भारत के सामने कई तरह की चुनौतियाँ आईं, लेकिन नक्सलवाद जितना पुराना, खतरनाक और हटने का नाम न लेने वाला आंदोलन बहुत कम है। यह सिर्फ एक विचारधारा नहीं, बल्कि हथियारों पर टिका एक हिंसक संघर्ष है जिसने देश के कई इलाकों को दशकों तक पीछे धकेला। नक्सलवाद को समझना जरूरी है, क्योंकि यह मुद्दा सिर्फ सुरक्षा का नहीं, विकास, शासन और न्याय की असली विफलताओं का आईना भी है।
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई। जमीन विवाद, आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता के बीच उभरे इस आंदोलन में वामपंथी नेताओं ने किसानों को हथियार उठाने के लिए उकसाया। उनका दावा था कि मौजूदा व्यवस्था गरीबों को न तो सुरक्षा दे सकती है, न सम्मान। इस सोच की जड़ें चीन के माओवादी विचार से आती थीं, जहाँ राज्य को उखाड़ने के लिए ग्रामीण इलाकों से सशस्त्र लड़ाई शुरू करने का सिद्धांत था। इसी रणनीति ने भारत में नक्सलवाद को जन्म दिया।
नक्सलवाद वहाँ पनपा जहाँ सरकार की मौजूदगी बेहद कमजोर थी। कई आदिवासी और पिछड़े क्षेत्र सड़क, बिजली, अस्पताल, स्कूल, पानी और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर थे। लोग भ्रष्टाचार का शिकार थे, न्याय प्रणाली से निराश थे और प्रशासन से कटे हुए थे। इस खालीपन को नक्सलियों ने मौके के तौर पर देखा। उन्होंने लोगों की समस्याओं को “क्रांति” का चेहरा दिया और धीरे-धीरे उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। यही कारण है कि यह आंदोलन जंगलों और पहाड़ों में सबसे तेजी से फैला।
समय के साथ नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से निकलकर झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के जंगलों तक फैल गया। आज भी कुछ इलाके प्रभावित हैं, हालांकि पहले की तुलना में बहुत कम। नक्सली खुद को गरीबों का रक्षक बताते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिलकुल उलट है। वे पुलिस बलों पर हमले करते हैं, विकास परियोजनाएँ रोकते हैं, सड़कें उखाड़ते हैं, स्कूलों को उड़ाते हैं और आम नागरिकों को डराते हैं। खनन कंपनियों से जबरन पैसे वसूलना उनकी आम कमाई है। यही वजह है कि इन इलाकों में निवेश ठहर जाता है और विकास लगभग रुक जाता है।
इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कई बार साफ कहा है कि भारत नक्सलवाद के अंतिम चरण में पहुँच चुका है। उनका बयान बेहद सीधा है कि देश 2026 से पहले नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। उनके मुताबिक नक्सलवाद अब कुछ सीमित जिलों तक ही बचा है और बाकी इलाकों में सुरक्षा बलों ने इसे काफी हद तक खत्म कर दिया है। Amit Shah ने नक्सलियों को कई बार यह संदेश भी दिया कि हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटें, क्योंकि अब सरकार विकास योजनाओं को तेजी से जमीन पर उतार रही है। वे कहते हैं कि देश ऐसे हिंसक आंदोलन के साथ आगे नहीं बढ़ सकता। उनकी रणनीति स्पष्ट है: सख्त कार्रवाई और समानांतर विकास।
अगर हम वास्तविकता देखें तो नक्सलवाद की सबसे मजबूत जमीन हमेशा वही रही है जहाँ सरकारी व्यवस्था कमजोर थी। जिन गाँवों में सड़कें नहीं थीं, वहाँ नक्सलियों का प्रभाव ज्यादा था। जहाँ स्कूल नहीं थे, वहाँ बच्चे आसानी से उनके जाल में फंसते थे। जहाँ अस्पताल नहीं थे, वहाँ लोग नक्सली कैडर को ही देखकर सुरक्षा महसूस करते थे। सरकार की अनुपस्थिति नक्सलवाद की सबसे बड़ी ताकत रही है। लेकिन जैसे-जैसे राज्यों ने सड़कें बनाई, मोबाइल नेटवर्क पहुंचा और शिक्षा व स्वास्थ्य बेहतर हुए, नक्सलवाद कमजोर होने लगा।
पिछले दस वर्षों में नक्सली हिंसा में भारी गिरावट आई है। कई प्रमुख कमांडर मारे गए हैं और बड़ी संख्या में कैडर ने आत्मसमर्पण किया है। कई युवा यह समझने लगे हैं कि बंदूक उन्हें भविष्य नहीं दे सकती। सरकारें उन्हें नौकरी, प्रशिक्षण और पुनर्वास देकर समाज में शामिल कर रही हैं। यह बदलाव इसलिए भी आया है, क्योंकि अब आदिवासी इलाकों में विकास की असल मौजूदगी दिखने लगी है।
फिर भी, चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई। नक्सली समूह जंगलों में छिपकर अचानक हमले करते हैं। वे स्थानीय लोगों को धमकाकर भर्ती करने की कोशिश करते हैं। कई ऐसे इलाके हैं जो अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए हैं, और यही जगहें नक्सलियों के लिए बचाव का क्षेत्र बनी रहती हैं। अगर इन इलाकों में स्थायी विकास नहीं होता, तो समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। यह सिर्फ पुलिस या सेना का काम नहीं है, यह प्रशासन, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक इच्छाशक्ति का संयुक्त काम है।
Amit Shah का दावा है कि सरकार इस दिशा में लगातार निवेश कर रही है और उनकी योजना है कि हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में सड़क, इंटरनेट, पानी, अस्पताल और स्कूल ऐसे स्तर पर पहुंचे कि लोग खुद नक्सलवाद को खारिज कर दें। उनके अनुसार नक्सलवाद की जड़ें केवल हथियारों में नहीं, बल्कि गरीबी, अलगाव और उपेक्षा में हैं। जब ये तीन कारण खत्म होंगे, तो बाकी आंदोलन अपने आप सुख जाएगा।
नक्सलवाद भारत को एक बड़ी सीख देता है। कोई भी क्षेत्र अगर सरकार की नजर से लंबे समय तक दूर हो जाए और लोगों को न्याय, सुरक्षा और विकास से वंचित कर दिया जाए, तो असंतोष जन्म लेता है। यह असंतोष अगर बहुत समय तक जमा रहे, तो वह हिंसा का रूप ले लेता है। यही नक्सलवाद का मूल है। इसलिए अगर देश को इस समस्या का स्थायी समाधान चाहिए, तो उसे उन कारणों को खत्म करना होगा जिनसे यह आंदोलन पैदा हुआ।
नक्सलवाद भारत की सुरक्षा, विकास और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सबसे बड़ी अंदरूनी चेतावनी रहा है। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। सरकारें अधिक सक्रिय हैं, सुरक्षा बल अधिक प्रशिक्षित हैं और विकास पहली बार इतनी तेजी से प्रभावित इलाकों तक पहुँच रहा है। अगर यह रफ्तार जारी रही, तो नक्सलवाद सिर्फ इतिहास की एक कड़वी याद बनकर रह जाएगा।
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