भारत में Stroke अब केवल एक अचानक आने वाली मेडिकल इमरजेंसी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक लंबी और जटिल बीमारी के रूप में सामने आ रहा है। समय पर इलाज और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की वजह से अब पहले के मुकाबले ज्यादा मरीजों की जान बचाई जा रही है। लेकिन इसके बाद जो असली चुनौती शुरू होती है, वह है मरीज को फिर से सामान्य जीवन में लौटाना।
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मरीजों को लंबे समय तक न्यूरो-रिहैबिलिटेशन की जरूरत होती है। इसमें फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्युपेशनल थेरेपी और लगातार विशेषज्ञों की निगरानी शामिल होती है। यह प्रक्रिया महीनों नहीं, बल्कि कई बार सालों तक चलती है। यही वह दौर होता है जब मरीज और उसके परिवार को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत होती है।
विडंबना यह है कि इतना जरूरी इलाज आज भी अधिकांश बीमा पॉलिसियों में शामिल नहीं है। नतीजतन, परिवारों को अपनी जेब से भारी खर्च उठाना पड़ता है। इससे आर्थिक बोझ बढ़ता है और मानसिक तनाव भी गहरा हो जाता है। कई मामलों में इलाज बीच में ही रोकना पड़ता है, जिससे मरीज की रिकवरी अधूरी रह जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में हर साल लाखों नए स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं। बेहतर इलाज के कारण मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन रिहैबिलिटेशन की कमी मरीजों की जिंदगी को अधूरा छोड़ देती है। उनका मानना है कि अब स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल जान बचाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मरीज को पूरी तरह से सक्षम बनाने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
नई तकनीकों जैसे टेली-न्यूरो-रिहैबिलिटेशन, रोबोटिक्स और एआई आधारित इलाज ने उम्मीद जरूर जगाई है। ये तकनीकें मरीजों को घर बैठे बेहतर इलाज देने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, इन सुविधाओं की पहुंच अभी सीमित है और ये सभी के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
अगर पोस्ट-स्ट्रोक केयर को बीमा योजनाओं में शामिल किया जाए और रिहैबिलिटेशन सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाया जाए, तो लाखों मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है। इससे वे न सिर्फ जीवित रहेंगे, बल्कि एक सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन भी जी सकेंगे।
स्ट्रोक के बाद की असली लड़ाई इलाज से नहीं, बल्कि उस इलाज को जारी रखने की क्षमता से जुड़ी है। जब तक इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
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