By: Ragini Chaubey
भारत में, प्रशासनिक कार्रवाई की गति अक्सर अपराध की गंभीरता के अनुरूप नहीं होती। जहाँ ट्रैफिक नियम तोड़ना या सार्वजनिक जगह पर कचरा फेंकना जैसे छोटे उल्लंघनों पर तुरंत कार्रवाई होती है, वहीं गंभीर अपराध विशेषकर यौन अपराध कई महीनों या कभी-कभी वर्षों तक लंबित रह सकते हैं। यह अंतर बहुत ही चिंताजनक है।
सोचिए, अगर कोई व्यक्ति सड़क पर थूकता है, लाल बत्ती पार करता है या गाड़ी गलत जगह खड़ी करता है, तो पुलिस तुरंत सक्रिय हो जाती है। अधिकारी तस्वीरें लेते हैं, जुर्माना लगाया जाता है और चालान तुरंत जारी कर दिया जाता है। ये छोटी गलतियां हैं, लेकिन सिस्टम इन्हें कुशलता से संभालता है। अब सोचिए कि जब जीवन बदल देने वाले अपराध होते हैं, तो वही सिस्टम कितनी धीमी गति से काम करता है।
यहाँ तक कि जब अदालत आरोपी को जमानत देने से मना कर देती है या स्पष्ट निर्देश जारी करती है, प्रशासन को उन्हें लागू करने में महीनों लग जाते हैं। हालांकि नियम और प्रक्रियाएं जरूरी हैं, लेकिन इससे प्रभावितों और उनके परिवार पर भावनात्मक बोझ बहुत बढ़ जाता है। उन्हें न्याय की उम्मीद में इंतजार करना पड़ता है, जबकि आरोपी समाज में स्वतंत्र रूप से घूम सकता है। यह प्राथमिकताओं में गंभीर कमी को दर्शाता है।
समस्या और बढ़ जाती है जब आरोपी प्रभावशाली या किसी उच्च पद पर हो। सामान्य नागरिक छोटी गलतियों के लिए तुरंत दंड भुगतते हैं, लेकिन गंभीर अपराधी अक्सर प्रक्रियात्मक सुस्ती का लाभ उठाते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि सुविधा और ताकत न्याय से ऊपर है। परिवार अनिश्चितता में रह जाता है और सोचता है कि क्या उनकी पीड़ा प्रशासन के लिए मायने रखती है।
जब समाज में कोई बड़ी घटना होती है चाहे वह हिंसा हो, घोटाला हो या सत्ता के दुरुपयोग का मामला तब एक सवाल बार-बार उठता है: अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो फैसले बराबर क्यों नहीं होते? क्यों ऐसा लगता है कि सत्ता के करीब खड़ा व्यक्ति कानून की पकड़ से निकल जाता है, जबकि आम आदमी उसी कानून के नीचे पिस जाता है?
कागज़ों में न्याय व्यवस्था निष्पक्ष है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग तस्वीर दिखाती है। जिनके पास सत्ता, पैसा या राजनीतिक पहुंच होती है, उनके लिए कानून अक्सर ‘लचीला’ हो जाता है। जांच धीमी पड़ जाती है, सबूत कमजोर बताकर खारिज कर दिए जाते हैं, या मामला वर्षों तक लटका रहता है। दूसरी ओर, आम आदमी के लिए वही कानून सख्त, तेज़ और निर्दयी बन जाता है गिरफ्तारी, लंबी पूछताछ और वर्षों तक चलने वाला मुकदमा।
इस असमानता की सबसे बड़ी वजह सत्ता और संस्थाओं के बीच का असंतुलन है। पुलिस, जांच एजेंसियां और प्रशासन अक्सर राजनीतिक दबाव में काम करते हैं। जब आरोपी प्रभावशाली होता है, तो कार्रवाई से पहले “ऊपर से संकेत” का इंतज़ार होता है। लेकिन आम नागरिक के मामले में वही सिस्टम बिना देरी के सक्रिय हो जाता है।
मीडिया की भूमिका भी यहां सवालों के घेरे में है। सत्ता से जुड़े मामलों में बहस अक्सर दिशा बदल लेती है, जबकि आम आदमी की गलती को ‘उदाहरण’ बनाकर पेश किया जाता है। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि न्याय ताकतवरों के लिए अलग और कमजोरों के लिए अलग है।
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। जब लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठता है, तो वे कानून से डरना छोड़ देते हैं। इससे अराजकता, असंतोष और हिंसा को बढ़ावा मिलता है। न्याय का मतलब केवल सजा देना नहीं, बल्कि यह भरोसा दिलाना है कि हर नागरिक चाहे वह कितना भी ताकतवर या कमजोर क्यों न हो कानून के सामने बराबर है।
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