भारत की भक्तिपरंपरा में अनेक संत हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिखाया कि ईश्वर हर जगह हैं – खेत में, दुकान में, श्रम में, कला में। महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के एक ऐसे ही संत थे संत नरहरी सोनार।
उनकी विशेषता यह थी कि वे एक सोनार (गहनों के कारीगर) थे, लेकिन उनके लिए सोने की चमक से ज़्यादा मूल्य भक्ति की उजास का था।
उनका जीवन बताता है कि सच्ची श्रद्धा और ईमानदारी से किया गया कोई भी कार्य पूजा बन सकता है। उन्होंने न केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समाज को दिशा दी, बल्कि रोज़मर्रा के कारीगरों को यह बताया कि कला और व्यवसाय भी साधना हो सकते हैं।
संत नरहरी सोनार का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली ज़िले के बसमत गांव में हुआ था। वे सोनार जाति में जन्मे थे और बचपन से ही अपने पिता के साथ आभूषण बनाने की कला सीखने लगे। उनका नाम “नरहरी” भगवान नरसिंह (विष्णु के एक अवतार) से जुड़ा है, जिसका अर्थ है “पुरुष-सिंह”। वे कारीगरी करते समय भी विठोबा का नाम जपते रहते। उन्हें लगता था कि जैसे आभूषण बनाते समय बारीकी और ध्यान ज़रूरी है, वैसे ही भक्ति भी ध्यानपूर्वक करनी चाहिए।
उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना है देवगिरि (अब दौलताबाद) के राजा जयसिंह से जुड़ी। राजा ने संत नरहरी से कहा कि वह भगवान विठोबा के लिए एक सोने की कमरबंद बनाए, पर उसे भगवान की कमर के अनुसार बिल्कुल उपयुक्त होना चाहिए। अब समस्या यह थी कि ईश्वर की मूर्ति को छूना नरहरी के लिए असंभव था। वह मूर्ति को अपवित्र नहीं करना चाहते थे। लेकिन राजा का आदेश भी टाल नहीं सकते थे। तब उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी और विठोबा की मूर्ति के चारों ओर की हवा का स्पर्श महसूस करते हुए नाप लिया।
इस अनुभव को उन्होंने एक अभंग में व्यक्त किया:
“नयना बंध करी, वेद विठ्ठलाचा।
आंधळी भक्ति, सारी विठ्ठलात॥”
(आँखें बंद थीं, लेकिन ईश्वर की अनुभूति पूरी थी।)
जब उन्होंने आँखों की पट्टी हटाई, तो उन्हें मूर्ति नहीं बल्कि स्वयं विठोबा के साक्षात् दर्शन हुए। भगवान मुस्कुरा रहे थे। नरहरी की आँखों से आँसू बह निकले। इस अनुभव से उन्हें समझ में आया कि भगवान केवल मूर्ति में नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति में हैं। यह घटना वारकरी संप्रदाय में एक गहरे आध्यात्मिक जागरण के रूप में देखी जाती है।
संत नरहरी ने भले ही तुलसीदास या नामदेव जितनी रचनाएँ न लिखी हों, लेकिन उनके अभंग गहरे, सरल और मार्मिक हैं।
उनके कुछ अभंगों में यह संदेश स्पष्ट होता है:
सोने की चमक से मन का अंधकार नहीं मिटता।
अगर हृदय अशुद्ध है तो आभूषण भी व्यर्थ हैं।
भगवान का सच्चा आभूषण है, भक्ति।
उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति है:
“सोना घडून लाभ काय?
अंतरभर नाही पवित्र॥”
(अगर भीतर पवित्रता नहीं, तो सोने का क्या लाभ?)
संत नरहरी ने यह सिखाया कि जैसे सोना आग में तपकर शुद्ध होता है, वैसे ही इंसान को भी जीवन की कठिनाइयों और तपस्या से गुजरना होता है। वे कारीगरों की भाषा में गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान देते थे, जिससे आम लोग भी उनके संदेश को समझ पाते थे।
कहते हैं कि संत नरहरी सोनार ने संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और संत गोरा कुम्हार के साथ मिलकर पंढरपुर यात्रा की थी। उनकी शामें अभंगों और कीर्तन से भरपूर होती थीं, जहाँ जात-पात, व्यवसाय और वर्ग सब गौण हो जाते थे।
यह वारकरी आंदोलन की समानता और समावेशिता की भावना को दर्शाता है।
सोने से जुड़ा व्यवसाय होने के बावजूद, संत नरहरी ने कभी धन से मोह नहीं रखा। वे बार-बार कहते थे कि:
“विठोबा का नाम ही मेरा धन है।”
उन्होंने व्यापारी वर्ग को यह चेतावनी दी कि समृद्धि सेवा का साधन होनी चाहिए, अहंकार का नहीं।
संत नरहरी का विवाह हुआ था और उनके बच्चे भी थे। उन्होंने अपने परिवार को सत्य, भक्ति और करुणा का पाठ पढ़ाया। गांव की गरीब लड़कियों के विवाह में वे निःशुल्क आभूषण देते थे। उनकी उदारता और ईमानदारी के कारण सभी जातियों में उनका सम्मान था। वे कारीगरों के बीच झगड़े सुलझाते और सामाजिक सहयोगिता बनाए रखते।
संत नरहरी सोनार ने शांति से देह त्याग किया, कहते हैं कि अंतिम समय में भी वे विठोबा का नाम ले रहे थे। उनकी समाधि बसमत गांव में स्थित है और आज भी कारीगरों और व्यापारी वर्ग के लिए आस्था का केंद्र है। आषाढ़ी एकादशी पर वारकरी भक्त उनके अभंगों को गाकर उनकी स्मृति को जीवन्त करते हैं।
उनकी कथा को महिपति ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भक्तविजय’ में स्थान दिया है, जहाँ उन्हें संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के समकक्ष माना गया है।
The Bhakti Movement in Western India में डॉ. रामचंद्र चितले लिखते हैं:
“नरहरी सोनार ने समाज को सिखाया कि भगवान धन से नहीं, भक्ति से मिलते हैं।”
इतिहासकार एलेनॉर ज़ेलियट ने लिखा है कि नरहरी की कथा कारीगरों की गरिमा को सम्मान देती है और उन्हें आध्यात्मिकता से जोड़ती है।
वे हमें सिखाते हैं कि जीवन को दिखावे से नहीं, श्रद्धा, करुणा और सत्य से मापना चाहिए।


