जिस घर में नवरात्रि पूरे नियम से मनाई जाती है, वहाँ कुछ ही दिनों में चार अजीब चीज़ें दिखने लगती हैं। मिट्टी के ऊपर पानी से भरा एक कलश रखा है। एक छोटी-सी लौ दिन-रात जलती रहती है। रसोई में गेहूँ-चावल की जगह कुट्टू और साबूदाना आ गया है। और एक सुबह घर में छोटी-छोटी बच्चियाँ आती हैं, जिनके पैर धोकर उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। हम ये सब हर साल करते हैं, पर कम ही लोग पूछते हैं कि ऐसा क्यों। नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू हुई है और 19 अक्टूबर तक चलेगी।
शुरुआत कलश से होती है। पहले दिन घटस्थापना की जाती है। नाम सीधा है: घट यानी घड़ा और स्थापना यानी बैठाना। मिट्टी में जौ बोकर उसके ऊपर पानी से भरा कलश रखा जाता है। कलश के मुँह पर आम के पत्ते लगाए जाते हैं और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखा जाता है।
परंपरा की अपनी प्रतीक-भाषा में कलश पूरे ब्रह्मांड का रूप माना जाता है। उसका चौड़ा आधार पृथ्वी है, बीच का हिस्सा जल, गर्दन अग्नि, मुँह वायु, और नारियल व पत्ते आकाश। पानी जीवन का, आम के पत्ते ताज़गी और उर्वरता का, और नारियल समृद्धि का प्रतीक हैं। मान्यता है कि कलश के रूप में देवी को नौ दिन के लिए घर बुलाया जाता है। जौ में रोज़ पानी दिया जाता है, और जो अंकुर निकलते हैं, उन्हें आने वाले साल के लिए शुभ संकेत माना जाता है।
फिर आती है अखंड ज्योति। बहुत से परिवार पहले दिन दीपक जलाते हैं और उसे नवरात्रि के अंत तक बुझने नहीं देते। अखंड का मतलब है जो टूटे नहीं, और ज्योति का मतलब लौ। इसमें आमतौर पर घी, कभी-कभी तिल या सरसों का तेल डाला जाता है। अगर लौ बुझ जाए तो कई घरों में उसे फिर से जला लिया जाता है, और नवरात्रि खत्म होने पर उसे फूँककर नहीं बुझाते, अपने आप शांत होने देते हैं। भाव यह है कि भक्ति में कोई विराम न आए। भारतीय परंपरा में दीपक ज्ञान का भी प्रतीक है, इसलिए यह लौ प्रार्थना भी है और संकल्प भी।
अब व्रत की बात। आम नियम ये हैं कि गेहूँ-चावल, दालें, प्याज़-लहसुन, माँस और शराब से दूरी रखी जाती है, और साधारण नमक की जगह सेंधा नमक इस्तेमाल होता है। इनकी जगह कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा, समा के चावल, साबूदाना, फल, दूध और आलू खाए जाते हैं। इसके पीछे संयम और सात्विक भोजन की सोच है। एक मौसमी तर्क भी बताया जाता है। नवरात्रि मौसम बदलने के समय आती है, जिसे परंपरा में पाचन के लिए थोड़ा भारी माना गया है, इसलिए हल्का खाने की सलाह दी जाती है। बाकी बातें परिवार की परंपरा पर निर्भर हैं। तला हुआ साबूदाना वड़ा व्रत के नियम में आ सकता है, पर हल्का बिल्कुल नहीं होता।
और फिर अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन आता है। दिल्ली के पंचांग में अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह से 19 अक्टूबर की सुबह करीब 10:52 बजे तक है, इसलिए कहीं अष्टमी 18 को और कहीं 19 को मानी जा रही है। अपने शहर का पंचांग देख लें। परंपरा के अनुसार करीब दो से दस साल की नौ कन्याओं को घर बुलाया जाता है, देवी के हर रूप के लिए एक, और अक्सर साथ में एक छोटा लड़का बटुक भैरव के रूप में बिठाया जाता है। उनके पैर धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है, पूरी-हलवा-चने का भोजन कराया जाता है और छोटे उपहार दिए जाते हैं। देवी भागवत पुराण में हर उम्र का अलग नाम बताया गया है, दो साल की कुमारी से दस साल की सुभद्रा तक, हालाँकि स्रोतों में सूची थोड़ी अलग है। देवी भागवत के हवाले से यह भी कहा जाता है कि देवी जप, हवन और दान से उतनी प्रसन्न नहीं होतीं, जितनी कुमारी के पूजन से। कई परिवार इसके बिना व्रत अधूरा मानते हैं।
इसका मतलब सीधा है। उस सुबह बच्ची देवी जैसी नहीं, देवी ही होती है।
इसीलिए इसे ईमानदारी से देखना भी ज़रूरी है। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 0 से 6 साल का बाल लिंगानुपात 919 था, यानी हर 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियाँ। यह आज़ादी के बाद का सबसे कम आँकड़ा था। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) में जन्म के समय लिंगानुपात 929 रहा, जो पिछले सर्वे के 919 से बेहतर है, पर अब भी जितना होना चाहिए उससे कम है। एक देश अष्टमी पर छोटी बच्चियों के पैर धो सकता है और फिर भी बेटियों को जन्म लेने देने में जूझ सकता है। दोनों बातें साथ-साथ सच हैं।
तो नवरात्रि की हर परंपरा आख़िर कहती क्या है? कलश कहता है कि देवी को अपने घर में बुलाओ। लौ कहती है कि निरंतर रहो। व्रत कहता है कि मौसम बदल रहा है, थोड़ा ठहरो और हल्का खाओ। और कन्या पूजन कहता है कि कन्याओ में देवी को देखो। अगर नौ कन्याएँ न मिल पाएँ, तो एक भी काफ़ी है, क्योंकि असली बात श्रद्धा और सम्मान की है, गिनती की नहीं। कन्या पूजन की असली परीक्षा थालियाँ उठने के बाद शुरू होती है, जब हमें उसे बाकी 364 दिन भी वैसा ही सम्मान देना होता है।
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