ईद-ए-मिलाद, जिसे बारावफ़ात भी कहा जाता है, मुसलमानों का एक अहम त्योहार है। यह दिन पैग़म्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमकी पैदाइश की याद और उनकी तालीमात को याद करने का प्रतीक है।
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी, जिसे मवलीद-उन-नबी या हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के यौम-ए-विलादत (जन्मदिन) के तौर पर भी जाना जाता है, इस्लाम का एक अहम तहवार (त्योहार) है। यह इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने, रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाया जाता है।यह आज 5 सितंबर को मनाया जा रहा है। यह चांद दिखने पर मुनहसिर (निर्भर) करता है। यह दिन मुसलमानों के लिए खुशी, रूहानियत (आध्यात्मिकता) और इत्तिहाद (एकता) का अहम अलामत (प्रतीक) है।
हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत (जन्म) 570 ईस्वी में मक्का, सऊदी अरब में हुई थी। यह तारीख अक्सर तारीखदान (इतिहासकारों) और इस्लामी उलमा (विद्वानों) द्वारा कबूल की जाती है। 2025 में उनकी विलादत को 1455 साल पूरे हो चुके हैं, क्यूंकि:
- 2025 – 570 = 1455 साल।
यह हिसाब (गणना) ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक है। लेकिन, इस्लामी (हिजरी) कैलेंडर चांद पर मबनी (आधारित) है, इसलिए इसमें साल की गिनती थोड़ी मुख्तलिफ (अलग) होती है। 2025 में हिजरी कैलेंडर के मुताबिक 1447वां साल चल रहा है, क्यूंकि यह कैलेंडर 622 ईस्वी से शुरू होता है, जब हजरत मुहम्मद साहब ने मक्का से मदीना के लिए हिजरत (प्रवास) की थी।बाज (कुछ) उलमा का खयाल है कि हजरत मुहम्मद साहब की विलादत 570 से 571 ईस्वी के दरमियान (बीच) हुई हो सकती है, क्यूंकि उस वक्त सही तारीखों का रिकॉर्ड रखना मुश्किल था। फिर भी, 570 ईस्वी को सब से ज़्यादा कबूल किया जाता है। अहल-ए-सुन्नत (सुन्नी) मुसलमान इस दिन को रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाते हैं, जबकि शिया जमात (समुदाय) इसे 17वीं तारीख को मनाता है। हिंदुस्तान में, सुन्नी रिवायत (परंपरा) के मुताबिक, यह तहवार 12 रबी-उल-अव्वल को ही मनाया जाता है।
यह तहवार क्यूं मनाया जाता है?
इस तहवार का मकसद (उद्देश्य) हजरत मुहम्मद साहब की हयात (जीवन), उनकी तालीमात (शिक्षाओं) और अखलाकी (नैतिक) उसूलों (मूल्यों) को याद करना है। वह इस्लाम के आखिरी नबी हैं, जिन्हें अल्लाह ने कुरान का पैगाम (संदेश) दुनिया तक पहुंचाने के लिए चुना। उनकी तालीमात रहम (दया), भाईचारा, इमानदारी और इंसाफ-ए-इजतिमाई (सामाजिक न्याय) पर मबनी हैं। यह तहवार मुसलमानों को तर्ज (प्रेरणा) देता है कि वह इन उसूलों को अपनी ज़िंदगी में शामिल करें और जमात (समाज) में अमन (शांति) और इत्तिहाद को फरोग (बढ़ावा) दें।
हालांकि, बाज जमातें जैसे सलाफी और वहाबी इस जश्न को नहीं मनाते, क्यूंकि उनका अकीदा (विश्वास) है कि नबी साहब ने अपना यौम-ए-विलादत नहीं मनाया, और यह रिवायत बाद में शुरू हुई। फिर भी, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र और इंडोनेशिया जैसे मुल्कों (देशों) में इसे बड़े जोश के साथ मनाया जाता है।
इस दिन क्या-क्या होता है?
ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के दिन मुस्लिम जमात कई दीनी (धार्मिक) और इजतिमाई (सामाजिक) सरगर्मियों (गतिविधियों) में हिस्सा लेती है। यह सरगर्मियां इलाके (क्षेत्र) और तहजीब (संस्कृति) के मुताबिक थोड़ी मुख्तलिफ हो सकती हैं, लेकिन कुछ आम रिवायात (परंपराएं) यह हैं:
- खुसूसी नमाज और कुरान तिलावत: दिन की इब्तिदा सुबह की नमाज (फज्र) से होती है। मस्जिदों में कुरान की तिलावत, हदीस का पाठ और खुसूसी दुआएं होती हैं।
- जुलूस (जलसा): शहरों और कस्बों में रंग-बिरंगे जुलूस निकलते हैं, जिनमें हरे झंडे लहराए जाते हैं और नात-ए-शरीफ गाए जाते हैं। हिंदुस्तान में मुंबई (मोहम्मद अली रोड), दिल्ली (निजामुद्दीन) और अजमेर (अजमेर शरीफ) के जुलूस मशहूर हैं।
- नात और कव्वाली: नात-ए-शरीफ और कव्वालियां गाकर नबी साहब की तारीफ की जाती है। सूफी रिवायात में यह बहुत मकबूल (लोकप्रिय) है।
- खैरात और सदका (दान): लोग गरीबों को खाना, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें खैरात करते हैं। मिठाइयां, खासकर शहद और सेंवई, बांटी जाती हैं, क्यूंकि शहद नबी साहब को पसंद था।
- सजावट: मस्जिदें, घर और गलियां रौशनी, फूलों और हरे झंडों से सजाई जाती हैं। हरा रंग इस्लाम और जन्नत की निशानी (प्रतीक) है।
- मजलिस और तकरीर (सभाएं और व्याख्यान): उलमा मस्जिदों और इजतिमाई मराकिज (सामुदायिक केंद्रों) में नबी साहब की सीरत (जीवनी) पर तकरीर करते हैं। बच्चे उनकी तालीमात के बारे में सीखते हैं।
- शब-ए-मिलाद: बाज जगहों पर पूरी रात दुआएं और जिक्र (अल्लाह का स्मरण) होता है।
- रोजा (उपवास): कुछ मुसलमान नबी साहब की तरह इस दिन रोजा रखते हैं, क्यूंकि हदीस के मुताबिक वह अपने यौम-ए-विलादत पर रोजा रखते थे।
अहमियत और पैगाम
यह तहवार सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि नबी साहब की तालीमात को ज़िंदगी में इख्तियार करने का मौका है। उनकी हयात रहम, सब्र, इमानदारी और इंसाफ की मिसाल है। यह दिन हमें सिखाता है:
- दूसरों के साथ मोहब्बत और इज्जत से पेश आना।
- गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना।
- जमात में अमन और भाईचारा कायम रखना।
- सच्चाई और सब्र का रास्ता इख्तियार करना।
यह तहवार हमें उनकी तालीमात को याद करने और ज़िंदगी में लागू करने का मौका देता है। जुलूस, दुआएं, खैरात और सजावट इस दिन की रौनक (खुशी) को बढ़ाते हैं। आइए, इस मुकद्दस (पवित्र) मौके पर नबी साहब के पैगाम को इख्तियार करें और अपनी ज़िंदगी को मोहब्बत, अमन और भाईचारे से भर दें। ईद-ए-मिलाद-उन-नबी मुबारक!


