आज ये लेख क्यों? क्योंकि जब भारत फिर से पाकिस्तान की घुसपैठ, हाल ही में हुए पहलगाम हमला, आतंकवाद और सीमा पार से हो रही फायरिंग को झेल रहा है, तो एक सवाल फिर से खड़ा होता है| अगर 1965 में जीता गया हाजी पीर दर्रा हमने लौटाया न होता, तो क्या हालात कुछ और होते? कश्मीर में हाल ही में हुई घुसपैठ की घटनाएं, राजौरी और पुंछ में मुठभेड़, और एलओसी पर तनाव ये सब बताने के लिए काफी हैं कि हाजी पीर दर्रा केवल एक पहाड़ी रास्ता नहीं था, बल्कि रणनीतिक नियंत्रण का असली चाबी था।

हाजी पीर दर्रा कहां है और क्यों है इतना अहम?
यह दर्रा जम्मू-कश्मीर के पुंछ और उरी सेक्टरों को जोड़ता है, और समुद्र तल से 2.640 मीटर (8,661 फीट) की ऊंचाई पर स्थित एक ऊंचा पर्वतीय दर्रा है, जो भारतीय सीमा के पास पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित है। आंतरिक हिमालय क्षेत्र में पीर पंजाल पर्वतमाला के पश्चिमी किनारे पर स्थित, शिखर तक जाने वाला मार्ग कच्चा है।सामरिक रूप से यह ऐसा रास्ता है जिससे पाकिस्तान कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ कराता रहा है। यह दर्रा अगर आज भारत के पास होता, तो एलओसी पर इंटेलिजेंस, पेट्रोलिंग और घुसपैठ रोकने की क्षमता कई गुना ज्यादा होती।
1965 में कैसे जीता भारत ने हाजी पीर दर्रा?
26 अगस्त से 28 अगस्त 1965 के बीच भारतीय सेना ने एक सटीक और बहादुरी भरी योजना के तहत हाजी पीर दर्रे पर कब्जा किया। ब्रिगेडियर ज़ोरावर चंद बख्शी और मेजर रणजीत सिंह डयाल के नेतृत्व में 1 पैरा, 19 पंजाब, 4 राजपूत और 6 जैक राइफल्स की यूनिट्स ने इस दुर्गम इलाके को फतह किया।

वो इलाका जहां दुश्मन की ताकत ज्यादा थी, मौसम खराब था, और चढ़ाई मुश्किल — भारतीय जवानों ने उसे सीने पर गोली खाकर भी जीत लिया। 28 अगस्त की सुबह 10:30 बजे, तिरंगा हाजी पीर दर्रे पर लहरा रहा था।
इतिहास में दर्ज एक गर्व, जो अफसोस बन गया
इस वीरता और रणनीतिक कौशल के लिए ब्रिगेडियर बख्शी और मेजर दयाल को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, जबकि 1 पैरा यूनिट को “बैटल ऑनर हाजी पीर” और “थिएटर ऑनर जम्मू और कश्मीर (1965)” से नवाज़ा गया। लेकिन…
फिर भारत ने इसे पाकिस्तान को लौटा क्यों दिया?
10 जनवरी 1966 को ताशकंद में समझौता हुआ। शांति के नाम पर, जो जीता हुआ इलाका था — वो भी लौटाया गया।
हाजी पीर भी उन्हीं में शामिल था। यह फैसला आज भी सैनिकों के बलिदान और जनता की उम्मीदों के साथ किया गया समझौता माना जाता है। इतिहासकारों और सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि रणनीतिक विजय को कूटनीतिक हार में बदल देना, भारत के सबसे बड़ी भूलों में से एक थी। इस कदम की देश के कई रणनीतिक विशेषज्ञों और सेना के पूर्व अधिकारियों ने आलोचना की। उनका मानना था कि यह क्षेत्र पाकिस्तान से भारत में आतंकवादियों की घुसपैठ का प्रमुख मार्ग था, जिसे रोकने के लिए इस इलाके पर स्थायी नियंत्रण जरूरी था।

आज की तारीख में क्यों उठती है ये बहस दोबारा?
- कश्मीर में हाल की आतंकी घटनाएं, जैसे पुंछ में हमले, बार-बार दिखाते हैं कि पाकिस्तान को एलओसी के पास स्थित इलाकों का फायदा मिल रहा है।
- हाजी पीर आज भी पाकिस्तान से आतंकियों के लिए “पार्किंग एरिया” बना हुआ है।
- भारत को एलओसी पर पूरी पकड़ बनाने के लिए ऐसे दर्रों की ज़रूरत है, जहां से आतंकवाद को रोका जा सके।
अगर हाजी पीर आज हमारे पास होता तो क्या होता?
- पुंछ-उरी के बीच सीधा सैन्य रूट
- घुसपैठ का रास्ता बंद
- आतंकवाद पर मजबूत नियंत्रण
- पाकिस्तान की सामरिक चालों पर बेहतर नजर
- सियासत से ज्यादा सेना के हाथ में ताकत
इंसानी पहलू: एक जवान की नज़र से
सोचिए, जिन जवानों ने रातों में भूखे-प्यासे रहकर, खून बहाकर ये दर्रा जीता — उनकी कुर्बानी आखिर क्यों लौटाई गई?
कितने माता-पिता ने अपने बेटे खोए, कितनी विधवाएं बनीं… और बदले में मिला क्या? आज जब एक और मुठभेड़ की खबर आती है, तो वो कुर्बानियां गूंजती हैं — हाजी पीर लौटाने का अफसोस और भी बढ़ जाता है।
इतिहास की गलतियों से सीख जरूरी है
भारत को अब न सिर्फ कूटनीति में सख्त होना होगा, बल्कि यह भी समझना होगा कि जो जीता जाए, वो लौटाया नहीं जाता।
हाजी पीर आज भी एक जख्म है — न सिर्फ नक्शे पर, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा पर।


