7 जुलाई 2025 का दिन, व्हाइट हाउस में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आमने-सामने बैठे थे। तभी नेतन्याहू एक पत्र निकालते हैं और कहते हैं, “मैं ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन करता हूँ।” ट्रम्प एक दम हैरान रह गए। ट्रम्प, लंबे समय से इस पुरस्कार के लिए इच्छा व्यक्त करते रहे थे। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू की ओर से यह नामांकन अप्रत्याशित और ‘बहुत सार्थक’ है।
अब सवाल ये है की आखिर ये नामांकन क्यों और किसलिए जाता है, और यह पुरस्कार किन लोगों को दिया जाता है?
शायद अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे की ये नोबेल शांति पुरस्कार है क्या चीज? और ये इतनी अहमियत क्यों रखता है। चलिए, इस पुरस्कार को समझते हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार क्या है?

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नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान है। ये उन लोगों या ग्रुप्स को मिलता है, जो शांति के लिए कुछ खास करते हैं। जैसे, देशों को एकजुट करना, युद्ध रोकना या इंसानियत के लिए काम करना। स्वीडन के उद्योगपति, आविष्कारक, और आयुध निर्माता ‘अल्फ्रेड नोबेल’ ने 1895 में अपनी वसीयत में इसे शुरू किया। ये पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है, क्योंकि नॉर्वे को शांतिप्रिय देश माना जाता था। विजेता को सोने का मेडल, डिप्लोमा और कुछ पैसे मिलते हैं।
ये पुरस्कार क्यों खास है?
इस पुरस्कार को सीर एक मेडल समझने की गलती मत करना। ये पुरस्कार विजेता के काम को दुनिया के सामने लाता है। इस पुरस्कार से पता चलता है की, ‘इस इंसान ने दुनिया बदली है।’ मार्टिन लूथर किंग जूनियर और मलाला यूसुफजई जैसे लोग इसके बाद पूरी दुनिया की आवाज बने। ये पुरस्कार मानवाधिकार, शांति और युद्ध रोकने जैसे मुद्दों को उजागर करता है। लेकिन, इसमें विवाद भी कम नहीं। कुछ फैसले लोगों को गलत लगे, जैसे 1973 में हेनरी किसिंजर का पुरस्कार। फिर भी, ये आशा की किरण है।
कौन जीतता है और क्यों?
ये पुरस्कार उन लोगों को मिलता है, जो शांति के लिए बड़ा बदलाव लाते हैं। जैसे, युद्ध खत्म करने की डील कराने वाले राजनयिक या मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता। रेड क्रॉस जैसे संगठन भी जीतते हैं, जो आपदा में मदद करते हैं। नियम ये है कि जो देशों को जोड़े, युद्ध कम करे, उसे पुरस्कार मिले। मलाला को 2014 में लड़कियों की शिक्षा के लिए और 2024 में जापान के निहोन हिडानक्यो को परमाणु हथियारों के खिलाफ काम के लिए मिला।
इसकी शुरुआत कैसे हुई?
पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में दिया गया। तब से 142 लोग और समूह इसे जीत चुके हैं। रेड क्रॉस ने तीन बार जीता, जो रिकॉर्ड है। लेकिन रास्ता आसान नहीं रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में 19 बार पुरस्कार नहीं दिया गया। 2009 में बराक ओबामा का जीतना भी विवादास्पद रहा, क्योंकि वो तब नए-नए राष्ट्रपति बने थे। ये पुरस्कार इतिहास बनाता है, पर हमेशा सहमति नहीं बनती।
भारत में पहला नोबेल शांति पुरस्कार
भारत को पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1979 में मदर टेरेसा को दिया गया था। वो कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी चलाती थीं। बीमार, अनाथ और गरीबों की मदद कर वो पूरी दुनिया में प्यार और सेवा की मिसाल बनीं। उनका काम दिखाता है कि एक इंसान कितना फर्क ला सकता है। इसी काम की सराहना करते हुए मदर टेरेसा को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बेशक मदर टेरेसा भारत की नहीं थी, लेकिन उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत को समर्पित कर दिया।
लेकिन भारत का पहला नोबेल पुरस्कार 1913 में रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य के लिए मिल था। उन्हें यह पुरस्कार उनकी प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ के लिए दिया गया था, जो कविताओं का एक संग्रह है। यह पुरस्कार उन्हें साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया था, और यह किसी एशियाई व्यक्ति को मिलने वाला पहला नोबेल पुरस्कार भी था।
नोबेल शांति पुरस्कार के वो नामांकन जो कभी नहीं जीते
इस पुरस्कार के लिए नामांकन तो बहुत होते हैं, लेकिन सभी नामांकन जीत में नहीं बदलते। ऐसा ही एक यहां किस्सा है भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का। गांधी जी को पांच बार (1937, 1938, 1939, 1947, 1948) नामांकन तो मिला, लेकिन हर बार वे पुरस्कार से वंचित रहे। उनकी अहिंसक आजादी की लड़ाई ने दुनिया को प्रेरित किया, फिर भी नोबेल कमेटी ने उन्हें नहीं चुना। अब इसके पीछे का कारण तो वही लोग जाने। बाद में कमेटी ने इसे अपनी सबसे बड़ी गलती माना। लेकिन एक बात तो तय है की गांधी जी नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार थे, हैं और रहेंगे। श्री अरबिंदो और एलियॉनर रूजवेल्ट जैसे लोगों को भी ये पुरस्कार नहीं मिला। सबसे हैरानी की बात तो ये है की 1939 में हिटलर का नाम भी मजाक में नामांकन में आया था।
नेतन्याहू ने ट्रम्प को क्यों चुना?
अब सवाल ये है की 7 जुलाई 2025 को नेतन्याहू ने ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित क्यों किया? 2020 के अब्राहम समझौते, जिसमें इजराइल, यूएई और बहरीन ने दोस्ती की। ये मध्य पूर्व में शांति की बड़ी जीत थी, और ट्रम्प ने इसे जोर-शोर से बढ़ाया। नेतन्याहू ने इसे ‘उचित’ बताया। ट्रम्प, जो हमेशा इस पुरस्कार के लिए उत्सुक रहे है, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था।
क्यों मचा है हंगामा?
अब जहां ट्रम्प की खुशी का ठिकाना नहीं है, वहीं ये नामांकन सबको पसंद नहीं आया। कुछ ने अब्राहम समझौते की तारीफ की, पर कई नाराज हैं। उसी दिन गाजा में 613 लोगों की मौत की खबर आई। X पर लोग इसे मजाक’ बता रहे हैं, क्योंकि ट्रम्प ने इजराइल की सख्त नीतियों का समर्थन किया। गाजा में बंधक हैं, युद्ध चल रहा है। ऐसे में शांति की बात? कई इसे नेतन्याहू का राजनीतिक दांव मानते हैं, ताकि वो ट्रम्प के साथ रिश्ते मजबूत करें और घरेलू दबाव कम करें।
नामांकन कैसे होता है?
कोई भी राष्ट्रपति या प्रोफेसर नामांकन कर सकता है। नेतन्याहू, एक राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर, इसके हकदार हैं। नामांकन फरवरी तक नॉर्वे की कमेटी को भेजे जाते हैं। अक्टूबर में विजेता चुना जाता है। नामांकन का मतलब जीत नहीं। हर साल ढेर सारे नाम आते हैं। कमेटी 50 साल तक इसे गोपनीय रखती है। ट्रम्प का नाम बस एक उम्मीद है, पूरी तरह जीत नहीं। कमेटी असल शांति प्रभाव देखती है।


