मुंबई, भारत की वित्तीय राजधानी, कभी अपनी खूबसूरत समुद्री हवाओं, मैंग्रोव से भरे किनारों और समृद्ध समुद्री जैव विविधता के लिए जानी जाती थी। लेकिन आज वही समुद्र प्लास्टिक और प्रदूषण से कराह रहा है। शहरीकरण की अंधी दौड़, मानव का लालच और सरकारी उदासीनता ने समुद्र को धीरे-धीरे खामोश कर दिया है। वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे 2025 की थीम “प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करना” इस संकट की गंभीरता को उजागर करती है।
समुद्र में बढ़ता प्लास्टिक: भयावह भविष्य की चेतावनी आईआईटी बॉम्बे के एक अध्ययन में चेताया गया है कि 2050 तक मुंबई के समुद्र में प्लास्टिक का भार मछलियों से अधिक हो सकता है। माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी ने मछलियों, झींगों और शंखों तक को विषैला बना दिया है, जो अंततः इंसानी भोजन का हिस्सा बनते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर 100 ग्राम मछली में 80 माइक्रोप्लास्टिक कण मिल रहे हैं।
मछुआरे समुदाय की दुर्दशा वर्ली के मछुआरे मनोहर (52) बताते हैं, “पहले किनारे के पास ही मछलियाँ मिल जाती थीं, अब घंटों समुद्र में जाने के बाद भी खाली लौटना पड़ता है। प्लास्टिक ही जाल में फँसता है।” उनकी आय आधी रह गई है। वर्सोवा की 71 वर्षीय जयवंती धाकले कहती हैं, “पहले ₹100 में मछली भर जाती थी, अब ₹1,000 में भी कम मिलती है।”
पिछले दशक में मुंबई के तटीय इलाकों में मछली पकड़ने वाली नावों की संख्या 800 से घटकर 50 रह गई है। यह न सिर्फ एक आजीविका का संकट है, बल्कि एक पारंपरिक संस्कृति का भी अंत है।
प्राकृतिक आवास पर हमला: मैंग्रोव की कटौती और क्रीक का संकुचन मालाड क्रीक में 1972 से 2016 के बीच मैंग्रोव का क्षेत्र 13.3 वर्ग किलोमीटर से घटकर 9.7 वर्ग किलोमीटर रह गया है। यही मैंग्रोव समुद्री जीवों का शरण स्थल होते हैं और मछलियों के प्रजनन में अहम भूमिका निभाते हैं। इनका नुकसान समुद्री जैव विविधता पर सीधा प्रहार है।
बड़े शहर, बड़ी लापरवाही मुंबई ही नहीं, बल्कि चेन्नई, कोलकाता, विशाखापट्टनम और गोवा जैसे तटीय शहरों में भी यही हाल है। बेफ़िक्री से बहाया गया प्लास्टिक, सीवेज वेस्ट, और रियल एस्टेट विकास ने समुद्रों को कचरे के डंपिंग यार्ड में बदल दिया है। यह संकट केवल मछलियों और कछुओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला और हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है।
मानवता बनाम सुविधा: कौन जिम्मेदार? आज की उपभोक्तावादी सोच में लोगों ने समुद्र को “वेस्टबिन” समझ लिया है। हर कोई अपनी सुविधा, पैसा और लालच में डूबा है, लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि हम जिस पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं, वही हमारे जीवन की नींव है। यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उम्मीद की किरण: समाधान और पहल
- सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध और वैकल्पिक उत्पादों को बढ़ावा देना।
- समुद्र तटों की नियमित सफाई को जनांदोलन बनाना, जैसे मुंबई का Versova Beach क्लीनअप उदाहरण।
- CRZ (Coastal Regulation Zone) नियमों को सख्ती से लागू करना।
- स्कूलों और कॉलेजों में समुद्री पारिस्थितिकी पर शिक्षा देना।
- स्थानीय मछुआरा समुदायों को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता देना।
वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे 2025: एक वैश्विक अवसर 5 जून, 2025 को वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे की थीम है – “Beat Plastic Pollution (प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करो)”। इस दिन को सिर्फ भाषणों तक सीमित न रखें। समुद्र की लहरों को बचाने के लिए एक छोटा सा कदम उठाएँ – अपनी थैली साथ रखें, प्लास्टिक बोतल छोड़ें, समुद्र तट पर एक घंटा सफाई में बिताएं।
निष्कर्ष: अगर हम अब भी नहीं जागे, तो अगली पीढ़ी को समुद्र की लहरें नहीं, बस प्लास्टिक के ढेर ही मिलेंगे। समुद्र हमारी सभ्यता का पालक रहा है – अब हमारी बारी है कि हम उसकी रक्षा करें। यह लेख एक आह्वान है – सरकारों के लिए, उद्योगों के लिए और हर नागरिक के लिए कि समुद्री जीवन को बचाना अब विकल्प नहीं, ज़रूरत है।


