आपको तो याद ही होंगे वो बचपन के दिन जब गर्मी की छुट्टियों में दादी के घर पे सारे कजिन्स एक लूडो बोर्ड के आस-पास जमा हो जाते थे? वो छोटे-छोटे प्लास्टिक के गोटियों को आगे बढ़ाने का थ्रिल, और जब किसी का पीस काट दिया जाए तो वो ‘अरे यार!’ वाला मोमेंट? ‘भाई प्लीज ये वाली गोटी मत मार,’ वाला दर्द। लूडो सिर्फ़ एक गेम नहीं है, ये एक फीलिंग है! आज हम इसी लूडो के मज़े को एक्सप्लोर करते हुए एक लूडो पर चर्चा करते हुए इसके इतिहास और इसकी रोचक बातों को जानते हैं। तो चलिए, लूडो के बोर्ड पे एक सफ़र शुरू करते हैं, और देखते हैं ये गेम इतना खास क्यों है।
लूडो बोर्ड?
तो, लूडो हमारे बचपन का बेस्ट फ्रेंड है, ये बात आप सभी मानते होंगे… है ना? वो लाल, पीला, हरा, और नीला बोर्ड, जिसमें चार गोटियाँ अपने घर से निकलकर एक रेस में दौड़ती हैं। एक छोटे से पासे के रोल पे दिल धड़कता है… क्या छक्का आएगा? या फिर एक-दो से काम चलाना पड़ेगा? गोटी खुलेगी भी या नहीं। कभी कभी तो खेल खत्म हो जाता था लेकिन गोटी खुलने का नाम ही नहीं लेती थी। लूडो का वो बोर्ड बस एक खेल नहीं, खुशी का खज़ाना है। पर इसकी कहानी कहाँ से शुरू हुई? चलिए इसकी थोड़ी सी हिस्ट्री भी जान लेते हैं।
मुग़ल दरबार से स्मार्टफोन तक
लूडो का जन्म हुआ है हमारे अपने भारत में, 6ठी सदी में, जब ये ‘पचीसी‘ के नाम से खेला जाता था। सोचिए, मुग़ल बादशाह अपने आँगन में बड़े-बड़े मोहरे लेकर ये खेलते थे! फिर 1896 में अंग्रेज़ों ने इसे थोड़ा सिम्पल करके ‘लूडो’ का नाम दिया। और आज, लूडो बोर्ड से निकलकर हमारे फोन में आ गया है। लूडो किंग ऐप तो सुना ही होगा… लॉकडाउन में तो ये घर-घर का हीरो बन गया था! ऑनलाइन खेलते हुए वो मज़ा जब आप अपने दोस्त की गोटी काट देते हैं और वो वीडियो कॉल पे चिल्लाता है, बस दिल खुश हो जाता है।
लूडो का असली मसाला: स्ट्रैटेजी और मस्ती
कुछ लोग कहेंगे की ये तो लक का खेल है, पर भाई, थोड़ी सी स्ट्रैटेजी भी तो बनता है! कभी सोचा है, कौन सी गोट आगे करनी है? जो घर के पास है, या जो सामने वाले की गोट काट सकता है? और जब दो गोट एक जगह पे आके ब्लॉक बनाते हैं, तो सामने वाला कितना फ्रस्ट्रेट होता है! साइकोलॉजिस्ट्स बोलते हैं लूडो सब्र सिखाता है, दिमाग़ चलाता है, और फैमिली के साथ बॉन्डिंग बढ़ाता है। याद है जब मम्मी-पापा के साथ खेलते थे, और पापा हर बार बोलते, ‘बेटा, सोच के चल!’? वो सिखाई हुई स्ट्रैटेजी आज भी काम आती है।
लूडो और हमारा पॉप कल्चर
लूडो हमारे पॉप कल्चर का हिस्सा है! याद है लॉकडाउन के वो मीम्स – ‘लूडो में हरा दिया, अब क्या बोलता है?’ बॉलीवुड में भी तो कितनी बार देखा है, जब फैमिली लूडो खेल रही होती है और एक इमोशनल सीन बन जाता है। या फिर वो दोस्त जो लूडो के ऑनलाइन मैच के बाद बोलता है, “भाई, एक और गेम!” लूडो का ये वाइब ही अलग है… ये गेम नहीं, एक कनेक्शन है।
दुनिया भर में लूडो का जलवा
लूडो सिर्फ़ हमारे यहाँ ही नहीं, दुनिया भर में अलग-अलग नाम से खेला जाता है। अमेरिका में ये पार्चीज़ी है, जर्मनी में ‘Mensch Ärgere Dich Nicht’ – मतलब ‘भाई, गुस्सा मत हो!’ और रॉयल नेवी में अकर्स के नाम से नाविक इसे खेलते हैं। सबके रूल्स थोड़े अलग हैं, पर मज़ा वही है… अपनी गोट को फिनिश लाइन तक ले जाओ, और रास्ते में दुश्मन को हराओ!
अपना लूडो, अपना स्टाइल
अब थोड़ी क्रिएटिविटी की बात करते हैं। क्या आप अपना लूडो बोर्ड बना सकता है? सोचिए, एक एवेंजर्स वाला बोर्ड, जिसमें आयरन मैन, थॉर, और कैप्टन अमेरिका के पीस हों! या फिर एक देसी वर्ज़न, जिसमें मसाले वाले रंग और बॉलीवुड स्टार्स के नाम हों। घर पे बच्चे के साथ मिलके एक बोर्ड बनाइये, और नए रूल्स ऐड करिये – जैसे छक्के पे दो बार रोल करने का चांस। ये DIY लूडो आपको एक नया मज़ा देगा, और घरवालों के साथ एक फन प्रोजेक्ट भी बन जाएगा।
लूडो का स्कूल में काम
टीचर्स भी लूडो के फैन हैं, स्कूल्स में लूडो प्रोबेबिलिटी सिखाने के लिए यूज़ होता है – जैसे, छक्का आने का चांस कितना है? या फिर स्ट्रैटेजी बनाने और टीमवर्क के लिए। बच्चों को ये गेम पसंद भी आता है, और सिखाते-सिखाते मज़ा भी देता है। सोचिए, अगर हमारे टाइम में टीचर ऐसे पढ़ाते, तो कितना फन होता!
लूडो का डिज़ाइन
लूडो का बोर्ड देख के कभी सोचा है, ये इतना अट्रैक्टिव क्यों है? वो वाइब्रेंट रंग, वो सिम्पल लेआउट… सब कुछ परफेक्ट है। पुराने ज़माने में वुडन बोर्ड्स होते थे, जो अब भी एंटीक शॉप्स में मिलते हैं। आजकल नियोन रंग और ग्लॉसी बोर्ड्स भी आते हैं। ये डिज़ाइन ही लूडो को हर घर का फेवरेट बनाता है। अगली बार जब आप खेलो, बोर्ड के डिज़ाइन पे थोड़ा गौर करना… ये एक छोटा सा आर्ट पीस है!
लूडो का मज़ा
अब बात करते हैं उस मज़े की, जो लूडो खेलते वक़्त मिलता है। वो मोमेंट जब आप छक्का रोल करता है और अपनी गोट घर से बाहर निकालता है, वो एक्साइटमेंट! या जब आप सामने वाले की गोट काट देते हैं, और वो बोलता है, “भाई, ये तो चीटिंग है!” वो छोटी-छोटी लड़ाइयाँ, वो हंसी-मज़ाक, और वो जीत का जश्न… ये सब लूडो का असली जादू है। याद है जब दादी बोलती थी, “खेलते रहो, पर लड़ना मत!”? लूडो ने ना जाने कितने रिश्ते जोड़े हैं, कितनी यादें बनाई हैं।
लूडो एक गेम नहीं, एक टाइम मशीन है। एक रोल में आप अपने बचपन में चले जाता हैं, जब सब कुछ सिम्पल था। और आज भी, जब आप फोन पे लूडो खेलते हैं या घर पे बोर्ड निकालते हैं, वही पुराना मज़ा मिलता है। इस गेम में ना कास्ट देखी जाती है, ना स्टेटस, बस एक पासे का रोल और दिल से खेलने का जज़्बा चाहिए।
लूडो का ये सफ़र कैसा लगा? ये गेम सिर्फ़ एक बोर्ड और चार गोटियों का नहीं, हमारे दिल का एक हिस्सा है। चाहे आप मुंबई की चॉल में खेल रहे हो, या लंदन के अपार्टमेंट में, लूडो का मज़ा यूनिवर्सल है। तो आज रात क्या प्लान है? बोर्ड निकालें, या फोन पे एक मैच हो जाए? चलिए, एक छक्का रोल करते है, और यादें ताज़ा करते हैं! लूडो नहीं खेला तो क्या खेला, भाई!


