महाराष्ट्र के गांवों में, जहां मिट्टी की खुशबू और चक्की की आवाज़ में जीवन बहता है, वहां आज भी एक नाम हवा में तैरता है — संत जनाबाई। यह कोई पुरानी किताबों में दबा नाम नहीं है, बल्कि एक ऐसा जीवंत स्मरण है जो आज भी महिलाएं घर के काम करते हुए गुनगुनाती हैं। उनके अभंग आज भी उन गलियों में गूंजते हैं जहां घर-आंगन ही मंदिर हैं। जनाबाई ने साबित किया कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए ना तो ऊंचा कुल चाहिए, ना ही मंदिर की घंटियों की जरूरत।
लगभग 1258 ईस्वी में गंगाखेड़ (अब परभणी ज़िला) में जन्मी जनाबाई के माता-पिता दामा और करुंद छोटे किसान थे, लेकिन भगवान विठ्ठल के बड़े भक्त। हर साल वारी में पंढरपुर की यात्रा करना उनके जीवन का हिस्सा था। इस यात्रा और भक्ति के वातावरण ने जनाबाई के मन में ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम बो दिया। उनके लिए विठ्ठल सिर्फ देवता नहीं थे, वो तो उनके जीवन के साथी, बालमित्र और सहचरी बन गए।
बाल्यावस्था में ही जनाबाई को पंढरपुर भेजा गया, जहां उन्हें संत नामदेव के पिता दमाशेटी शिंपी के घर में काम पर रखा गया। पर यह सेवा कोई बोझ नहीं थी, बल्कि ईश्वर की ओर बढ़ने का पहला कदम थी। नामदेव जैसे संत की संगति ने जनाबाई को केवल एक दासी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधिका बना दिया। उन्होंने खुद को “नामयाची दासी” कहा, लेकिन उनका आत्मा स्वतंत्रता से गूंजता था। वे काम करते हुए भगवान विठ्ठल का नाम जपती थीं, और उनका जीवन स्वयं एक चलती-फिरती आरती बन गया था।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति “दळता कांडता तुझं नाम गाई अनंता” (दळते और कांडते समय मैं तेरा नाम गाती हूं, हे अनंत) आज भी गांवों की चक्कियों में गूंजती है। भक्ति उनके लिए कोई अलग क्रिया नहीं थी, वह तो जीवन का ही अंग थी।
जनाबाई की भक्ति केवल भावनाओं तक सीमित नहीं थी, वो एक शब्द-साधिका भी थीं। उनके लगभग 350 अभंग आज भी सकल संत गाथा में संरक्षित हैं। उनकी कविताओं में विठ्ठल कभी मां जैसा, कभी बालक जैसा, तो कभी चंचल मित्र जैसा प्रकट होता है। “विठू माझा लेकुरवाळा, संगे गोपालांचा मेला” (मेरा विठ्ठल बालक जैसा है, गोपालों के साथ खेलता है) — यह पंक्तियां जनाबाई की कोमलता और आत्मीयता की मिसाल हैं।
उन्होंने केवल भावगीत नहीं, बल्कि कथात्मक रचनाएं भी कीं, जैसे कृष्णजन्म, प्रल्हादचरित्र, थळीपाक, बालक्रीड़ा और हरिश्चंद्राख्यान। ये रचनाएं बाद के कवियों को प्रेरणा बनीं, जैसे संत एकनाथ के पौत्र मुक्तेश्वर। लेकिन जनाबाई की विशेषता थी उनकी सादगी। उन्होंने कभी भाषाई चमत्कार नहीं रचा, बल्कि आम जनता की बोली में आत्मा की गहराई लिखी। उनके शब्द गांव की मिट्टी की तरह सरल और जीवन के जैसे गाढ़े हैं।
एक प्रसंग, जो भले ही कथा जैसा लगे लेकिन जनाबाई की भक्ति को सही रूप में दर्शाता है, वो है संत कबीर के साथ जुड़ा हुआ। कहा जाता है कि कबीर जी उनके अभंगों से इतने प्रभावित हुए कि पंढरपुर उनसे मिलने आए। उन्होंने जनाबाई को गोपालपुर में गोबर के उपले इकट्ठा करते देखा। एक महिला से उपलों को लेकर विवाद हुआ कि कौन से उपले किसके हैं। जनाबाई ने शांतिपूर्वक कहा, “जो उपले ‘विठ्ठल-विठ्ठल’ कहेंगे, वो मेरे हैं।” और जब लोगों ने कान लगाकर सुना, तो उनके उपलों से सचमुच विठ्ठल का नाम सुनाई दिया। यह चमत्कार सच हो या कल्पना, पर जनाबाई की भक्ति की गहराई को कोई झुठला नहीं सकता।
जनाबाई अकेली नहीं थीं इस आध्यात्मिक यात्रा में। संत ज्ञानेश्वर, संत सोपान, संत सेना महाराज और संत चोखामेळा जैसे संत उनके समय के सहयात्री थे। उन्होंने विशेष रूप से ज्ञानेश्वर को परलोक का तारक कहा—“परलोकाचे तरू, म्हणे माझा ज्ञानेश्वरू”। ये संत भक्ति आंदोलन की धुरी थे, और जनाबाई ने उसमें नारी स्वाभिमान की एक नई धारा जोड़ी।
1350 ईस्वी में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी को जनाबाई ने पंढरपुर में समाधि ली। यह कोई मृत्यु नहीं थी, बल्कि उनके भगवान में लीन हो जाने का उत्सव था। उनकी समाधि आज भी एक शांत, विनम्र स्थान है — जैसे उनका जीवन।
जनाबाई की सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने भक्ति को आम जीवन में समाहित कर दिया। जब संत बनने के लिए ब्राह्मण या सन्यासी होना आवश्यक माना जाता था, तब एक स्त्री दासी ने यह सिद्ध किया कि भक्ति का मार्ग रसोई और आंगन से होकर भी गुजरता है। उन्होंने बताया कि ईश्वर केवल मंदिर में नहीं, बल्कि उस चक्की में भी है जो प्रेम से घुमाई जाती है। उन्होंने उन असंख्य स्त्रियों को आवाज़ दी, जिनकी बातें धर्मग्रंथों में नहीं आती थीं।
आज जब हम तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में आध्यात्मिकता खोजते हैं, तब जनाबाई की कहानी हमें रुकने, सोचने और भीतर झांकने की प्रेरणा देती है। वो हमें बताती हैं कि अगर प्रेम सच्चा हो, तो उपले भी भगवान का नाम जप सकते हैं। और अगर भक्ति गहराई से की जाए, तो सेवा भी साधना बन जाती है।


