भारत में वायु प्रदूषण लगातार गंभीर होता जा रहा है, लेकिन सरकार इसे रोकने के लिए कदम उठाने में नाकाम रही है। संसद की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण मंत्रालय को वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवंटित ₹858 करोड़ में से 1% से भी कम खर्च किया गया है। यह स्थिति तब है जब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, और पटना जैसे बड़े शहरों की हवा दिन-ब-दिन ज़हरीली होती जा रही है।
घोषणाएं तो खूब, लेकिन ज़मीनी काम शून्य
सरकार हर साल प्रदूषण नियंत्रण के लिए योजनाएं घोषित करती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि फंड का सही इस्तेमाल ही नहीं हो रहा। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) और राज्यों की एजेंसियों को प्रदूषण से निपटने के लिए पैसा दिया जाता है, लेकिन संसदीय पैनल ने पाया कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन बेहद कमजोर है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नीतियां सिर्फ कागज़ों पर बन रही हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका कोई असर नहीं दिख रहा। प्रदूषण को रोकने के लिए नए उपायों की घोषणा तो होती है, लेकिन मौजूदा योजनाओं का भी सही तरह से क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा।
प्रदूषण से लोगों की सेहत पर बुरा असर
वायु प्रदूषण का असर आम जनता की सेहत पर साफ दिख रहा है।
- हर साल लाखों लोग अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्रदूषण से होने वाली बीमारियों की वजह से हर साल लाखों मौतें हो रही हैं।
- बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।
पर्यावरणविद् सौरभ गुप्ता कहते हैं, “हमारी सरकारें प्रदूषण को विकास का ‘साइड इफेक्ट’ मानकर नज़रअंदाज कर रही हैं। अगर यही रवैया जारी रहा, तो भारत के लोग साफ हवा के लिए तरस जाएंगे।”
जनता पर बोझ, सरकार पर सवाल
प्रदूषण से बचने के लिए लोग महंगे एयर प्यूरीफायर, मास्क और डॉक्टर के खर्च उठाने को मजबूर हैं। आम आदमी की जेब पर भार बढ़ता जा रहा है, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस समाधान नहीं दिखता। यह सवाल भी उठता है कि अगर सरकार को प्रदूषण से निपटने की परवाह नहीं, तो क्या भारत में लोगों की ज़िंदगी इतनी सस्ती है?
आगे क्या? क्या सरकार बदलेगी अपनी नीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिर्फ नीतियां बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन पर अमल भी जरूरी है। सरकार को चाहिए कि वह –
- पर्यावरण एजेंसियों की जवाबदेही तय करे।
- कड़े नियम लागू करे ताकि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई हो।
- हरित ऊर्जा को बढ़ावा दे और सार्वजनिक परिवहन को सुधारे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है – क्या सरकार वाकई लोगों की सांसें बचाने के लिए कदम उठाएगी, या ₹858 करोड़ का फंड अगले साल भी धूल फांकता रहेगा?


