भगवान, सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर… सब एक ही स्क्रीन पर जगह पा चुके हैं। मंच बदल गया है, लेकिन इंसान का जुड़ाव, उम्मीद और आस्था का जज़्बा अब भी वैसा ही है… अटूट।
पहले मंदिर जोड़ते थे, अब स्क्रीन
एक समय था जब पूजा का मतलब मंदिर की घंटी और सामूहिक आरती हुआ करता था। गाँव के लोग मिलकर दीप जलाते, भजन गाते और प्रसाद बांटते थे। यह सिर्फ़ धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि सामाजिक जुड़ाव का तरीका था।
भगवान की कहानियाँ लोगों को मुश्किल वक्त में हिम्मत देती थीं। पूजा घर में होती थी, पर असर पूरे जीवन में दिखता था।
भक्ति तब निजी नहीं, साझा भावना थी।
हम किसे फॉलो कर रहे हैं?
ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालिए और बताइए, आज की पीढ़ी को मंत्र ज़्यादा याद हैं या किसी अभिनेता के डायलॉग? आलिया भट्ट की एक इंस्टाग्राम स्टोरी प्रोडक्ट्स को आउट ऑफ स्टॉक कर देती है। विराट कोहली का एक छक्का लाखों को दीवाना बना देता है।
यह सिर्फ़ फैन होना नहीं है। यह है एक किस्म की बेवजह की भक्ति है। हम अपना समय, पैसा, और भावना सब कुछ इन सितारों के लिए दे रहे हैं की नहीं?
सोशल मीडिया: नया दरबार
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक अब नए दरबार बनते जा रहे हैं। यहाँ भजन की क्लिप, कुरान की आयतें, या कृष्ण जी की छवियाँ आती हैं… साथ में एक प्यारी सी लाइन… ‘लाइक करें, शेयर करें, सब्सक्राइब करें…आशीर्वाद मिलेगा।’
अरे… भाई आशीर्वाद भक्ति-पूजा-अर्चना करने से मिलेगा या लाइक, शेयर, सब्सक्राइब करने से?
यह डिजिटल आस्था है। एक तरफ श्रद्धा, दूसरी ओर एल्गोरिदम। एक क्लिक से लोग न केवल पोस्ट को सपोर्ट करते हैं, बल्कि खुद को भगवान के करीब भी महसूस करते हैं। क्या आपकी नज़रों में ये सही है?
इस रफ्तार भरी रील की दुनिया में भक्ति की गहराई खोती जाती रही है।
यह बदलाव क्यों आया?
कभी खुद से सवाल कीजिए और जानने की कोशिश कीजिए, की क्यों आज मंदिर की घंटी से ज़्यादा नोटिफिकेशन की टन-टन सुनाई देती है?
सेलिब्रिटी और क्रिएटर हर वक्त हमारे फोन में मौजूद हैं। वे दिखते हैं, बोलते हैं, लाइव आते हैं। यार ये इंसान हीं तो हैं… आपकी और मेरी तरह। फिर इतना शोशा क्यों? आज हम खाना खाते समय भगवान का नाम लेना भूल गए हैं। अब रोटी का एक टुकड़ा तोड़ने से पहले हम अपने मोबाईल में रील सेट करते हैं या तारक मेहता का उल्टा चश्मा लगाते हैं, उसके बाद ही हमारे गले से रोटी उतरती है।
जब परंपरा और ट्रेंड साथ चलते हैं
पता है भारत में सबसे दिलचस्प बात क्या है? यहां परंपरा पीछे और ट्रेंड आगे चलते हैं।
दीवाली पर मंदिर तो भरे होते हैं, लेकिन हम वो पूजा का भाव नहीं दे पाते, हर समय हमारे हाथों में फोन, दिमाग में हर समय किसी फनी रील का विजुअल। अक्षय कुमार को किसी फिल्म में भगवान का रोल करते देख, भगवान की छवि। भाई ये तो सरासर गलत है। लोग अभिनेता और देवता के बीच की रेखा भूल रहे हैं।
भावना ही पूजा की जड़ है
देखो, आज हमें अपनी नई पीढ़ी को इस बात से अवगत कराने की ज़रूरत है की चाहे बेशक ट्रेंड के साथ जिओ, अभिनेताओं को फिल्मों में भगवान का रोल करते देखो, लेकिन केंद्र हमेशा हमारी संस्कृति, भगवान और भक्ति ही रहेगी। हम चाहें कितने भी मॉडर्न हो जाएं लेकिन हमारी संस्कृति को हमेशा ऊपर ही रखें।
‘लाइक करो, वरदान मिलेगा,’ इस लाइन से थोड़ा दूर ही रहें। यह लाइन दिल को छू जरुर सकती है लेकिन इससे वरदान मिलेगा…? भूल जो भाई। अपनी आस्था ईश्वर में रखो न की ये 15-20 सेकंड की रील में। विश्वासी बनो अंधविश्वासी नहीं।
नहीं तो रील को लाइक और शेयर करके इंतजार में ही रह जाओगे की… कुछ अच्छा होने वाला है।
हमें इसी समय संभलने की जरुरत है
आस्था और तकनीक को हाथ मिलाने दो, लेकिन इसे अपने ऊपर हावी मत होने दो। नहीं तो जो आज आप खुद हैं, आने वाली पीड़ी आपसे 2 कदम आगे होगी।
आज आप मोबाईल पे दर्शन करोगे तो आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का है। तो सोच लीजिए की AI युग में क्या-क्या देखने को मिल सकता है… बाकी आप समझदार हैं।
भारत, जिसकी आत्मा सदियों से आस्था में रची-बसी है, उस आस्था को, उस परंपरा को ज़िंदा रखना है।
आखिरी सवाल… आपके लिए
एक बार अपने सोशल मीडिया फीड को फिर से देखना…
आप किसे, कैसे और किस भाव से पूज रहे हैं? क्या ये वो डर तो नहीं जिसे आपने रील में देखा था?
क्या आप सच में भगवान से जुड़ रहे हैं? या फिर कोई स्टार, या कोई वीडियो क्रिएटर जिसकी पोस्ट से आप घिरे हुए हो?
हम किसकी और किस भाव से पूजा कर रहे हैं, यह तय करता है कि हम कौन हैं। हमारी सोच, हमारी कहानियाँ, हमारी पहचान इसी पर आधारित है।
तो अगली बार जब कोई पोस्ट देखो… ‘खुशखबरी चाहिए? शेयर करो…’ तो एक पल रुकना, और खुद से पूछना…
कौन हैं ये लोग? क्या इनके बोलने से खुशखबरी मिलेगी?
ऐसी पोस्ट, ऐसे सितारों को इग्नोर कीजिए… क्यूंकी हमारी आस्था कभी भी डिजिटल नहीं हो सकती।
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