भारत में ट्रेन से सफर करना एक अलग ही अनुभव है। लाखों लोग रोज़ इस विशाल रेल नेटवर्क पर निर्भर हैं। लेकिन एक सवाल हर यात्री के मन में ज़रूर आता है “ट्रेन अभी कहाँ होगी?” खासकर तब, जब मोबाइल में इंटरनेट न हो और आप किसी सुनसान इलाके से गुज़र रहे हों।
अच्छी खबर यह है कि आज ऐसे ऐप मौजूद हैं जो बिना इंटरनेट के भी ट्रेन की तत्काल स्थिति बता देते हैं। और यह कोई जादू नहीं, बल्कि एक बेहद चतुर तकनीक है जो आपके मोबाइल में पहले से मौजूद सुविधाओं का उपयोग करती है।
पहले जानिए यह ऐप कौन सा है?
“व्हेयर इज़ माय ट्रेन” यह नाम शायद आपने सुना हो। यह भारत के सबसे लोकप्रिय ट्रेन ट्रैकिंग ऐप में से एक है, जिसे दस करोड़ से ज़्यादा बार डाउनलोड किया जा चुका है। इसे पहले बेंगलुरु की एक छोटी कंपनी सिग्मॉइड लैब्स ने बनाया था, और 2018 में गूगल ने इसे खरीद लिया यह भारत में गूगल का पहला उपभोक्ता उत्पाद अधिग्रहण था।
इसके अलावा इक्सिगो ट्रेन्स ऐप भी बिना इंटरनेट के ट्रेन की स्थिति बताने में सक्षम है। लेकिन असली सवाल यह है बिना उपग्रह-स्थान प्रणाली और बिना इंटरनेट के ये ऐप आपकी ट्रेन को खोज कैसे लेते हैं?
राज़ है मोबाइल टॉवर!
जब आपका मोबाइल किसी नेटवर्क से जुड़ा होता है, तो वह पास के मोबाइल टॉवर से संकेत लेता है। हर टॉवर की एक विशिष्ट पहचान संख्या होती है। “व्हेयर इज़ माय ट्रेन” ने इन्हीं टॉवर पहचान संख्याओं का एक विशाल ऑफलाइन नक्शा बना रखा है जिसमें भारत की पूरी रेल पटरी के किनारे के सभी टॉवरों की जानकारी मात्र सात-आठ एमबी में समाई हुई है।
जब आप ट्रेन में बैठे होते हैं, तो ऐप यह देखता है कि आपका मोबाइल किस टॉवर से जुड़ा है। फिर वह उस टॉवर की जगह अपने ऑफलाइन भंडार से मिलाता है और अनुमान लगाता है कि ट्रेन इस समय कहाँ है। इसे कहते हैं मोबाइल टॉवर त्रिभुजन और यह उपग्रह-स्थान प्रणाली की तुलना में बहुत कम बैटरी खर्च करता है।
रेलवे स्टेशनों के आसपास इन टॉवरों की घनत्व उपग्रह प्रणाली जितनी सटीक होती है कुछ मीटर तक की शुद्धता। बीच के रास्ते में थोड़ी कम, लेकिन फिर भी काफी भरोसेमंद।
सामूहिक डेटा जितने यात्री, उतनी सटीक जानकारी
यह तकनीक सिर्फ टॉवर आँकड़ों पर नहीं रुकती। जब हज़ारों यात्री एक ही ट्रेन में यह ऐप इस्तेमाल कर रहे होते हैं, तो उनके मोबाइल से गुमनाम स्थान-आँकड़े इकट्ठे होते हैं। इससे ऐप की सटीकता और भी बेहतर होती जाती है ठीक वैसे ही जैसे गूगल मैप्स के लिए लाखों लोग तत्काल यातायात जानकारी साझा करते हैं।
यानी जितने ज़्यादा लोग इस ऐप को उपयोग करेंगे, उतनी ही सटीक जानकारी यह देगा। यह एक स्वतः सुधरने वाली व्यवस्था है।
राष्ट्रीय रेल पूछताछ प्रणाली सरकारी ऐप का तरीका अलग है
भारतीय रेलवे का आधिकारिक ऐप राष्ट्रीय रेल पूछताछ प्रणाली थोड़े अलग तरीके से काम करता है। यह उपग्रह प्रणाली या मोबाइल टॉवर से नहीं, बल्कि नियंत्रण कार्यालय प्रणाली से आँकड़े लेता है। यानी इसमें जानकारी सीधे रेलवे के तंत्र से आती है, जो इसे और भी विश्वसनीय बनाती है खासकर रद्द ट्रेनों और चबूतरा संख्या जैसी जानकारी के लिए।
हालाँकि यह ऐप पूरी तरह बिना इंटरनेट के नहीं चलता। लेकिन जब इंटरनेट हो, तो यह सबसे सटीक जानकारी देता है।
यात्रियों के लिए उपयोगी सुविधाएं
इन ऐप में सिर्फ ट्रेन ट्रैकिंग नहीं है बहुत कुछ और भी है जो एक यात्री की यात्रा आसान बना देता है। उदाहरण के लिए, स्टेशन अलार्म की सुविधा जो आपको यह नहीं बताती कि “दो घंटे बाद स्टेशन आएगा”, बल्कि टॉवर स्थान के आधार पर तब जगाती है जब ट्रेन वाकई आपके स्टेशन के करीब हो। तो चाहे ट्रेन पाँच घंटे देरी से क्यों न चल रही हो, आपको सही समय पर सूचना मिलेगी।
इसके अलावा डिब्बे की स्थिति की सुविधा भी है जो बताती है कि आपका डिब्बा चबूतरे पर कहाँ रुकेगा। भारी सामान लेकर दौड़ने की ज़रूरत नहीं! और यह सब हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु समेत बारह भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है।
तो क्या यह हमेशा पूरी तरह सटीक होता है?
नहीं और यह जानना ज़रूरी है। बिना इंटरनेट की ट्रैकिंग एक अनुमान है, न कि संवेदक आधारित सटीक जानकारी। चबूतरा संख्या बदलना, अचानक मार्ग परिवर्तन, या ट्रेन रद्द होना ये सब जानने के लिए इंटरनेट ज़रूरी है। ऑफलाइन होने पर ये जानकारी नहीं मिल पाती।
लेकिन जब आप किसी ऐसे इलाके से गुज़र रहे हों जहाँ इंटरनेट बिल्कुल नहीं है, और बस यह जानना चाहते हों कि “अगला स्टेशन कब आएगा” तब यह ऐप किसी वरदान से कम नहीं।
भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों लोग रोज़ ट्रेन से सफर करते हैं और इंटरनेट की उपलब्धता अभी भी एक बड़ी चुनौती है, इस तरह की देसी तकनीक वाकई गर्व की बात है। अगली बार जब आप ट्रेन में बैठें और इंटरनेट न हो तो घबराएं नहीं। आपका मोबाइल रास्ता जानता है।
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