क्या आप मानोगे? अगर मैं यह कहूं की दुनिया में आज भी एक ऐसी जनजाति है जिसका संपर्क हमारी बाहरी दुनिया से बिल्कुल भी नहीं है, और न ही वो चाहती है की बाहरी दुनिया उनसे कोई संपर्क करे।
यह बात बिल्कुल सच है… हमारे भारत की बंगाल की खाड़ी में, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के बीच, एक छोटा-सा टापू है… नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड। यहाँ रहते हैं सेंटिनलीज़, दुनिया की सबसे अलग-थलग जनजातियों में से एक।
लगभग 100-150 लोगों की यह छोटी-सी आबादी हज़ारों सालों से बाहरी दुनिया से कटी हुई है, शिकार करके, मछली पकड़कर और अपनी ज़मीन को हर कीमत पर बचाकर। उनकी कहानी सिर्फ़ एक जनजाति की नहीं, बल्कि मानवता के शुरुआती दिनों से लेकर 2018 में एक अमेरिकी मिशनरी की दुखद मृत्यु तक की एक महाकाव्यात्मक यात्रा है। क्या हैं उनके प्राचीन मूल? क्यूँ है उनका बाहरी दुनिया से टकराव? कैसा है उनका रहन-सहन?
प्राचीन मूल: 60,000 साल पुरानी विरासत
सेंटिनलीज़ की जड़ें मानव इतिहास के सबसे पुराने पन्नों में मिलती हैं। विद्वानों का मानना है कि उनके पूर्वज लगभग 60,000 साल पहले अफ्रीका से एशिया की ओर चले थे। उस समय समुद्र का स्तर कम था, और ज़मीन के पुल या उथले पानी ने अंडमान द्वीपों तक पहुँचने में मदद की। नॉर्थ सेंटिनल, जो लगभग 60 वर्ग किलोमीटर का एक रीफ-घिरा टापू है, उनका घर बना।
यहाँ उन्होंने शिकारी-संग्रहकर्ता जीवनशैली अपनाई… जंगली सुअर, मछलियाँ, फल, और कंदमूल उनका भोजन बने। उनकी भाषा आज भी अनजानी है, और यहाँ तक कि पड़ोसी जनजातियाँ जैसे ओंगे या जरावा भी इसे नहीं समझ पाए। यह दर्शाता है कि सेंटिनलीज़ न सिर्फ़ बाहरी दुनिया से, बल्कि आसपास की जनजातियों से भी हज़ारों सालों से अलग-थलग रहे। उनकी संस्कृति ‘पाषाण युग’ में अटकी नहीं है, यह समय के साथ विकसित हुई, जो उनके पर्यावरण के लिए एकदम सटीक है।
पहला संपर्क: औपनिवेशिक टकराव और विश्वासघात (1771-1880)
सेंटिनलीज़ का पहला लिखित ज़िक्र 1771 में आता है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज़ ‘डिलिजेंट’ ने टापू के किनारे रोशनी देखी, शायद उनके कैंपफायर। उससे भी कोई संपर्क नहीं हुआ। पहला बड़ा टकराव 1867 में हुआ, जब भारतीय व्यापारी जहाज़ ‘नाइनवेह’ सेंटिनल के पास रीफ पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 106 यात्री और क्रू टापू के किनारे पहुँचे। तीन दिन तक शांति रही, लेकिन तीसरे दिन सेंटिनलीज़ ने लोहे की नोक वाले तीरों से हमला कर दिया। यात्रियों ने लाठियों और पत्थरों से बचाव किया, और अंत में रॉयल नेवी ने उन्हें बचा लिया। सेंटिनलीज़ ने साफ़ कर दिया… यह उनकी ज़मीन है।
1880 में एक और परेशान करने वाला किस्सा हुआ। ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी मॉरिस विडाल पोर्टमैन, जो अंडमान में प्रशासक थे, ने नॉर्थ सेंटिनल पर सशस्त्र अभियान चलाया। उनका इरादा था ‘निवासियों से दोस्ती करना’, लेकिन यह दोस्ती हिंसक थी। उन्होंने छह सेंटिनलीज़, एक बुजुर्ग दंपति और चार बच्चों का अपहरण कर पोर्ट ब्लेयर ले गए। वहाँ, मुख्यभूमि के रोगों के कारण, जिनके खिलाफ उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी, जिस कारण दंपति की मृत्यु हो गई। बचे हुए बच्चों को उपहारों के साथ वापस भेज दिया गया, लेकिन संभवतः वे अपने साथ बीमारियाँ ले आए। इस विश्वासघात ने सेंटिनलीज़ में बाहरी लोगों के प्रति गहरा अविश्वास और गुस्सा बो दिया। पोर्टमैन ने 1883, 1885, और 1887 में फिर कोशिश की, लेकिन सेंटिनलीज़ जंगल में छिप गए।
20वीं सदी: मानवशास्त्रीय जिज्ञासा और उपहार अभियान (1960-1990)
स्वतंत्र भारत में सेंटिनलीज़ मानवशास्त्रियों के लिए एक पहेली बन गए। 1967 में, मानवशास्त्री त्रिलोकनाथ पंडित ने पहला आधिकारिक अभियान चलाया, जिसमें ओंगे जनजाति के लोग भी थे, यह सोचकर कि शायद वे सेंटिनलीज़ की भाषा समझ लें। लेकिन सेंटिनलीज़ जंगल में गायब हो गए, और टीम को सिर्फ़ खाली झोपड़ियाँ, हथियार, और गर्म कैंपफायर मिले। उन्होंने कपड़े और कैंडी जैसे उपहार छोड़े।

1970 और 1980 के दशक में, पंडित और भारतीय सरकार ने नियमित ‘उपहार छोड़ने’ के अभियान शुरू किए। नारियल, धातु के औज़ार, प्लास्टिक की बाल्टियाँ, और कभी-कभी जीवित सुअर दिए गए। सेंटिनलीज़ ने कुछ स्वीकार किया, कुछ ठुकरा दिया। एक बार उन्होंने एक सुअर को भाले से मारकर प्लास्टिक के साथ दफना दिया, लेकिन नारियल और धातु रख लिया। 1974 में, नेशनल ज्योग्राफिक की एक टीम पर हमला हुआ, जिसमें उनके डायरेक्टर की जाँघ में तीर लगा। यह तस्वीर, जिसे रघुबीर सिंह ने खींचा, सेंटिनलीज़ की पहली फोटो के रूप में मशहूर हुई।
सबसे उल्लेखनीय प्रगति 1991 में हुई, जब सेंटिनलीज़ ने पहली बार शांतिपूर्ण संपर्क की अनुमति दी। एक अभियान में, जिसमें मानवशास्त्री मधुमाला चट्टोपाध्याय (पहली महिला जो सेंटिनलीज़ के संपर्क में आई) शामिल थीं, सेंटिनलीज़ ने हथियार नहीं उठाए और डोंगी से नारियल हाथों-हाथ लिए। यह ऐतिहासिक पल था, और मधुमाला की मौजूदगी ने शायद विश्वास बनाने में मदद की, क्योंकि सेंटिनलीज़ ने एक महिला को कम खतरनाक माना। लेकिन यह दोस्ताना संपर्क ज़्यादा दिन नहीं चला।

देर 20वीं सदी से अब तक: ‘हाथ न लगाएँ, नज़र रखें’ नीति
1996 में, भारतीय सरकार ने उपहार अभियान बंद कर दिए। कारण थे नैतिक चिंताएँ और यह समझ कि सेंटिनलीज़ अपनी दुनिया में संतुष्ट और स्वस्थ हैं। संपर्क उनके लिए विनाशकारी हो सकता था, जैसा कि ओंगे और ग्रेट अंडमानीज़ जनजातियों के साथ हुआ, जिनकी आबादी औपनिवेशिक संपर्क के बाद 85-99% तक कम हो गई। अब भारत की नीति है ‘हाथ न लगाएँ, नज़र रखें’, यानी नावों या हेलिकॉप्टरों से दूर से निगरानी, लेकिन कोई सीधा संपर्क नहीं। 1956 के अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह आदिवासी संरक्षण विनियम के तहत टापू के 5 समुद्री मील के दायरे में प्रवेश निषिद्ध है।
लेकिन इस नीति के बावजूद कुछ घटनाएँ हुईं। 2004 के हिंद महासागर सुनामी के बाद, भारतीय तटरक्षक बल ने सेंटिनलीज़ की जाँच के लिए हेलिकॉप्टर भेजा। उन्होंने हेलिकॉप्टर पर तीर चलाए, यह दिखाते हुए कि वे सुनामी से बचे थे और बाहरी लोगों को अब भी पसंद नहीं करते। 2006 में, दो भारतीय मछुआरे, जो अवैध रूप से टापू के पास मछली पकड़ रहे थे, सेंटिनलीज़ ने मार डाला और उनके शव दफना दिए।
सबसे विवादास्पद घटना 2018 में हुई, जब अमेरिकी मिशनरी जॉन एलन चाउ ने ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए अवैध रूप से टापू पर जाने की कोशिश की। इसकी कहानी अगले सेक्शन में विस्तार से।
जॉन एलन चाउ की त्रासदी (2018)
नवंबर 2018 में, 26 साल के अमेरिकी मिशनरी जॉन एलन चाउ ने सेंटिनलीज़ को ईसाई धर्म सिखाने का जोखिम भरा मिशन शुरू किया। भारत के प्रतिबंध को नज़रअंदाज़ करते हुए, उन्होंने मछुआरों को रिश्वत दी और नॉर्थ सेंटिनल के पास पहुँचे। अपनी डायरी में, जो बाद में बरामद हुई, उन्होंने लिखा: “प्रभु, क्या यह टापू शैतान का आखिरी गढ़ है?” वह अपने साथ एक बाइबल, मछलियाँ, और एक फुटबॉल ले गए।

पहली कोशिश में, सेंटिनलीज़ ने तीर चलाए, एक तीर उनकी बाइबल को में जाके लगा। दूसरी बार, एक लड़के का तीर उनकी टांग को छू गया। फिर भी, चाउ नहीं रुके। 17 नवंबर को, उन्होंने अकेले कयाक से किनारे की ओर बढ़े और मछुआरों को वापस जाने को कहा। सेंटिनलीज़ ने उन्हें मार डाला और शव को समुद्र तट पर दफना दिया। भारतीय अधिकारियों ने, जनजाति और खोजी दलों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए, शव को बरामद करने की कोशिश नहीं की।
इस घटना ने दुनिया भर में तूफान खड़ा कर दिया। कुछ ने चाउ को शहीद कहा, तो कुछ ने उन्हें लापरवाह घुसपैठिया। यह टकराव व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वदेशी अधिकारों के बीच की खाई को उजागर करता है। सेंटिनलीज़ ने फिर साबित किया… उनका टापू, उनके नियम।
सेंटिनल का जीवन: एक अनूठी संस्कृति
सेंटिनलीज़ शिकारी-संग्रहकर्ता हैं, जो अपने पर्यावरण के मालिक हैं। वे जंगली सुअर, मछलियाँ, केकड़े, फल, कंदमूल, और कछुए के अंडे खाते हैं। उनकी पतली डोंगियाँ, जो उथले पानी में डंडों से चलती हैं, रीफ के लिए बनी हैं। वे बह आए धातु को तेज़ करके चाकू और तीर की नोक बनाते हैं। उनकी झोपड़ियाँ हल्की होती हैं, और वे गेरू और मिट्टी से बॉडी आर्ट बनाते हैं, जो शायद उनकी कहानियाँ या रीति-रिवाज़ दर्शाता है। एक अवलोकन के अनुसार, वे मृतकों को बाल्टियों में बैठी मुद्रा में रखते हैं, यह उनका दफन रिवाज हो सकता है।
उनकी आबादी, अनुमानित 100-150, छोटी लेकिन स्थिर है। कुपोषण या इनब्रीडिंग के कोई संकेत नहीं हैं। लेकिन उनकी आनुवंशिक एकरूपता उन्हें खसरा जैसे रोगों के लिए कमज़ोर बनाती है। उनकी भाषा, धर्म, और सामाजिक नियम अब भी रहस्य हैं, लेकिन 2004 की सुनामी जैसी आपदाओं से बचना उनकी लचीलता दिखाता है।
आइसोलेशन के कारण
सेंटिनलीज़ का अलगाव उनके ऐतिहासिक अनुभवों का नतीजा है। औपनिवेशिक काल में रोगों और हिंसा ने अंडमान की अन्य जनजातियों को लगभग खत्म कर दिया। सेंटिनलीज़ ने शायद यह देखा या सुना होगा। मानवशास्त्री त्रिलोकनाथ पंडित उनकी शत्रुता को ‘आत्मरक्षा’ कहते हैं, क्योंकि वे बाहरी लोगों को खतरा मानते हैं। उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता की कमी उनके आइसोलेशन को और ज़रूरी बनाती है।
नैतिक बहस और भविष्य
सेंटिनलीज़ के आइसोलेशन पर दुनिया दो खेमों में बँटी है। सर्वाइवल इंटरनेशनल जैसे संगठन कहते हैं कि उन्हें पूरी तरह अकेला छोड़ देना चाहिए, क्योंकि संपर्क उनकी संस्कृति और अस्तित्व के लिए खतरनाक है। दूसरा पक्ष तर्क देता है कि पूर्ण आइसोलेशन उन्हें आधुनिक चिकित्सा या कानूनी सुरक्षा से वंचित करता है। लेकिन ज़्यादातर विशेषज्ञ और भारतीय सरकार इस बात पर सहमत हैं कि उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए।
2025 में, एक यूट्यूबर, मायखाइलो विक्टरोविच पोल्याकोव, ने अवैध रूप से टाप्या पर डाइट कोक और नारियल जैसे उपहार छोड़े। भारतीय अधिकारियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया, जो सरकार की संरक्षण के प्रति गंभीरता दिखाता है। लेकिन भविष्य में जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर का बढ़ना नॉर्थ सेंटिनल के लिए खतरा बन सकता है, क्योंकि यह टापू छोटा और निचला है।
सेंटिनलीज़ की कहानी जीवटता, लचीलता, और अडिग स्वतंत्रता की कहानी है। 60,000 साल पुराने मूल से लेकर जॉन एलन चाउ की दुखद मृत्यु तक, उन्होंने औपनिवेशिक आक्रमण, मानवशास्त्रीय जिज्ञासा, और आधुनिक घुसपैठों के बावजूद अपना आइसोलेशन बनाए रखा। वे सिर्फ़ एक जनजाति नहीं, बल्कि मानव अनुकूलन और सांस्कृतिक स्वायत्तता का प्रतीक हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी ‘प्रगति’ का मतलब किसी को उनकी मर्ज़ी से जीने देना भी हो सकता है।


