बांग्लादेश में २१ फ़रवरी का दिन केवल एक तारीख़ नहीं है। यह उस संकल्प का प्रतीक है जो एक पूरी पीढ़ी ने अपनी मातृभाषा की रक्षा के लिए लिया था। सन् १९५२ में ढाका की सड़कों पर जो लहू बहा, उसने बांग्लादेश की पहचान को हमेशा के लिए आकार दिया। उसने पूरी दुनिया को यह भी सोचने पर मजबूर किया कि भाषा महज़ संवाद का साधन नहीं, बल्कि एक जाति की आत्मा होती है। इस वर्ष २०२६ में यह दिन और भी विशेष महत्व लेकर आया। बांग्लादेश इस समय एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत में खड़ा है और ऐसे में इस दिन का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा।
वह फ़रवरी जो इतिहास बन गई
बात तब की है जब पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार ने उर्दू को एकमात्र राजभाषा बनाने का फ़ैसला लिया। पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्यक बांग्लाभाषी जनता के लिए यह निर्णय किसी गहरे आघात से कम नहीं था। ढाका विश्वविद्यालय के छात्र सड़कों पर उतर आए। सरकार ने धारा १४४ लगाकर जमावड़े पर रोक लगा दी। लेकिन भाषा की रक्षा का जज़्बा किसी क़ानून की परवाह नहीं करता। ढाका मेडिकल कॉलेज के सामने पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। सलाम, रफ़ीक़, शफ़ीक़, जब्बार और बरकत शहीद हो गए। इन युवाओं का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। सन् १९५६ में पाकिस्तान सरकार को आख़िरकार बांग्ला को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। यही संघर्ष आगे चलकर सन् १९७१ के मुक्ति संग्राम की बुनियाद बना।
शहीद मीनार पर वह रात
हर साल की तरह इस बार भी रात १२ बजकर ०१ मिनट पर पुष्पांजलि का कार्यक्रम शुरू हुआ। राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दीन रात ११ बजकर ५५ मिनट पर परिसर में पहुँचे। प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने रात १२ बजकर ०८ मिनट पर पुष्पमाला अर्पित की। बिगुल पर शोकधुन बजी और पूरा परिसर कुछ पलों के लिए मौन में डूब गया। यह मौन किसी भी भाषण से अधिक कुछ कह गया। इसके बाद मंत्रिमंडल के सदस्यों, विदेशी राजनयिकों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने पुष्पांजलि अर्पित की। शहीद मीनार के आसपास पारंपरिक अल्पना की नौ कलाकृतियाँ बनाई गई थीं। इस बार सफ़ेद, पीले, गुलाबी और नीले रंगों का चुनाव किया गया था।
नई सरकार, नया संदर्भ
इस वर्ष का एकुशे फ़रवरी एक अलग पृष्ठभूमि में मनाया गया। बीएनपी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद यह पहला बड़ा राष्ट्रीय अवसर था। प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने भाषाई न्याय और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि बांग्ला का संवर्धन करते हुए देश की सभी मातृभाषाओं की रक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। बांग्लादेश जमाअत-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफ़ीक़ुर्रहमान ने देशवासियों से इस दिन को गरिमा के साथ मनाने की अपील की। विभिन्न राजनीतिक दलों का इस भावना में एकमत होना उल्लेखनीय था।
यूनेस्को और एक वैश्विक पहचान
एकुशे फ़रवरी की यात्रा केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं रही। १७ नवम्बर १९९९ को यूनेस्को ने २१ फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता दी। तब से यह दिन विश्वभर में भाषाई विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस वर्ष की वैश्विक विषयवस्तु युवाओं को केंद्र में रखती है। दुनियाभर में बांग्लादेश के दूतावासों और उच्चायोगों ने भी इस दिन को सम्मान के साथ मनाया। एक छोटे से देश के छात्रों का संघर्ष आज एक अंतरराष्ट्रीय विरासत बन चुका है।
किताबें, रंग और बच्चों की आवाज़ें
एकुशे फ़रवरी केवल शोक का दिन नहीं है। बांग्ला एकेडमी के पुस्तक मेले में इस बार भी अच्छी भीड़ रही। बांग्लादेश शिल्पकला एकेडमी, राष्ट्रीय पुस्तक केंद्र, काज़ी नज़रुल इस्लाम संस्थान और इस्लामिक फ़ाउंडेशन ने मिलकर कार्यक्रमों को जीवंत बनाया। बांग्लादेश शिशु एकेडमी ने बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिताएँ और कविता पाठ आयोजित किए। राष्ट्रीय संग्रहालय में भाषा आंदोलन पर वृत्तचित्र दिखाए गए। ढाका के प्रमुख चौराहों को देश की जनजातीय भाषाओं की वर्णमाला से सजाया गया। यह छोटी-सी बात बहुत कुछ कह जाती है।
भाषा का संघर्ष, मानवता का सबक़
एकुशे फ़रवरी की असली सीख सरल है। भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की सोच, संस्कृति और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है। जब कोई सत्ता किसी भाषा को दबाने की कोशिश करती है, तो वह दरअसल उस समाज की आत्मा को कुचलने की कोशिश करती है। बांग्लादेश के भाषा शहीदों ने यह सिद्ध किया कि ऐसी कोशिशें कभी स्थायी नहीं होतीं। आज जब दुनिया में हर पखवाड़े एक भाषा विलुप्त हो रही है, तब इस दिन की याद पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है। सोचने वाली बात यह है कि जो भाषा खो जाती है, उसके साथ एक पूरी दुनिया खो जाती है। लोककथाएँ, कहावतें, वे सारे शब्द जिनका कोई अनुवाद नहीं होता, सब कुछ। सन् १९५२ के शहीदों ने अपनी जान देकर यह याद दिलाया कि किसी भाषा को बचाना दरअसल एक पूरी सभ्यता को बचाना है। यही एकुशे फ़रवरी का वह संदेश है जो सात दशक बाद भी उतना ही ताज़ा और उतना ही ज़रूरी है।
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