भारतीय खाने की कहानी मसालों से नहीं, तेल से शुरू होती है।
केरल की एक छोटी रसोई में नारियल का तेल धीरे-धीरे गर्म होता है। कड़ाही में कड़ी पत्ता डाला जाता है तो पूरे घर में एक हरी, हल्की ख़ुशबू फैल जाती है। कोलकाता में सरसों के तेल से मछली पकती है। धुएँ की तेज़ गंध से कोई खाँस पड़ता है, पर किसी को बुरा नहीं लगता। कोल्हापुर में मूँगफली के तेल में लाल मिर्च का तड़का लगता है। उत्तर भारत में घी में जीरा और लहसुन छौंककर दाल पर डाला जाता है और पूरी रसोई में वह ख़ुशबू भर जाती है जिसे घर का स्वाद कहते हैं।
हर रसोई में खाना तो बन रहा है, पर तेल पूरी बात बदल देता है। वह सिर्फ़ पकाने का माध्यम नहीं है। वह हर क्षेत्र की रसोई का व्याकरण है। नारियल तेल, सरसों तेल, तिल तेल, मूँगफली तेल और घी, ये पाँचों भारतीय खानपान की वह अदृश्य नींव हैं जिन पर बहुत कम बात होती है।
पिछले कुछ दशकों में खाने के इतिहासकार और रसोइये एक दिलचस्प सवाल पूछ रहे हैं। क्या उत्तर भारतीय रेस्तराँ संस्कृति धीरे-धीरे पूरे देश पर हावी हो रही है? इसका जवाब एकदम सीधा नहीं है। लेकिन कड़ाही में रखा तेल इस जवाब का हिस्सा ज़रूर है।
दक्षिण भारत: नारियल और तिल की शांत समझदारी
दक्षिण भारतीय रसोई में नारियल तेल और तिल तेल का एक अलग दर्जा है। नारियल तेल खट्टे स्वाद और किण्वित सामग्री के साथ मिलकर खाने को हल्का और संतुलित बनाता है। तिल तेल इमली वाली ग्रेवी और दाल में एक गहरी, थोड़ी मीठी ख़ुशबू भरता है।
केरल का अवियल इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। नारियल तेल में सब्ज़ियाँ, दही और नारियल मिलकर एक हल्की और सुगंधित तैयारी बनाते हैं। थोरन में कद्दूकस किया नारियल और सब्ज़ियाँ नारियल तेल में पकती हैं और नतीजा एक ऐसी सूखी डिश होती है जो भारी नहीं, ख़ुशबूदार होती है। ये व्यंजन तालू पर हल्के पड़ते हैं। गाढ़ी ग्रेवी से ज़्यादा इनका ज़ोर संतुलन पर है।
केरल की एक बुज़ुर्ग महिला ने एक बार रसोई में खाना बनाते हुए कहा था कि तेल को सब्ज़ी का साथ देना चाहिए, चिल्लाना नहीं चाहिए। उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराईं और पकाती रहीं। यह छोटा-सा जुमला दक्षिण भारत की रसोई के पूरे दर्शन को समेट लेता है।
पूर्वी भारत: सरसों तेल की दबंग पहचान
पूर्वी भारत की रसोई की भाषा बिल्कुल अलग है। बंगाल, ओडिशा और असम के बड़े हिस्से में सरसों का तेल खाने की बुनियाद है। यह तेज़ है, तीखा है और हल्का कड़वा भी। यह इंद्रियों को लगभग तुरंत जगाता है।
पकाने का तरीक़ा भी अलग है। तेल को तब तक गर्म किया जाता है जब तक वह थोड़ा धुआँ न छोड़े। इससे उसकी कड़वाहट कम होती है और एक अखरोट जैसी ख़ुशबू उठती है। शोर्षे बाटा में मछली पर सरसों का पेस्ट लगाया जाता है जो एक साथ मलाईदार और तेज़ दोनों होता है। कई बंगाली मछली के व्यंजनों में आख़िर में कच्चे सरसों तेल की कुछ बूँदें डाली जाती हैं। यह वह आख़िरी स्पर्श है जो खाने को उसकी असली पहचान देता है।
जो लोग पहली बार इस तेल का स्वाद लेते हैं उन्हें एक झटका-सा लगता है। पर यही इसकी ख़ूबी है।
पश्चिम भारत: मूँगफली तेल की बहुमुखी भूमिका
पश्चिमी भारत की रसोई एक दिलचस्प चौराहे पर खड़ी है। वैसे इसे एक रसोई कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि यहाँ कई अलग-अलग पाक परंपराएँ एक ही भूगोल में ज़िंदा हैं। मूँगफली का तेल ज़्यादातर रसोइयों पर राज करता है, पर कोंकण तट पर नारियल तेल भी बराबर दिखता है। मूँगफली तेल का धुआँ बिंदु ऊँचा है और स्वाद तटस्थ, इसलिए यह धीमी आँच पर पकाने और तलने के लिए उपयुक्त है।
गुजरात के उँधियू में मूँगफली तेल सर्दियों की सब्ज़ियाँ, मसाले और मेथी की पकौड़ियाँ एकसाथ पकाता है और सबके स्वाद को बिना दबाए एक सूत्र में बाँध देता है। कोल्हापुरी रसोई में तेल को खूब गर्म करके उसमें सूखे नारियल, लाल मिर्च और लहसुन का गाढ़ा मसाला डाला जाता है। मालवणी मछली करी में कोंकण तट पर नारियल तेल, कोकम और मसाले मिलकर एक चमकदार तटीय तैयारी बनाते हैं।
उत्तर भारत: घी और सरसों तेल की जुगलबंदी
उत्तर भारतीय खाना घी और सरसों तेल की ताक़त से बना है। घी गर्मजोशी और समृद्धि लाता है। मसालों और दालों को एक गहरी, आरामदेह ख़ुशबू में लपेट देता है। तड़के वाली दाल में गर्म घी जीरे, लहसुन और लाल मिर्च की ख़ुशबू छोड़ता है और जब दाल पर पड़ता है तो पूरा खाना एक अलग रूप ले लेता है।
सरसों तेल पंजाबी अचारों में उतना ही अहम है। उसकी तीव्रता सब्ज़ियों को सुरक्षित रखती है और स्वाद को और पुख्ता बनाती है। यही परंपराएँ आगे चलकर अपने क्षेत्र की सीमाएँ लाँघ गईं।
घाणी: परंपरागत तेल निकालने की पुरानी कला
औद्योगीकरण से पहले भारतीय तेल की गुणवत्ता घाणी तय करती थी। घाणी एक परंपरागत कोल्ड-प्रेस तकनीक है जिसमें एक भारी लकड़ी का मूसल पत्थर या लकड़ी की ओखली में बैल की शक्ति से धीरे-धीरे घूमता है। इस पूरी प्रक्रिया में बाहर से ताप नहीं दिया जाता। इसलिए बीज के स्वाद-यौगिक और पोषक तत्व बचे रहते हैं। जब कारीगर घाणी से औद्योगिक रिफ़ाइनिंग की तरफ़ क़दम बढ़ाए तो यह भारतीय रसोई के स्वाद के सँकरे होने की शुरुआत थी।
स्वास्थ्य की आड़ में परंपरा का अपमान
खैर, बात अब उस दौर की करनी होगी जब विज्ञान और बाज़ार ने मिलकर भारतीय थाली को बदलना शुरू किया।
१९८० और १९९० के दशक में भारतीय रसोई ने एक चुपचाप क्रांति देखी जिसकी जड़ें अमेरिका में थीं। अमेरिकी शरीर विज्ञानी एंसेल कीज़ ने १९५८ से १९७० के बीच सेवेन कंट्रीज़ स्टडी में यह तर्क दिया कि संतृप्त वसा और हृदय रोग के बीच सीधा संबंध है। हालाँकि इस अध्ययन की पद्धति को बाद में कई विशेषज्ञों ने चुनौती दी। खाद्य पत्रकार नीना टाइकोल्ज़ ने अपनी किताब ‘द बिग फ़ैट सरप्राइज़’ (२०१४) में विस्तार से दर्ज किया है कि किस तरह वनस्पति तेल उद्योग ने दुनिया भर की रसोइयों से परंपरागत चर्बी और उष्णकटिबंधीय वसा को बाहर करने के लिए एक समन्वित अभियान चलाया।
भारत में इसका सीधा असर पड़ा। घी और नारियल तेल को धमनियाँ बंद करने वाली संतृप्त वसा कहा जाने लगा। इनकी जगह रिफ़ाइंड वनस्पति तेल और सूरजमुखी तेल को दिल के लिए बेहतर बताकर बढ़ते मध्यम वर्ग तक पहुँचाया गया। खाद्य इतिहासकार के. टी. आचार्य ने अपनी १९९४ की किताब ‘इंडियन फ़ूड: ए हिस्टोरिकल कम्पेनियन’ में यह दर्ज किया है कि परंपरागत भारतीय तेल सिर्फ़ पोषण नहीं, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान भी रखते थे, जो इन नए औद्योगिक उत्पादों में बिल्कुल नहीं थी।
नए तेल गंधहीन, रंगहीन और स्वादहीन थे। उन्हें अदृश्य होने के लिए ही बनाया गया था। और जब तेल अदृश्य हो गया तो रसोई की क्षेत्रीय भाषा भी धुंधली पड़ने लगी।
उत्तर भारतीय खाना कैसे राष्ट्रीय डिफ़ॉल्ट बन गया
यह बदलाव विभाजन के बाद की पंजाबी और मुग़लई रेस्तराँ संस्कृति के उभार के साथ जुड़ गया। विभाजन के बाद दिल्ली आए पंजाबी परिवारों ने भोजन के ज़रिए अपनी जीविका बनाई और तंदूरी खाना तथा मक्खन-भरी ग्रेवी को लोकप्रिय बनाया। दिल्ली के मोती महल जैसे रेस्तराँ ने बटर चिकन और तंदूरी खाने को पूरे देश में पहचान दिलाई। धीरे-धीरे यही रेस्तराँ संस्कृति उत्तर भारतीय खाने का पर्याय बन गई और होटलों ने इसी मॉडल की नक़ल करनी शुरू की।
दिल्ली देश की राजनीतिक और मीडिया राजधानी भी थी। राष्ट्रीय टेलीविज़न चैनल, खाने के लेखक और रेस्तराँ समीक्षक ज़्यादातर वहीं से काम करते थे। तो स्वाभाविक था कि उनकी नज़र उन्हीं व्यंजनों पर पड़ी जो उनके आसपास थे। नतीजा यह हुआ कि पंजाबी और मुग़लई खाने को एक राष्ट्रीय मंच मिला जो क्षेत्रीय व्यंजनों को शायद ही कभी मिला।
आज देशभर के मॉल और हवाई अड्डों पर बटर चिकन, पनीर की ग्रेवी और नान आसानी से मिलते हैं। दक्षिण के किसी मॉल में भी कई स्टॉल उत्तर भारतीय खाना परोसते हैं। अवियल या थोरन ढूँढना मुश्किल है। इसमें किसी की साज़िश नहीं है। यह बस बाज़ार की अपनी मंतिक़ है।
जनसंख्या और बाज़ार
उत्तर प्रदेश की आबादी लगभग २४.१ करोड़ (२०२६ अनुमान) है। बिहार की लगभग १३.१ से १३.३ करोड़, मध्य प्रदेश की लगभग ८.९ करोड़ और राजस्थान की लगभग ८.२ से ८.४ करोड़। हिंदी पट्टी की कुल आबादी ४० करोड़ से काफ़ी ऊपर है। तुलना के लिए, दक्षिणी राज्यों की कुल आबादी लगभग २५ से २६ करोड़ है, पूर्वी राज्यों की लगभग २० करोड़ और पश्चिमी राज्यों की लगभग १८ से १९ करोड़।
जनसंख्या अकेले संस्कृति तय नहीं करती। पर बाज़ार और माँग को ज़रूर आकार देती है।
पूर्वोत्तर, मध्य भारत और हिमालय के किनारे
पूर्वोत्तर भारत पूर्वी भारत की सरसों तेल परंपरा को आगे बढ़ाता है, पर यहाँ हाथ हल्का है। असम, नागालैंड, मणिपुर की रसोइयाँ अक्सर सरसों तेल को खाने के अंत में कच्चा डालती हैं ताकि वह स्वाद को उभारे, दबाए नहीं। असमी मासोर तेंगा जैसे व्यंजन और बाँस की कोंपलों तथा किण्वित सोयाबीन के साथ नागा धुएँ में पकी सूअर की माँस, ये सब धुएँ, किण्वन और ताज़ी जड़ी-बूटियों पर निर्भर हैं जहाँ तेल पर्दे में रहता है।
मध्य भारत में, ख़ासकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में, महुए के पेड़ के बीजों से निकला तेल अचार और साधारण सब्ज़ी की तैयारियों में एक मिट्टी जैसी गहराई जोड़ता है। यह वह तेल है जिसके बारे में अधिकतर लोग जानते भी नहीं।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में ठंडे मौसम में सरसों तेल की गर्म तीव्रता काम आती है। घी रोटी, दाल और सिद्दू जैसी स्थानीय रोटियों में समृद्धि भरता है। ये इलाके याद दिलाते हैं कि परिचित तेल भी अलग-अलग भूगोल में एकदम नए रूप ले सकते हैं।
तीन रसोइयाँ, तीन दुनियाएँ
एक तमिल घर में तिल तेल, इमली और दाल एक उबलते बर्तन में मिलते हैं। ख़ुशबू गहरी है और थोड़ी मीठी भी।
बंगाली रसोई में एक रसोइया भाप में पकी मछली के ऊपर आख़िर में कच्चे सरसों तेल की दो बूँदें डालता है। ख़ुशबू तुरंत उठती है, तेज़, सुनहरी, ज़िंदा।
कोल्हापुर के एक घर में मूँगफली का तेल लाल मिर्च के गाढ़े मसाले को लेकर कड़ाही में फैलता है और रसोई मसाले की गर्मी से भर जाती है।
ये रोज़मर्रा के काम हैं। पर इनमें सदियों का रसोई ज्ञान भरा है।
एक शांत प्रतिरोध की कहानी
खाने की परंपराएँ आसानी से नहीं मिटतीं। वे बदलती हैं, यात्रा करती हैं और नए रूप में लौट आती हैं। केरल के छोटे टॉडी शॉप जहाँ थोरन ताज़े नारियल तेल में बनता है, कोलकाता के मछली के ठेले जहाँ कच्चे सरसों तेल की पुँगड़ी आख़िर में डाली जाती है और महाराष्ट्र की सड़कों के किनारे मूँगफली तेल में तलते वड़े, ये सब अपनी परंपरा को बिना किसी शोर के ज़िंदा रखे हुए हैं।
सोशल मीडिया ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। घर के शेफ़, फ़ूड ब्लॉगर और कंटेंट क्रिएटर असम से लेकर तटीय कर्नाटक तक के भूले-बिसरे नुस्ख़े और पुश्तैनी तकनीकें सामने ला रहे हैं। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने कोल्ड-प्रेस्ड सरसों, नारियल, तिल और मूँगफली तेल की माँग भी बढ़ाई है क्योंकि लोग अब जानते हैं कि इन तेलों में पोषण और स्वाद दोनों बचे रहते हैं।
ये ताक़तें धीरे-धीरे बदलाव ला रही हैं। शांत परंपराएँ फिर से राष्ट्रीय बातचीत में जगह बना रही हैं।
अंत में
भारत को कभी एक तेल से या एक मसाले की भाषा से नहीं पकना था। इसकी असली ताक़त हमेशा इसकी रसोई की विविधता में रही है। नारियल तेल, सरसों तेल, तिल तेल, मूँगफली तेल और घी, इनमें से हर एक किसी न किसी भूगोल और उसके लोगों की याद है।
जब कोई रसोई यह विविधता खो देती है तो वह राष्ट्रीय नहीं बनती। वह बस और सँकरी हो जाती है।
आज रात भारत के हज़ारों घरों में कड़ाहियों में तेल गर्म हो रहा है। हर रसोई से थोड़ी अलग ख़ुशबू आ रही है। यही फ़र्क़ भारत का असली स्वाद है।
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